अरुण- मै विष्णुलोक से वापस क्यूँ आया.
रविनाथ- तुम अपनी साधना के फल के अनुसार ही वहाँ रुक पाए. अगर
तुम्हारी साधना सम्पूर्ण हो जाती तो तुम विष्णु लोक के स्थायी निवासी बन जाते.
अरुण- मोक्ष क्या है
रविनाथ- जब आप जन्म लेते हो तो आपको आपके शरीर के साथ कष्ट भी
मिलते हैं, चाहें आपने किसी भी रूप में जन्म लिया हो. चाहें भोजन की हो या वासना
की या नाम की या अधिकार की, भूख हर प्राणी को भगाती रहती है. दो
जन्मो के बीच का प्रतीक्षा काल आप अंतरिक्ष में बिताते हैं. आपको शांति कभी नहीं
मिलती. आप किसी भी योनी में हो, भूख के चक्कर से आप निकल नहीं पाते. जब आप इस
चक्कर से निकल कर प्रभु के भीतर समा जाते हैं, तब आपकी आत्मा को शान्ति और परम
आनंद मिल जाता है. इसी को मोक्ष कहते हैं.
अरुण- मोक्ष पाने का सरलतम तरीका क्या है.
रविनाथ- मोक्ष पाने का सरलतम तरीका है, अपने आप को अपने हर काम
को प्रभु के निमित कर दो. सुनने में सबसे आसान तरीका यही है. पर यह करना इतना आसान
नहीं है. आपको खुद ईश्वर के समान बनना पडेगा. दूसरा रास्ता है तंत्र,मंत्र,यंत्र
का. पर इसमें बहुत दुरूह और लंबी साधना करनी पड़ती है. तीसरा रास्ता है भक्ति का.
तुमने खुद तीनो रास्ते देख लियें हैं.
अरुण- क्या हरेक की मंजिल मोक्ष होनी चाहिए.
रविनाथ- हाँ.
अरुण- जो हमारे पंथ में हम सशरीर स्वर्ग जाते हैं और जो लोग
सिर्फ आत्मा से स्वर्ग जाते हैं, दोनों में क्या फर्क है.
रविनाथ- सशरीर स्वर्ग जाना
सम्पूर्ण विजय है. हमारा पंथ यह मानता है.
अरुण- क्या कभी कोई सर्वोत्तम बने बिना भी स्वर्ग गया है.
रविनाथ- हाँ सैकड़ों योगी बिना पदों और पंथ के प्रबंधन को
संभाले स्वर्ग गए हैं. सर्वोत्तम का काम सारे पंथ का प्रबंधन भी है.
अरुण- हम वस्त्र क्यूँ नहीं पहनते.
रविनाथ- हमें ईश्वर ने जिस रूप में भेजा, हम उसी रूप में रहते
हैं. वस्त्र, घर सब इंसान ने बनाये हैं. इसलिए हम विशुद्ध ईश्वरीय सत्ता के अनुरूप
रहते हैं.
अरुण- क्या कभी कोई स्त्री भी सर्वोत्तम बनी है.
रविनाथ- नहीं, आज तक कभी कोई स्त्री सर्वोत्तम नहीं बनी.
अरुण- क्या किसी स्त्री ने सशरीर स्वर्ग पाया है.
रविनाथ- हाँ बहुतों ने.
अरुण- क्या सर्वोत्तम अपनी मर्ज़ी से किसी को भी स्वर्ग भेज
सकते हैं.
रविनाथ- नहीं जब आप स्वर्ग जाने के लायक हो जाते हैं तब
सर्वोत्तम आपको देवताओ के हवाले कर देते हैं. देवता आपकी सम्पूर्ण परख करके अगर
आपको स्वर्ग जाने लायक पाते हैं तो ही आपको स्वर्ग ले जातें हैं.
अरुण- स्वर्ग कैसा होता है.
रविनाथ- गूंगे का गुड़ है.
अरुण- कुछ तो बताइए
रविनाथ- कहा ना जिसने
पा लिया वो वापस आएगा नहीं, कोई वापस आ कर बताएगा नहीं तो हम पृथ्वीवासी कैसे जान
पायेंगे.
अरुण- पर देवता तो दोनों लोक में आते जाते हैं, उन्होंने नहीं
बताया.
रविनाथ- देवदर्शन होने पर कोई भी अपने काम पहले पूरे करवाएगा.
इन बातों के ज्ञान से किसी का कोई फायदा तो होगा नहीं. जो स्वर्ग जाने के लायक हैं
वे पहुँच ही जायेंगे. जो लायक नहीं हैं उन्हें बता कर क्या फायदा
अरुण- रोहिताश्व क्या इनका असली नाम है.
रविनाथ- नहीं यह पंथ
का दिया नाम है.
अरुण- तो इनका असली नाम क्या है
रविनाथ- तुम्हे इस जानकारी से क्या फायदा होगा अच्छा होगा ऐसे
प्रश्न तुम पूछो ही नहीं.
अरुण- मुझे अगले स्तर के लिए साधना करने की अनुमति दीजिए.
रविनाथ- आज तुम विलयन विद्या देखो, कल से अनुमति तुम्हे
तुलसीनाथ देंगे.
अरुण सवाल पूछता रहा और अक्षय ध्यान से सुनता रहा. रविनाथ ने
जब सब सवालों का जवाब दे दिया तब रविनाथ और रोहिताश्व ने अरुण और अक्षय को गुफा के
भीतर वाले कक्ष में चलने को कहा. चारों जब भीतरी कक्ष में पहुंचे तो वहाँ एक बहुत
बड़ा द्वार खुला हुआ था.
उस द्वार से निकल कर जब ये लोग बाहर गए तो एक बड़ी खुली सी जगह
में एक अग्निकुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित थी. अग्नि के चारों तरफ एक घेरा बनाये बहुत
से लोग बैठे ही थे. एक तरफ एक चोकोर पत्थर पर सर्वोत्तम बैठे थे. यही दृश्य तो
अरुण ने ऋषिकेश में अपने सपने में देखा था.
रविनाथ और रोहिताश्व
सर्वोत्तम के दोनों तरफ ज़मीन में बैठ गए. अरुण और अक्षय घेरे में बची हुई
जगह पर बैठ गए. अब अरुण ने घेरे में बैठे हुए लोगो को देखा. सबके के चेहरे एकदम
भाव विहीन थे. सब लोग ह्रीं मन्त्र का जाप कर रहे थे. ह्रीं शब्द एक कंपन सी पैदा
करता हुआ गूँज रहा था. सब कुछ एकदम दिव्य सा था. ना दिन था ना रात थी. बस एक
अलसाया सा उजाला फैला हुआ था.
अचानक ही सर्वोत्तम ने आवाज़ लगायी अश्वनाथ, देवनाथ . अरुण अक्षय तुरंत उठ कर सर्वोत्तम के पास पहुंचे. सर्वोत्तम
ने अरुण और अक्षय के सर पर हाथ रखा और घोषणा की. अब ये दोनों तीसरे स्तर पर पहुँच
गए हैं. आज के बाद इनके प्रत्येक सांस के साथ मन्त्र ध्वनि निकलेगी. दोनों ने हाथ जोड़ कर सर झुकाया और
अपने स्थान पर जा कर बैठ गए. अब सर्वोत्तम ने रोहिताश्व और रविनाथ को बुलाया.
दोनों योगी एक दूसरे के सामने खड़े हो गए. अचानक ही रवि नाथ का
शरीर अहिस्ता आहिस्ता धुंए में पिघलने लगा और धुआं एक लकीर बन कर रोहिताश्व के चारों
तरफ घूमने लगा. और धीरे धीरे रविनाथ का सारा शरीर धुंए में बदल गया और जहाँ रविनाथ
थे वहाँ सिर्फ एक बेहंद तेज चमकने वाला बिंदु रह गया और वो बिंदु रोहिताश्व के
सीने में समा गया. रोहिताश्व के चारों तरफ मंडरा रहा धुआं भी रोहिताश्व के शरीर
में समा गया. और रोहिताश्व अब एक बीस वर्षीय युवक जैसे बन गए. दो योगी एक दूसरे
में इस तरह मिल कर एक हो गए थे कि सब देखने के बाद भी कोई इस बात का विशवास नहीं
कर सकता था कि ऐसा कुछ हुआ है.
अब रोहिताश्व/तुलसीनाथ ने सर्वोत्तम की वंदना की. सर्वोत्तम ने घोषणा
करते हुए कहा की आज से तुलसीनाथ पहले स्तर पर पहुँच गए हैं. और परसों एकादशी को स्वर्ग में सशरीर प्रवेश पाने का
द्वार खुलेगा. हमारे पंथ के लोग सब स्वर्ग के द्वार पर चलेंगे. जो उन्नीस लोग यहाँ
पर बैठे हैं उनमे से पांच परसों स्वर्ग में वास पा जायेंगे. अगले तीन वर्षों फिर
किसी और को प्रवेश नहीं मिलेगा.
मुझे मिला कर बीस के बीस साधक परसों वहाँ जायेंगे. जिन जिन को
आज्ञा मिलेगी वो सब प्रवेश पा जायेंगे. बाकी वापस आ कर फिर से साधना शुरू कर देंगे
23
नवंबर 2008
स्वर्ग
का द्वार
सुबह
सुबह बीस साधकों की टोली स्वर्गारोहिणी के लिए सहस्त्रधारा में स्थित गुफा से निकल
कर चल पड़ी, चक्रतीर्थ का मैदान पार करके भीमबार होते हुए सतोपंथ ताल पर पहुँची,
सतोपंथ ताल सतोपंथ पर्वत के नीचे सतोपंथ ग्लेशियर के पिघलने से बना हुआ एक तिकोनी
झील है. यहाँ का पानी इतना साफ़ है की आप तली भी देख सकते हैं. कोई पत्ता तिनका अगर
इस झील में गिर जाता है तो नीले सलेटी रंग के छोटे छोटे पक्षी उसे तुरंत निकाल
देते हैं. मायता है कि ये रूप बदल कर आये हुए गन्धर्व हैं. हर एकादशी को ब्रह्मा
विष्णु और शिव इस ताल में स्नान करके किनारे पर बैठ कर तपस्या करतें हैं जो भी
यात्री इसमें एकादशी को स्नान करके बाहर निकलता है उसे किनारे पर तपस्या रत
त्रिदेव के दर्शन अक्सर हो जाते है. बीस के बीस साधकों ने इस ताल में स्नान किया
और दाहन से खुद को सुखाया और आगे चल पड़े.
बहुत
दुरूह रास्ता पार करके ये लोग आगे चल पड़े. अरुण मन में सोच रहा था कि आज स्वर्ग का
द्वार जब खुलेगा तो मै भीतर झाँक तो ज़रूर लूँगा. अक्षय अरुण के मन की बात जान गया
और मुस्करा दिया. उसके अपने भी यही विचार थे. अक्षय जो बात जानता था वो अरुण भी
नहीं जानता था. आखिर अक्षय ने अरुण से ज्यादा तपस्या जो की थी. अक्षय ने अरुण के
प्यार में कई बार ऊँचा स्तर पाने के मौके खो दिए थे पर उसकी साधना और समर्पण अरुण
से हमेशा ज्यादा रहे थे, कई शक्तियां जो अरुण के पास नहीं थी वो अक्षय के लिए दासी
रूप में काम करती थी. अक्षय को पता था कि आज सर्वोत्तम तो प्रवेश पा जायेंगे और
तुलसीनाथ नए सर्वोत्तम बनेंगे. बाकी चार लोग कौन होंगे यही देखने की बात थी.
ऊँचे
नीचे पहाडो पत्थरों को पार करके ये लोग आगे चल पड़े. चन्द्रकुंड, सूर्यकुंड को पार
करते हुए साधक बढे चले जा रहे थे, छः किलोमीटर के दुरूह रास्ते के बाद सामने था विशाल,
रहस्यमय, स्वर्गारोहिणी सीढ़ियों वाला पर्वत पैंसठ सौ मीटर की ऊँचाई के
साथ इस एक दम खड़ी ढाल वाले पर्वत पर चार
सीढियां दिखाई दे रही थी. कहा जाते है इस पर्वत पर सात सीढियां रावण द्वारा
बनायीं गयी थी. पर हर किसी को सभी सीढियां दिखाई नहीं देती.
पर्वत अभी बहुत दूर था. सभी साधक तेज चल रहे थे. अब पत्थर गायब
हो कर उनका स्थान बर्फ ने ले लिया था. नंगे पाँव नंगे बदन बेहद ठंडा वातावरण, नीचे दायें बाएं आगे पीछे
सब तरफ बर्फ. यही तो है साधना की पराकाष्ठा. अरुण और अक्षय दोनों ने एक दूसरे का
हाथ थाम लिया. पाँव सुन्न हो चुके थे. बदन भी अब जमते जा रहे थे. दाहन विद्या
द्वारा शरीर का तापमान बढ़ाया तो कुछ जान सी आई. अचानक ही सभी की गति आश्चर्यजनक
रूप से तेज हो गयी, आसपास के सभी

सभी दृश्य तेजी से गायब होते जा रहे थे. ऐसा लग रहा था वे लोग
चल नहीं उड़ रहे हो अरुण ने अक्षय से पूछा कि यह हो क्या रहा है. अक्षय बोला, शायद वो घड़ी जिसमे स्वर्ग के द्वार
खुलने थे नज़दीक आ रही है इस लिए सर्वोत्तम
सबको तेजी से वहाँ ले जा रहे थे.

अरुण की उत्कंठा बढती जा रही थी. जिसके लिए उसने पांच जन्म और
पांच सौ सोलह साल लगा दिए थे उस मंजिल के अवलोकन की घड़ी नज़दीक आ गयी थी. अब वे लोग
स्वर्गारोहिणी की सीढीयों तक पहुँच गए. यहाँ पर आ कर पूरा टोला रुक गया और
सर्वोत्तम के कहने पर सब लोग हाथ जोड़ कर खड़े हो गए. सर्वोत्तम ने मन्त्र जप शुरू
कर दिया सब लोग एक स्वर में उनका साथ देने लगे. मन्त्र जप की कंपन सारे वातावरण
में गूंजने लगी. अब कंपन पहाड़ों में भी होने लगी. मन्त्र गूंजने लगे. लग रहा था कि
अब वातावरण ने भी मन्त्र जप शुरू कर दिया था.
सामने की धुंध छंटने लगी और स्वर्ग की सीढियां नज़र आने लगी. एक
चमत्कारी सा दृश्य था. चातक पक्षी जैसे स्वाति नक्षत्र में बरसे पानी को सोख जाता
है ठीक वैसा ही कुछ अरुण और अन्य सभी साधक कर रहे थे. एक एक दृश्य को आँखों में
बसा लेना चाहते थे.

सर्वोत्तम के आदेश पर सभी साधक आगे बढ़ने लगे. बर्फ के ऊपर
गिरते फिसलते लुढकते पर उठ कर फिर दौड पड़ते.

पहली सीढ़ी पार करने के
बाद अचानक ही सर्वोत्तम हवा में उठने लगे, पीछे पीछे पंथ के सबसे बूढ़े गन्धर्वनाथ
भी उठने लगे, इनके पीछे पीछे रामनाथ और वेदनाथ भी हवा में उठ गए. चारों साधक हवा
में ठहर गए. बाकी साधक दम साढे इन्तेज़ार कर रहे थे कि एक बचे हुए साधक कौन होंगे
जिनकी यात्रा आज सम्पूर्ण हो जायेगी.
सर्वोत्तम का मंत्रजाप लगातार चल रहा था. अचानक ही कुछ ऐसा हुआ
जिसकी उम्मीद कभी कोई कर ही नहीं सकता था. स्वर्ग के उस रास्ते पर जहाँ से कहा
जाता है कि विमान युधिष्ठर को लेने आया था, दो पहाड़ों के बीच से झाँक रहे आसमान
में एक गोल बिंदु जैसा उभरा जो बड़ा होते होते एक रास्ते एक खिड़की जैसा बन गया. उस
खिड़की से तेज प्रकाश निकल रहा था. सभी साधकों की आंखें स्वतः बंद होने लगी.
जैसे बवंडर सब चीज़ें अपने भीतर खींच लेता है वैसे ही चारों
साधक उस खिड़की के भीतर खींचते चले गए और उस असीम प्रकाश में समा गए. आकाश में एक
मानवाकृति का एक प्रकाश पुंज उभरा

इस दैविक आकृति ने कहा, साधको आज से सत्यपंथ के नए सर्वोत्तम
तुलसीनाथ होंगे और आज प्रवेश पाए चार साधकों के अलावा एक और साधक को भीतर ले जाने
के लिए मै स्वयं आया हूँ. मै स्वर्ग के इस द्वार का रक्षक हूँ. आज जिस पांचवें
साधक को मै लेने आया हूँ उनका नाम है रुद्रनाथ तीन सौ साल की तपस्या कर चुके इस
साधक के लिए स्वयं इंद्र महाराज ने मुझे भेजा है.
रुद्रनाथ नामक साधक हवा में उठा और उस दिव्य पुरुष के साथ
स्वर्ग के रास्ते में चल पड़ा. पीछे रह गए पन्द्रह साधकों ने स्वर्ग को प्रणाम किया
और वापस मुड चले. मंजिल देख ली थी. स्वर्ग की सीढ़ियों से वापस सहस्त्रधारा तक का
रास्ता कब पार हो गया किसी को पता भी नहीं चला. कौन सी शक्ति रात में उजाला करके
उन्हें वापस लायी थी तुलसीनाथ के अलावा कोई नहीं जानता था.
वापस
साधना गुफा में.
24 नवंबर2008
तुलसीनाथ ने सभी साधकों को बुलाया और पंथ संचालन के लिए कुछ
नियम सबको बताये. सभी साधक गुफा के भीतर इकट्ठे हुए. तुलसीनाथ बोले, आजसे शुभनाथ
और शमिनाथ दूसरे स्तर पर और अश्वनाथ और देवनाथ तीसरे स्तर पर. राघव्नाथ और केशवनाथ
तथा सुनन्दा चौथे स्तर पर, केवलनाथ राजनाथ रक्षानाथ रामनाथ और देवी सुभद्रा देवी
नेह्वती और शीशनाथ सब पांचवें स्तर पर हैं.
आज से शमिनाथ पंथ के छठे स्तर से नीचे के सभी साधकों के और
शुभनाथ यहाँ पर उपस्थित तेरह साधकों के पथप्रदर्शक बन कर कार्य करेंगे
अब मेरा समय आ गया है की मै आलोप रह कर सबका ध्यान रखूं. इस
गुफा में आज से शमिनाथ का वास होगा. और वाता मे शुभनाथ अपने दल के साथ साधनारत
रहेंगे. आप सब की मंजिल अब बहुत पास आ गयी है. आप सब को मेरा शुभाशीष. कह कर
तुलसीनाथ आलोप हो गए.
शुभनाथ ने तेरह साधक जो पांचवें या इससे ऊपर के स्तर को पा
चुके थे उन्हें लेकर गुफा से बाहर आ गए. अरुण ने शुभनाथ से पूछा, हे उत्तम यह तो
बताइए यह वाता क्या है. शुभनाथ ने अरुण को बताया कि जहाँ परसों हम लोग सर्वोत्तम
से मिले थे उस स्थान को वाता कहतें है. इस गुप्त स्थान का निर्माण वायुदेव ने अपनी
साधना के लिए किया था, वात का अर्थ है वायु. यहाँ पर वायुदेव पवन ने अपने निरंतरता
पायी थी. इस सिद्ध साधना स्थल पर हमारे पंथ के सैकड़ों साधकों ने तपस्या की है.
जितने भी साधक स्वर्ग पहुंचें है उनमे से नब्बे प्रतिशत लोगों ने यहीं पर साधना की
है.
अब सभी तेरह साधक शुभनाथ के साथ वाता नामक जगह पर पहुंचे. अरुण ने पुछा, उत्तम यह
बताइए कि वाता में ना दिन दीखता है ना रात बस एक दिव्य सा उजाला फैला रहता है. ऐसा
कैसे होता है. शुभनाथ ने बताया कि इस उजाले का रहस्य किसी को नहीं पता, यहाँ कौन
सी शक्ति वास करती है शायद सर्वोत्तम जानते हों.
अब शुभनाथ ने सभी साधकों के साधना स्थल निश्चित कर दिए. सुनंदा
नेहावती और सुभद्रा को अग्नि के पूर्व में व् स्वयं अग्निकुंड के उत्तर में और
बाकी सभी साधकों को अग्नि कुंड के दक्षिण में स्थान दे दिए गए. अग्निकुंड के
पश्चिम का स्थान खाली रखा गया. पता नहीं क्यूँ.
साधना का काल फिर से शुरू हो गया. सभी साधक उस मार्ग पर चल पड़े
जिसकी मंजिल मोक्ष है. अब अरुण को त्राटक की विद्या सिखाई गयी. त्राटक के लिए
तुलसीनाथ ने एक स्फटिक का गोला अरुण के सामने रखा. यह गोला एक दम आँखों की सीध में
था. एक प्रकाश स्त्रोत इस गोले को रोशन किये हुए था. अरुण को एकटक गोले में देखना
था. अरुण ने शरीर को ढीला छोड़ दिया और गोले को देखना शुरू कर दिया. मन के सभी
विचार धीरे धीरे समाप्त होने लगे. अरुण उस चमकते गोले में डूबता चला गया. दिन हफ्ते
बने हफ्ते महीने बन गए, महीने साल में बदल गए. अरुण का मन एकाग्र हो कर उस गोले
में ही बसता चला गया. अब अरुण का अपने मन के घोड़ों पर पूरा नियंत्रण हो गया.
उधर अक्षय ने आसनी
नामक साधना में विजय पा ली थी. इस विद्या से अपने आसन पर बैठे बैठे जिस व्यक्ति या
वस्तु को चाहो अपने सामने बुलाया जा सकता था. दोबारा एक वर्ष की साधना से अक्षय ने
आसनी को दोबारा पा लिया और एक विद्या चुपके से अरुण को अर्पित कर दी. उधर अरुण ने
त्राटक विद्या दोबारा पा कर अक्षय को दे दी. सर्वोत्तम और शमिनाथ सब देख रहे थे.
अरुण और अक्षय का ऐसा स्नेह देख कर उन्हें अच्छा भी लगता और बुरा भी. अच्छा इस लिए
कि दो साधक एक दूसरे की सहायता कर रहे हैं बुरा इसलिए कि यह लगाव बहुत बार मोक्ष
के आड़े आ जाता है. अरुण और अक्षय को अलग अलग स्थानों पर भेज दिया गया. अब अक्षय
हरियाणा के जींद में जयंती देवी मंदिर में साधनारत हो गया और अरुण सतोपंथ के पास
एक गुफा में साधना रत हो गया.
अक्षय
का असीमनाथ से मिलना
फरवरी2010 से अप्रैल2011
हरियाणा के जींद नगर में स्थित वैदिक काल के सिद्ध शक्तिस्थल
जयंती देवी पर अक्षय साधनारत था. सायंकाल में जब अक्षय देविप्रतिमा पर त्राटक
लगाता तो अक्सर एक अन्य साधक उसी समय वहीँ आता था. दोनों साधक एक दूसरे के शरीर से
निकलने वाली उर्जा से एक दूसरे को जान गए थे. पर एक दूसरे से बात नहीं करते थे.
दोनों की मंजिल एक ही थी मार्ग भी लगभग एक ही था. एक दिन शाम को शुक्रवार बारह
फरवरी को शुक्र की होरा में देवीप्रतिमा से शक्तिपुंज निकलने लगे. ठीक उसी क्षण
दोनों साधक एक साथ वहाँ पहुँच गए और शक्तिपुंज को ऐसे सोखने लगे जैसे कि जन्म जन्म
के प्यासे हों. उसी क्षण दोनों एक प्रगाढ़ मित्रता के बंधन में बांध गए. दूसरे साधक
का नाम असीमनाथ था. वह तंत्र और मन्त्र द्वारा साधना कर रहा था. दोनों लगभग एक
समान ही स्तर के साधक थे. दोनों साधकों का साथ तीन महीने का रहा. फिर अक्षय को
वापस सहस्त्रधारा आने का आदेश मिल गया.
जून के महीने में असीमनाथ और अक्षय एक साथ हरिद्वार चले गए और
दोनों ने गंगा तट पर एक साथ साधना की.. और वहाँ से अक्षय सहस्त्रधारा चले गए और असीमनाथ
अपने साधना स्थल पर वापस आ गए. अब अक्षय और तिलकनाथ मानसिक तरंगों से एक दूसरे के
संपर्क में रहते.
अक्षय कई बार अरुण के पास जाना चाहते थे पर आज्ञा ना होने के
कारण मन मसोस कर रह जाते. अपने मन की बातें करने के लिए उनके पास असीमनाथ थे. एक
दिन सितम्बर के महीने में असीमनाथ गणपति साधना में व्यस्त थे और अक्षय उनसे मिलने
के लिए रूपिणी विद्या से रूप बदल कर आ गया. दोनों की आयु में लगभग अठारह वर्षों का
अंतर था और असीमनाथ अक्षय से पुत्रवत स्नेह रखते थे. उस रात गणपति साधना के दौरान
अचानक गणपति विग्रह से शक्ति निकलने लगी.उस समय हुए इस शक्तिपात से दोनों साधकों
को बहुत ऊर्जा मिल गयी. अक्षय ने उस वक्त एक कामना की कि उसे उसका भाई अरुण मिल
जाए. और दैविक योग से उसे उसके भाई के पास जाने का मौका मिल गया.
अक्षय को सतोपंथ जाने की आज्ञा मिलते ही अक्षय तुरंत सतोपंथ
पहुंचा और वहाँ अरुण के साथ मिल कर साधना प्रारंभ कर दी. सर्दी का मौसम शुरू होने
को था. वहाँ एक गुफा में दोनों साधक तपस्या करने लगे. दिसंबर के महीने में बर्फ
गिरनी शुरू हो गयी. अरुण और अक्षय बहुत गहरी समाधी में लीन हो गए. अब अक्सर बर्फ
गिरती और सब रास्ते अवरुद्ध हो गए थे. बिना भोजन बिना निद्रा दोनों निरंतर ध्यान
में रहने लगे. उनके ध्यान के तेज से गुफा के भीतर गर्मी बनी रही. दोनों का ध्यान
फरवरी के माह में खुला. ध्यान से बाहर आते ही दोनों मित्र भूख से बिलबिलाने लगे.
पारगामी विद्या से वे तुरंत सहस्त्रधारा पहुंचे और वहाँ उत्तम शमिनाथ की आज्ञा से
जोशीमठ चले गए. वहाँ चार माह के बाद दोनों ने भोजन प्रारंभ किया. सबसे पहले
उन्होंने गरम पानी में लौंग दालचीनी इलायची आदि ली और धीरे धीरे ठोस भोजन शुरू कर
दिया.
मार्च माह में दोनों के शरीर फिर से स्वस्थ और बलिष्ठ हो गए
थे. एक दिन उन्हें वापस सहस्त्रधारा आने का आदेश मिला और वे लोग वाता जा पहुंचे.
वाता में उन्हें एक माह तक रुकने का आदेश मिल गया. अब दोनों मित्र वाता में बाकी
साधकों की सेवा में लग गए. अक्षय कई बार असीमनाथ को याद करते पर असीमनाथ से मानसिक
संपर्क नहीं हो पा रहा था. अक्षय असीमनाथ के पास जाना चाहते थे. उन्होंने अरुण को
कहा कि अगर उसे आज्ञा मिल जाए तो वो असीमनाथ से मिलना चाहते है. अरुण बोला असीमनाथ
के बारे में इतना सुनने के बाद उसे भी असीमनाथ से मिलने की बहुत इच्छा है. दोनों
बात कर ही रहे थे कि उत्तम शमिनाथ उनके सामने प्रकट हुए और बोले कि असीमनाथ से
उनका मिलना अभी उचित नहीं है और इसके लिए अभी आठ महीने का समय बाकी है. दोनों
मित्रों ने पूछा कि अब उन्हें क्या करना है. उत्तम शमिनाथ ने कहा कि चार दिन बाद
जीतेंद्र अरुण के शरीर में विलय हो जायेंगे. उनका पृथ्वीवास अब समाप्त हो जाएगा.
सोलह मार्च को जीतेंद्र बाबू अरुण के शरीर में समा गए. और अरुण
का शरीर जीतेंद्र बाबू का विलय मिलते ही वृद्ध होने लगा और तीस वर्ष के अरुण की
आयु अब बढ़ कर अस्सी वर्ष की हो गयी. अरुण को लगा कि अब उसका भी पृथ्वीवास समाप्त
होने को है. अरुण अगला जन्म नहीं चाहता था. वो अक्षय के साथ कर्णप्रयाग पहुंचा और
माँ अलकनंदा के भीतर छिपी हुई अपनी आयु में से पचास साल निकाल लाया. पचास साल की
आयु पाते ही अरुण अब वापस तीस वर्ष के हो गए.
अक्षय कुछ बातें जानना चाहता था उसने सर्वोत्तम तुलसीनाथ से
संपर्क साधा, तुलसीनाथ के प्रकट होने पर अक्षय ने तुलसीनाथ से पूछा.
अक्षय- जब रविनाथ रोहिताश्व के शरीर में समाये थे तब उनकी आयु
घाट गयी थी पर जब अरुण भैया के शरीर में जीतेंद्र बाबू समाये तो उनकी आयु बढ़ गयी
थी, यह क्या रहस्य है.
तुलसीनाथ- जब रोहिताश्व के शरीर में रविनाथ समाये तब दोनों
जन्म से ही साधना पथ पर थे, पर जीतेंद्र बाबू ने पचास वर्ष सांसारिक बिताए थे
इसलिए वो पचास साल की आयु अरुण की आयु में मिल कर अरुण को पचास साल वृद्ध बना गयी.
अक्षय- क्या इसी आयु में अरुण भैया मोक्ष पा जायेंगे.
तुलसीनाथ- हाँ
अक्षय- कितने साल बाकी हैं
तुलसीनाथ- थोड़ी ही साल बाकी है.
अक्षय- असीमनाथ के साथ मेरा नाता कितने सालों का या कहिये
जन्मो का है.
तुलसीनाथ- असीमनाथ से पूछ लेना वो बता देंगे.
अक्षय- क्या असीमनाथ भी इसी जन्म में मोक्ष पायेंगे.
तुलसीनाथ- इसका उत्तर अभी प्रभु इच्छा से मै नहीं जानता.
तुलसीनाथ अक्षय अरुण की वंदना ले कर अंतरध्यान हो गए. और अरुण
अक्षय को अब पंथ संचालन के लिए उत्तरकाशी भेज दिया गया.
तीन
साधकों का देह त्याग
12 अप्रैल 2011
वाता में एक दिन बड़ी गहमा गहमी थी. आज मंगलवार बारह अप्रैल का
दिन था. आज भगवान राम की जयंती रामनवमी का पावन दिवस था. शमिनाथ ने सभी साधकों को
इकठ्ठा किया और बताया कि सर्वोत्तम आज सबसे बात करेंगे. सब साधक एक दूसरे की तरफ
देखने लगे कि अचानक क्या बात हो गयी है.
सर्वोत्तम प्रकट हुए और सिद्धासन पर बैठ गए. सम्पूर्ण वाता एक
दिव्य तेज से जगमगाने लगा. धीर गंभीर वाणी में सर्वोत्तम तुलसीनाथ कहने लगे, देह
की दुर्बलता के कारण तीन साधकों ने शरीर त्यागने की आज्ञा मांगी है. और आज उन्हें
इस दैविक घड़ी में शरीर त्यागने की आज्ञा देवासन से मिल गयी है. आप तीनो साधक इस
जीर्ण शरीर को त्याग कर अंतरिक्ष में अपने नए जन्म की प्रतीक्षा करेंगे. आपके
वृद्ध और जीर्ण शरीर बिंदु रूप में स्वर्ग मार्ग पर स्थापित कर दिए जायेंगे. परम
सत्ता आपको अगले जन्म में अति शीघ्र पंथ में आने का मार्ग दिखाएंगें इसी कामना के
साथ राघवनाथ, केवलनाथ, नेहवती अब ह्रीं के उच्चारण के साथ अपने प्राणों को ब्रहम
रंध्र से निकाल दें.
तीनो साधकों ने ह्रीं बीज का दीर्घ उच्चारण किया और तीनो के
शरीर निर्जीव हो कर वहीँ जमे रह गए. और उनके शरीर से एक रहस्यमयी ज्योतिपुंज सिर
में चोटी के स्थान से निकल कर आकाश में उठती चली गयी. बारह साधक इस अनोखी घटना को
देख रहे थे. जब ज्योतिपुंज अंतरिक्ष में गायब हो गए तो सबने पीछे रह गए उन निर्जीव
शरीरों को देखा जिनसे इनकी पहचान थी. अब आकाश से एक रोशनी नीचे आई और तीनो साधकों
का शरीर सिकुड़ने लगा.
सिकुड़ते सिकुड़ते इनका शरीर एक बाजरे के दाने जितना रह गया और
फिर जैसे ऊपर की खाल पिघल गयी हो ऐसा कुछ हुआ और तीन रोशनी के बिंदु उन दानो की
जगह रह गए और तीनो बिंदु सर्वोत्तम के हाथ
में चले गए और सर्वोत्तम ने उन्हें संभाल कर पकड़ लिया. सर्वोत्तम उन्हें ले कर चले
गए और बाकी साधक समझ गए कि यह तीन शरीर अब स्वर्ग की राह में आने वाले पथिकों की
चरण धूल पाएंगे.
अब पंथ में पहले पांच स्तरों में सर्वोत्तम के अलावा ग्यारह
साधक रह गए थे. अरुण और अक्षय वापस उत्तरकाशी चले गए. उनका मानसिक जप लगातार चल
रहा था. सभी तरह के नियम क़ानून का भी पूरा पालन कर रहे थे. अरुण उत्तरकाशी के
आश्रय का प्रमुख बन गया था और एक दिन अक्षय बोला, भैया आज अट्ठारह अप्रैल है. इसी
दिन तीन साल पहले मै आपको पंथ में वापस लाने के लिए मिला था. और आज फिर एक साधक
वापस पंथ में आ रहा है. आपको उसे दिव्यदर्शन करवाने हैं.
एक नया अक्षय इस नए अरुण को लेकर आ रहा है. आज रात वो इसी
आश्रय में रुकेगा. यह सोच कर अरुण मुस्करा उठा. तभी पंथ का बारहवें स्तर का साधक
निवृतिनाथ एक युवक और युवती को ले कर आश्रय में आया. अरुण का धीर गंभीर तेजोमय
रूप श्वेत वस्त्र,कन्धों पर लहराते काले
रेशमी बाल सतर बलिष्ठ शरीर को देख कर आगंतुक युवक और युवती तुरंत ही प्रभावित हो
गए. युवक का नाम आदित्य और युवती का नाम मेखला था. दोनों पति पत्नी थे. अरुण की ही
तरह उन दोनों को भी जीवन के सच्चे मूल्यों की तलाश थी. पिछले जन्म में भी दोनों
पंथ के साधक रह चुके थे. अरुण और अक्षय ने रात को उन्हें उनका पिछला जन्म दिखा
दिया और अगले दिन सुबह उन्हें श्रीनगर माँजी के पास भेज दिया.
अरुण और अक्षय का उत्तरकाशी में वास तीस अप्रैल को समाप्त हो
गया और वे दोनों उत्तम के आदेश पर दिल्ली चले गए. दिल्ली में चार महीने रहने के
बाद दोनों वापस वाता वापस आ गए. उत्तरकाशी और दिल्ली में अरुण अक्षय की मुलाकात
बहुत से साधकों से हुई थी. उनसे बहुत कुछ सीख कर
उन्हें बहुत कुछ सिखा कर अरुण और अक्षय अब दूसरे स्तर पर पहुँचने वाले थे.
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