दोस्तों
आपका अपना डॉ. विवेक सिंगला आपको एक ऐसी जगह ले जा रहा है जहाँ कहा जाता है कि वहाँ से स्वर्ग जाने का रास्ता शुरू होता है. यह जगह भारत के उत्तराखंड राज्य में बद्रीनाथ नामक तीर्थस्थान मे स्थित है.
जब आप बद्रीनाथ पहुंचतें हैं तो बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर आगे माणा नामक गाँव स्थित है. इस गाँव से अलकनंदा नदी को पार करके इंसानी बस्तियों से दूर बर्फ से लदे पहाड़ों के बीच बेहद दुर्गम रास्ते पर पदयात्रा करके आप स्वर्गारोहिणी पर्वत तक पहुँच सकते हैं. जहाँ से स्वर्ग के लिए कुछ सीढियां दिखाई पड़ती हैं
मेरा यह उपन्यास इसी जगह के बारे में लिखा गया है.
कहानी सच है या नहीं खुद पढ़ कर जान लीजिए
- स्वर्ग पथिक
पांचवां जन्म(1980 से 2010)
एक ज्ञान पिपासु के मन में कुछ सवाल उठे. ये सवाल अथाह सागर की लहरों की तरह उसके मन के भीतर हल चल मचाने लगे. जो सवाल उसे सबसे ज्यादा परेशान कर रहा था वो था ईश्वर है या नहीं. ईश्वरीय सत्ता क्या है . जो हरेक धर्म कहता है कि ईश्वर का आस्तित्व है इस बात में कुछ सच्चाई है या नहीं. या मानव समाज को मुठ्ठी मे रखने के लिए कुछ चतुर लोगों ने यह परिकल्पना कर ली है. बचपन के संस्कार प्रत्येक मानव को धर्म भीरु बना देते हैं. कोई भी कष्ट आते ही भाग पड़ते है मंदिरों मस्जिदों गिरजों गुरुद्वारों की ओर.
शंका बढ़ने लगी. शंका के साथ अशांति आ गयी. अशांति के आते ही नींद उड़ने लगी, बेचैनी इतनी हो गयी कि पुस्तकों का सहारा लिया. किसी पुस्तक में उसे मनचाहे उत्तर नहीं मिले. अब बारी आई ब्राह्मणों की. ब्राह्मणों के पास भी उसे सवालों का जवाब नहीं मिला. अब वो साधुओं की ओर दौड़ने लगा. जिन साधुओं को उसने देखा कोई बाबा, कोई ऋषि कोई बापू, कोई भाई बन कर अपनी दूकान चला रहा है. दुकानें भी क्या थी चमचमाते शोरूम थे. जितना बड़ा साधु उतना बड़ा आश्रम उतना बड़ा शिष्य दल. वही घिसी पिटी बातें. और सिर्फ लक्ष्मी के उपासक.
मन खट्टा होने लगा और एक बार यही महसूस हुआ कि यह सब ईश्वर और ईश्वरीय सत्ता सिर्फ ढकोसला है. सब कमाई के धंधे हैं. मुर्ख लोग इन कपटी लोगों के वाकजाल मे ऐसे उलझ गए हैं जैसे मकड़ी के जाल में कीड़ा. जितना भी छूटना चाहता है उतना ही उलझ जाता है. बचपन की एक कहानी याद आ गयी जिसमे लिखा था कैसे एक अंधी बुढिया आटा पीस रही थी और उसके अनजाने मे एक कुत्ता वो आटा खाए जा रहा था. उसे भी महसूस हुआ कि यह सारे तथाकथित साधुओं के भक्त भी अंधी बुढिया के तरह परिश्रम किये जा रहें है और यह साधू समाज निठल्ले रह कर भी पूरी शान-ओ-शौकत से जिंदगी के मज़े लूट रहें हैं.
अब बारी आई ध्यान लगाने की,तपस्या की, शरीर के जोड़ जाम होने लगे. मन को कुरेदना शुरू हुआ. प्रश्नों के उत्तर अब गणितीय समीकरणों से स्मृति के भीतर छिपे ज्ञान से ढूँढने की प्रक्रिया शुरू हुयी. कुछ हाथ नहीं लगा. हाथ आई तो वो भूली यादें जो समय की धुल से ढक चुकी थी. लगा उसके सारे प्रयत्न सिर्फ एक भूल भूलैया थे जहां वो घूमता रहा और बार बार , हर बार उसी पुराने स्थान पर वापस ले आता है जहाँ से से यह यात्रा शुरू हुयी थी.
इस ज्ञान पिपासु का नाम था अरुण. माता-पिता ने सोचा था यह अरुण आकाशगामी अरुण(सूर्य) की तरह अंधकार को दूर करेगा पर यहाँ तो अरुण महोदय खुद अपने मन मे अन्धकार ढो रहे थे किसी चिराग या मशाल से तो क्या यह अन्धकार सूर्य से भी दूर नहीं हो पाया .अरुण एक बेहद कम बोलने वाला छः फुट लंबा सुन्दर युवक था पर उसकी गंभीरता के कारण उसके मित्र भी कम ही थे
एक दिन कुछ मित्रों के साथ शाम को बैठे अरुण ने अपने मन की व्यथा अपने मित्रों के सामने खोल कर रख दी. उनके एक मित्र विशाल ने कहा कि अरुण को माणा चले जाना चाहिए. माणा भारत के उत्तर में स्थित उत्तराखंड राज्य का अंतिम गाँव कहा जाता है. भारत के जन समाज के मानस मे यह कूट कूट कर भरा हुआ विचार है कि माणा से आगे स्वर्ग का रास्ता शुरू हो जाता है और स्वर्ग के इच्छुक बहुत से साधू ऋषि महात्मा वहाँ पर तपस्या में लीन रहते हैं, जिन्हें आम जन मे कोई रूचि नहीं है और सच्चे योगी भी हिमालय की इन्ही कंदराओं मे मोक्ष की प्रतीक्षा मे रत हैं.
अरुण को लगा कि शायद रास्ता मिल गया. अब अरुण के सामने दिक्कत थी कि उसे छुट्टियाँ कैसे मिलेंगी. उसने अपने उच्च अधिकारी से बात की. अधिकारी महोदय ने कहा कि उसे अर्जित अवकाश ले लेना चाहिए. अब अरुण ने अर्जित अवकाश के लिए आवेदन कर दिया और जब घर आया तो देखा माँ उसी का इन्तेज़ार कर रही थी. आज माँ का मूड कुछ सख्त सा महसूस हुआ और अरुण समझ गया कि आज फिर बदली छाई हुई है और बरसात के पूरे आसार हैं. पापा की गाड़ी अभी आई नहीं थी इसका मतलब बिजली कड़कने के मौसम थे ही नहीं. घर की नौकरानी रूपा ने जब देखा कि अरुण आ गया है तो वो जल्दी से पानी ले आई
अरुण पानी पीते हुए अपने ऊपर होने वाले इस हमले के तोड़ सोचने लगा. तभी रूपा बोली”भैयाजी खाना लगा दूँ क्या.” अरुण ने हामी भरते हुए माँ की तरफ देखा तो पाया कि वो भी कुछ सोच रही थीं. रूपा ने खाना लगा दिया और अरुण खाना खाने लगा. खाना खा कर अरुण ने माँ से पूछा ,” माँ क्या सोच रही हो.” माँ फट पड़ी,” तू साफ़ साफ़ क्यूँ नहीं बताता, तेरा इरादा क्या है, तेरे साथ के सारे लड़के एक एक दो दो बच्चों के बाप बन गए है. तू तो किसी को हाँ ही नहीं करता, कितने रिश्ते आये. पर इसके नाक पर कोई नहीं चढ़ा. लगता है तेरी शादी का अरमान ले कर ही मर जाउंगी.” माँ ने रोना शुरू कर दिया. अरुण इसे ही बरसात का मौसम कहता था. माँ के इसी मेलोड्रामा से अरुण परेशान हो जाता था. यह तो शुक्र था कि पापा नहीं आये थे वरना इस बरसात के साथ बिजली भी कडकती.
अचानक माँ ने सर उठा कर पूछा,” मेरी कसम खा कर बता, क्या बात है तू शादी क्यूँ नहीं करता. इतनी ज़मीन जायदाद है, पुरखों की इज्ज़त है,एकलौता तू लड़का है. बाप का लंबा चौड़ा कारोबार है. इतना पढ़ा लिखा तू है, देखने में भी इतना सुंदर है. अपनी जिद में नौकरी भी की वो भी इतने बड़े पद पर बैठा है. कमी क्या है,तुने कोई और लड़की तो नहीं पसंद कर रखी?” अब अरुण झल्ला उठा. बोला,” माँ कितनी बार कह चुका मै, पर आप समझते ही नहीं. मैंने कोई लड़की पसंद नहीं कर रखी. आपकी पसंद की लड़की से ही शादी करूँगा. मुझे एक साल का समय दे दो. मै हरिद्वार जा रहा हूँ एक महीने के लिए. एक बार जिस काम में मै लगा हूँ वो पूरा हो जाए फिर जिस भी लड़की को आप कहोगे उसी से मै चुपचाप शादी कर लूँगा.” माँ बोली “ठीक है आज पन्द्रह अप्रैल है अगले पन्द्रह अप्रैल को तेरी शादी कर दी जायेगी.” अरुण बोला “ ठीक है वादा रहा. कल सुबह मै हरिद्वार जाऊँगा और आप पापा को भी बता देना.”
अगले दिन सुबह सुबह अरुण ट्रेन से हरिद्वार चला गया. पांच घंटे का सफर करके अरुण हरिद्वार पहुंचा और वहाँ से बस से ऋषिकेश चला गया. ऋषिकेश मे जा कर अरुण एक होटल में रुक गया. माणा गाँव यहाँ से तकरीबन तीन सौ किलोमीटर की दूरी पर था. ऋषिकेश में जा कर अरुण ने सारा रास्ता पता किया और घर पर फोन किया. फोन पापा ने उठाया. अरुण ने पापा को बताया कि वो हरिद्वार में है और रोज शाम को वो बात करेगा. अगर कोई काम हो तो उसके मोबाईल पर फोन कर लें. पापा ने पूछा आखिर उसे क्या काम है. अरुण ने पापा को बताया कि वो वापस आकर सब बता देगा.अब माँ ने फोन ले लिया और उन्होंने भी बात की. घर पर फोन करके अरुण खाना खा कर सो गया. शाम को सात बजे उठकर अरुण गंगा के किनारे जा कर बैठ गया. सोचने लगा कि योगी को ढूंढेगा कैसे. काफी देर तक वो गंगा के किनारे बैठा रहा. रात के सवा दस बज चुके थे. अधिकतर तीर्थयात्री अपनी धर्मशाला होटलों में लौट चुके थे. गंगा को छू कर आया रही ठंडी हवा मन को बड़ी शान्ति दे रही थी. अरुण वहाँ बैठा रहा. अब तो कोई इक्का दुक्का ही आदमी वहाँ था. गंगा के बहने की आवाज़ लौरी सी सुना रही थी. पर ठंडी हवा तन मे सिहरन सी पैदा कर रही थी. अरुण होटल वापस जाना चाहता था. पर ना जाने क्यूँ वो उठ ही नहीं पा रहा था. बहुत देर हो गयी तो अरुण ने घडी देखी रात के साढे बारह हो चुके थे. अरुण को समझ नहीं आया कि वो पिछले पांच घंटे से यहाँ बैठा है और उसे समय के गुजरने का पता भी नहीं चला. वो उठा और होटल की और चल पड़ा. वो मुश्किल से थोड़ी ही दूर चला था कि उसने देखा गंगा मे से कोई आदमी बाहर आ रहा है. वो हैरान हो गया कि इतनी ठंड में इतने ठन्डे पानी में कौन नहा रहा है. जैसे ही वो आदमी बाहर आया तो अरुण ने गंगा के किनारे लगी लाइटों में देखा कोई पच्चास साल का आदमी शरीर नंग धडंग एक दम उन्नत मांसपेशियां जैसे कोई बोडीबिल्डर हो. मुख पर एकदम अपूर्व शान्ति और बेपरवाह चाल इस व्यक्ति के अंदर एक अजीब सा सम्मोहन था. अरुण उसे देखता रह गया. अरुण ने आसपास देखा पूरे घाट पर अरुण और उस अनजान आदमी के अलावा कोई नहीं था. अब अरुण ने सोचा होगा कोई पागल. अरुण चलने लगा तो उस व्यक्ति ने आवाज़ लगा कर कहा,” अरुण कहाँ जा रहे हो, मै तुमसे मिलने आया हूँ और तुम जा रहे हो. अरुण चिहुंक उठा. हैरान था वो कि यह अनजाना अनदेखा व्यक्ति उसका नाम कैसे जानता है. वो बोला,” मै देवनाथ हूँ. तेरा पुराना साथी. तू कुछ नहीं समझेगा अभी. मै तुझे बताने आया हूँ कल सुबह तू बस ले कर श्रीनगर चला जा, अरुण बोला श्रीनगर तो कश्मीर मे है. देवनाथ बोला अरे नहीं एक श्रीनगर उत्तराखंड में भी है. कल सुबह एक गाड़ी तुझे लेने आएगी और तुझे श्रीनगर पहुंचा देगी. वहाँ तुम्हे आगे का रास्ता पता लग जाएगा.अब अरुण हैरान कि यह सब क्या हो रहा है. उसने कुछ पूछने के लिए मुँह खोला तो देखा कि देवनाथ अचानक ही हवा में घुल गया. जहाँ देवनाथ खड़ा था वहाँ जमीन पर पानी के निशान बता रहे थे कि यहाँ कोई तो था. ज़मीन पर एक रुद्राक्ष कि माला पड़ी थी. अरुण ने वो माला उठा ली और होटल वापस आया. होटल में आकर अरुण ने देखा कि होटल का सारा स्टाफ सो चुका था. अरुण को भूख लग आई थी और खाने को कुछ भी मिलने के आसार नहीं थे. वो अपने कमरे मे पहुंचा तो देखा कि मेज़ पर एक फलों की टोकरी पड़ी है. अरुण ने सोचा हो सकता है होटल वालों की तरफ से कॉम्प्लीमेंट्स में भेजी गयी हो. और उसने फल खा कर पेट भर लिया और बिस्तर पर लेट गया.
नींद तो आ नहीं रही थी वो आज शाम के घटनाक्रम के बारे में सोचने लगा. यह दिगंबर साधू देवनाथ कौन था वो उसे जानता कैसे था. वो गायब कैसे हो गया. यह रुद्राक्ष की माला क्यूँ छोड़ गया. अरुण उठा और मेज से वो माला उठा कर गले में पहन ली. माला पहन कर जैसे ही अरुण लेटा उसे गहरी नींद आ गयी.नींद मे उसने देखा कि वो कुछ आदमियों के साथ पहाड़ों में है. सब लोग आग के चारो तरफ बैठे हैं और एकटक आग को निहार रहें हैं, एक वृद्ध व्यक्ति जिसकी सफ़ेद दाढ़ी और सफ़ेद मूंछे है बहुत लंबे सफ़ेद बालों के साथ एक पत्थर पर बैठा है है और उसके मुँह से कंपन के रूप में कुछ शब्द निकल रहे थे जिनसे सारे माहौल में ही कंपन गूँज रही थी. सभी लोग वस्त्रहीन बैठे थे. अजीब सा समय था. ना दिन था ना रात. एक डरावना सा उजाला और रहस्यमय अँधेरे का मिलन था. चारों ओर उस कंपन के अलावा कोई आवाज़ नहीं थी. उस वृद्ध ने अचानक ही आवाज़ दी “अश्वनाथ “ अरुण ने देखा की वो उठा और उस वृद्ध के पास चला गया. वृद्ध बोली,” तुम्हारा मेरे पास आने का समय हो गया है अब नींद से जागो और बाहर खड़ी गाड़ी में जा कर बैठ जाओ. और अरुण की आँख खुल गयी. अरुण ने देखा छः बजे ही हैं सुबह का उजाला शुरू हो गया है वो उठा और ब्रश शेव आदि करके नहाने चला गया. नहाते हुए वो कल रात के सपने मे घटी घटनाओ के बारे में सोचने लगा.
नहा कर वो तैयार हुआ और नाश्ता करने के लिए होटल के रेस्टौरेंट में चला गया. उसने अपने मनपसंद छोले भठूरे मंगवा लिए और चुपचाप खाना खता रहा. मन में गंगा के किनारे मिले देवनाथ और रात के सपने के बारे मे सोचना ज़ारी रहा. खाना खा कर वो होटल से बाहर घूमने जाने के लिए निकला तो एक गौरे चिट्टे छोटे से कद के पहाड़ी लड़के ने उसे आवाज़ दी,” भाई साहब आपको मेरे साथ श्रीनगर चलना है. गाड़ी तैयार है.” अब अरुण चौंक गया. उसे लगा कि वो इस लड़के को जानता है. उसने होटल का बिल भुगतान किया सामान उठा कर बाहर आया तो वो लड़का एक मारुती जिप्सी गाड़ी ले कर होटल के गेट पर खड़ा था. अरुण ने अपने दोनों बैग पीछे डाल दिए और आगे ड्राइवर के साथ बैठ गया. ड्राइवर बोला भाईसाहब मेरा नाम अक्षय है. आपको श्रीनगर ले कर जा रहा हूँ एक सौ दस किलोमीटर का रास्ता हम चार घंटों में पूरा कर लेंगे. वहाँ पर मै आपको जीतेंद्र बाबू के पास छोड़ दूँगा. अरुण ने कहा,”अक्षय क्या हम पहले मिल चुके है , तुम्हारा चेहरा और आवाज़ जाने पहचाने लग रहें है”. अक्षय हंसा और बोला,” भैयाजी सब याद आ जाएगा आपको. इतना क्यूँ सोच रहे हो. कल रात सपने में तो मिला था मै आपको, गुरु जी के चरणों में बैठे हुए जब हम सब जप कर रहे थे. मै आपके बगल में तो बैठा था. जब गुरु जी ने आपको आवाज़ दी तो मैंने ही आपको हाथ पकड़ कर उठाया था.” अरुण उसे ध्यान से देखने लगा. मुश्किल बीस बाईस साल का यह लड़का उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो उसी के शरीर और आत्मा का हिस्सा हो. किसी अनजाने युवक के साथ वो चल पड़ा था और उसे कोई हिचक या डर भी नहीं था. यह सब सिस्टम उसे समझ नहीं आया रहा था. पर एक बात उसका मन कह रहा था कि पहली बार वो सही रास्ते पर जा रहा था.
रास्ता बहुत ही खूबसूरत था, हरे भरे पहाड़ नीचे बहती हुई गंगा की धारा, मन की सारी उलझाने पहली बार सुलझने सी लगी थी. उसने सिगरेट पीने के लिए पैकेट निकला और अक्षय से पूछा,” तुम सिगरेट लोगे”, अक्षय ने कहा “भैया मै तो अपना ब्रांड पीता हूँ “और उसने अपनी जेब से अपना पच्केट निकला और गाड़ी के सिगरेट लाइटर से दोनों की सिगरेट जला दी. दोनों लंबे लंबे कश लेने लगे. अब अरुण का मन कर रहा था कि वो अक्षय से बात करे.
उसने अक्षय से पूछा तुम क्या काम करते हो. अक्षय बोला भैयाजी जो भी मालिक लोग बोल देते हैं वही करने चल पड़ता हूँ. अब अरुण ने पूछा मालिक कौन तो अक्षय ने जवाब दिया कि बाह्य=उत् ज़ल्दी सब पता चल जाएगा
अब बयासी नाम की जगह रास्ते में आ गयी थी और अक्षय ने बताया कि यहां से बड़ी ही खड़ी चढाई शुरू हो जाएगी और ऐसा ही हुआ. रास्ता बहुत ही यू आकार का था. तीन धारा होते हुए वे लोग देवप्रयाग पहुँच गए. अब अक्षय ने बताया कि देवप्रयाग मे नीले हरे रंग की भागीरथी नदी पीले रंग की अलकनंदा नदी से मिल कर गंगा नदी बनती है और यह उत्तराखंड का आखिरी प्रयाग है. प्रयाग का मतलब दो नदियों का संगम होता होता है जिसमे से एक नदी गंगा अवश्य हो. सबसे बड़ा प्रयाग इलाहाबाद है जहाँ तीन नदियाँ मिलती हैं. अक्षय ने गाड़ी रोक दी और वे लोग सड़क के किनारे से सीढियां उतर कर पुल पार करके उस स्थल पर पहुँच गए जहाँ दोनों नदिया मिल कर एक नदी बन कर ऋषिकेश हरद्वार होते हुए सागर में समाने को बढ़ जाती हैं. बहुत ही दिलकश नज़ारा था. अरुण अभिभूत हो गया और वहाँ वहाँ पर बैठ गया. उसने अक्षय से पूछा हम श्रीनगर से कितना दूर हैं और यहाँ कुछ देर रुकने का मन है. क्या हम रुक सकते हैं. अक्षय बोला भैयाजी आपका जैसे भी मन करे आप वैसा ही कीजिये. मुझे अपना सेवक समझिए. मै आपकी सेवा और संभाल के लिए हूँ. अरुण वहाँ पर बैठ गया. अक्षय ने अपने कपडे उतारे और वहाँ किनारे पर बैठ कर नदी से पानी ले कर नहाने लगा. अरुण बहुत हैरान सा देख रहा था. पानी में जब उसने हाथ डाला था तो ठंडेपन से उसका हाथ सुन हो गया था पर यह तो मज़े से नहा रहा था. नहा कर अक्षय सीधा खड़ा हुआ और आकाश की तरफ हाथ जोड़ कर शरीर को पंजों और जुड़े हुए हाथो के बीच खींचने लगा. जैसे की अंगडाई ले रहा हो. धूप मे उसके गोरे बलिष्ठ शरीर पर पानी की बूँदें चमक रही थी और अचानक ही कमाल हो गया. पानी की बूँदें ऐसे तड़कने लगी जैसे गरम तवे पर हों. और एक ही मिनट मे उसका सारा शरीर सूख गया यहाँ तक कि उसका जांघिया भी. अरुण की आंखें खुली की खुली रह गयी. अक्षय ने कपडे पहने और बोला भैया मै खाने के लिए कुछ ले आता हूँ. आपको भी भूख लग आई होगी. और वो वहाँ से चला गया.
अरुण सोच में पड़ गया कि यह सब कैसे घटित हो रहा है. यह कोई मदारी का खेल नहीं, सामने हुई हकीकत थी. कल रात से उसके साथ ये क्या हो रहा था. सब एक चमत्कार सा ही था. अरुण डरने वाले लोगों में से तो था नहीं. कुछ खोजने निकला था और उससे पहले उसे रुकना नहीं था. वो सोच रहा था कि अब आगे क्या होगा. यह अक्षय से उसका कैसा लगाव है. क्यूँ उसका मन अक्षय से जुडा महसूस करता है. अक्षय की आंखें कुछ कहती हैं पर वो समझ नहीं पाता. अक्षय के इस सम्मोहक व्यक्तित्व के रहस्य क्या हैं.
अरुण के मन में अभी झंझावात चल ही रहा था कि अक्षय वहाँ आया गया. वो पूरी सब्जी ले कर आया था. वे दोनों खाना खा कर बैठ गए. अब अरुण को प्यार लगी थी. अक्षय ने तो पानी गंगा से ले कर पी लिया था पर अरुण का शहरी वातावरण का पालन पोषण उसे गंगा का पानी पीने से रोक रहा था. तभी अक्षय हंसा और उसने एक बिसलेरी की बोतल सामने रख दी. अब अरुण ने बोतल से पानी पी लिया. अरुण सोचने लगा यह क्या हो रहा है मैंने बिसलेरी चाही और इसने सामने ला दी.अभी तक तो मैंने मांगी ही नहीं थी. उसने अक्षय की तरफ मुद् कर देखा तो अक्षय आकाश की तरफ ना जाने क्या ताक रहा था उसके मुख पर दोपहर का सूर्य एक दिव्य सी आभा पैदा किये हुए था. अब अरुण ने सोचा चलो आगे जाते हैं और देखते हैं आगे क्या घटता है.
उसे याद था कि वो लोग नौ बजे ऋषिकेश से निकले थे और अब डेढ़ बज चुका था,अरुण का मन वहीँ बैठने का था पर आगे क्या होगा इसी उत्सुकता में उसने कहा कि अक्षय अब आगे चलते हैं.अक्षय जोर से हंस पडा, उसकी धवल दंतपंक्ति धूप में चमक उठी. अक्षय झुका और बोला जो हुक्म मेरे आका. इतनी नाटकीयता से कहा उसने के अरुण भी जोर से हंस पड़ा. अरुण बोला, अक्षय तुम बहुत प्यारे हो. अक्षय बोला भैया मै तो आप ही का हूँ. अरुण बोला इसका मतलब क्या हुआ. अक्षय बोलने लगा समय आने दो, अरुण ने साथ ही जोड़ दिया “सब पता चल जायेगा ,” और दोनों हंस पड़े. वे वापस जिप्सी की और चल पड़े.
जिप्सी में पहुँच कर वे लोग श्रीनगर की और निकल पड़े. पैंतीस किलोमीटर का यह सफर कैसे कट गया अरुण को पता ही नहीं चला,वो गाड़ी में बैठते ही सो गया था.उसकी आँख खुली तो शाम के चार बज चुके थे.अरुण सोचने लगा कि इसने तो कहा था कि सिर्फ एक घंटे का रास्ता है और हम ढाई घंटे में पहुँच रहे हैं. अक्षय बोल पडा, भैया आप सो गए थे इसलिए मैंने गाड़ी सड़क के किनारे रोक दी थी.और जब आपकी नींद पूरी होने में एक घंटा था तो मैंने गाड़ी चलानी शुरू कर दी थी और आपकी नींद पूरी होते होते हम लोग श्रीनगर पहुँच गए. अरुण फिर से हैरान हो गया कि इसे कैसे पता चला कि मै चार बजे तक सोऊंगा. पर उसने कुछ पूछा नहीं क्यूंकि अक्षय ने फिर बोलना था कि आपको सब पता चल जाएगा. अब अक्षय बोला श्रीनगर पौड़ी गढ़वाल का सबसे बड़ा शहर है.यह शहर गढवाल के राजा अजयपाल ने सोलहवीं शताब्दी में बसाया था. उन्नीसवीं शताब्दी में यहाँ गोरखों ने कब्ज़ा कर लिया था और उसके बाद यहाँ अंग्रेजों ने कब्ज़ा कर लिया था. यहाँ का वातावरण सारे पहाड़ी प्रदेश में सबसे गर्म जगह है. श्रीनगर शहर बहुत भीडभाड वाली जगह था. आधा शहर पार करके तंग बाज़ारों से गुजर कर अक्षय उसे एक साधारण से दिखने वाले पर बड़े से घर में ले गया. घर का दरवाज़ा खुला हुआ थे वे सीधे घर के अंदर चले गए. वाहन एक बड़े से कमरे में कुछ तख़्त लगे ही थे जिन पर रुई का गद्दा और सफ़ेद चादर बिछी हुई थी.
अक्षय ने अरुण को वहाँ बैठाकर भीतर चला गया और भीतर से एक बिसलेरी की बोतल और एक क्रिस्टल का गिलास ले आया. नीले क्रिस्टल का यह गिलास कोई मामूली गिलास नहीं था बल्कि बेल्जियम का बेशकीमती ब्लू क्रिस्टल पोटरी का नमूना था. अरुण देखते ही पहचान गया था. उसने पानी पिया तो अक्षय बोला भैया यहाँ आपको माँजी और जीतेंद्र बाबू मिलेंगे. जीतेंद्र बाबू सोलह हैं. अरुण ने पूछा कि यह सोलह क्या है. अक्षय बोला भैया सोलह वो स्थान है जिसके ऊपर पन्द्रह स्थान और हैं. जब यह सारे स्थान पार कर लेंगे तो ये पंथ के प्रथम आसन पर पहुँच जायेंगे और महामार्ग इनके लिए खुल जाएगा. साधक साधना करते ही ऊपर की सीढियां चढ़ते हुए निरंतर चलता रहता है. अरुण भैया जो भी आपको पता चलता रहे अपने भीतर भरते जाइए. अरुण ने मजाक में पूछा अक्षय यह तो बताओ कि तुम कौन से स्थान पर हो. अरुण बोला भैया मै आपको अपना स्थान बताने के लिए अधिकृत नहीं हूँ.समय की, अरुण ने बात काटी और बोला प्रतीक्षा करो और वो दोनों हंस पड़े. अक्षय अचानक ही गंभीर हो उठा और बोला भैया हो सकता है कि अब मै आपसे अलग हो जाऊं.
अरुण को धक्का सा लगा, बोला तुम कहाँ जा रहे हो, मै तो यहाँ किसी को जानता भी नहीं. अक्षय बोला भैया नौ घंटे पहले तो आप मुझे भी नहीं जानते थे. भैया अभी तक तो मेरे पास बस यहीं तक की आज्ञा थी . अरुण को यह लड़का बहुत प्यारा और बेहद रहस्यमयी लग रहा था. एक जुडाव सा हो गया था.पर जो होगा देखा जाएगा के दृष्टिकोण वाला अरुण खामोश रह गया.
इतने में भीतर से एक बेहद सुन्दर संभ्रांत महिला जिनकी आयु पचास वर्ष के आसपास होगी चाय ले कर आ गयी. उन्हें देखकर अरुण ने उस ममतामयी मूर्ति को नमस्ते की तो वे बेहद मीठी मुस्कान के साथ बोली अरुण आपको ऋषिकेश पहुंचने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई. अरुण बोला, जी नहीं. अब वो बोली, और इस बदमाश अक्षय ने रास्ते में तुम्हे कोई तकलीफ तो नहीं होने दी. अरुण बोला, जी नहीं ये तो बहुत प्यारा लड़का है,इसने तो मेरा गाइड,ड्राइवर, सहयोगी,सेवक सबका काम किया है. तभी वो महिला बोली लो जीतेंद्र बाबु भी आ गए, अरुण ने उनको भी नमस्ते की तो जीतेंद्र बाबू ने उसे बाँहों में भर लिया. कस्तूरी की मादक सुगंध अरुण के दिलोदिमाग को मदहोश करने लगी. जीतेंद्र बाबू साठ वर्ष के लंबे चौड़े दबंग गोरे चिट्टे व्यक्ति थे.
माँजी ने कहा अरुण आप चाय लीजीये. ठंडी हो जायेगी. अब अरुण ने चाय का कप उठाया तो देखा चाय बिलकुल ही महीन चीनी मिटटी के कपों में थी, जिन पर बहुत ही नाज़ुक गोल्ड इनले का काम हो रखा था. यह बर्तन अरुण पहचान गया कि सोलहवीं शताब्दी के चीन की कला के बेशकीमती नमूने थे. ऐसे बर्तन तो सिर्फ म्यूजियम में रखे हुए देखे जा सकते हैं पर आज उसे ऐसे बर्तनों में खाने पीने का मौका मिल रहा था. अरुण हैरान था कि इतने साधारण घर में इतने महंगे बर्तन. चाय समाप्त होते ही कुछ पन्द्रह सोलह साल के बच्चे आये और बर्तन उठा कर ले गए. माँजी और अक्षय भी भीतर चले गए.
अब धीर गंभीर आवाज़ में जीतेंद्र जी बोले, अरुण जी, आज शाम और रात आप यहीं बिताएंगे, कल सुबह अक्षय आपको रुद्रप्रयाग ले जायेंगे मेरे पास आपके लिए इतनी ही सूचना है. आज रात को आपको पंथ के बारे में कुछ बेसिक बातें भी पता लग जायेंगी. मेरा समय समाप्त हो गया है. अब मै आज्ञा पाने का इच्छुक हूँ. कृपया गमन का आदेश दीजिए. अरुण को समझ नहीं आया कि जीतेंद्र किस्से आज्ञा मांग रहे हैं. तभी उसी नज़र पड़ी उसके पीछे माँजी और अक्षय खड़े हुए थे. दोनों ने अपना दांया हाथ ऐसे हिलाया जैसे कोई किसी को थपकी देता हो. और जीतेंद्र जी एक दरवाज़े के भीतर चले गए.
अरुण समझ गया था कि अक्षय जीतेंद्र से ऊँचे स्तर पर था. और फिर भी वो इतना नरम स्वभाव का कैसे था. लगता था फिर से अक्षय अरुण के मन की बात समझ गया था वो जोर से हंस पड़ा बोला भैया चलो आपको श्रीनगर घुमा लाते हैं. और अक्षय एक बाइक पर बैठा कर अरुण को वहाँ के बाज़ार, अलकनंदा हाइडल प्रोजेक्ट, श्रीनगर हाइडल प्रोजेक्ट, गुरुद्वारा चरण पादका, मेडिकल कालेज आदि वैगरह आदि घुमाता रहा. पर इस भीड़ भरे शहर में अरुण को कुछ भी पसंद नहीं आया. उसका मन तो इन लोगों में उलझा हुआ था जिनके साथ किस्मत का एक अनोखा खेल उसे जोड़ रहा था. वो चला आया था अपने घर परिवार दोस्तों से इतनी दूर, अनजान शहर, अनजान लोग. अचानक अक्षय बोला, भैया घर चलें हमे लगता है देर हो गयी है. अरुण ने हामी भर दी. अरुण ने अक्षय की तरफ देखा और सोचने लगा, एक यह अक्षय है एक प्यारे नजदीकी दोस्त जैसा बन गया है. साथ में सिगरेट पीते चुटकुले सुनते हंसी मजाक करते दिल बहलाव कर रहा था. इसके बारे में भी मै कुछ नहीं जानता कौन है यह,कहाँ से आया है, माँ बाप कहाँ है,अचानक अक्षय बोला, भैया घर चले क्या. हमे देर हो गयी है आज तो माँ जी खाल उधेड़ देंगी. अरुण ने हामी भर दी. और अक्षय बाइक पहाड़ी रास्तों पर दौड़ाने लगा. अरुण को बहुत डर लगा,उसने दो तीन बार अक्षय को बाइक अहिस्ता चलाने के लिए भी कहा पर अक्षय ने सुना ही नहीं. जल्दी ही वो लोग घर पहुँच गए.
घर पहुँच कर अक्षय अरुण को एक कमरे में ले गया, जहाँ अरुण का सामान रखा था. अक्षय ने अरुण को जल्दी से नहाने के लिए कहा. अरुण का मन नहीं था नहाने का पर फिर भी वो नहाने के लिए बाथरूम में चला गया. अंदर तौलिया साबुन शेम्पू सब था. एक बाल्टी में गरम पानी भी भरा हुआ था. अरुण ने जल्दी से कपडे निकाले और फटाफट नहा कर बाहर आ गया और कुरता पैजामा पहन लिया. तभी माँ जी अंदर आईं और बोली, अरुण जी तुमने आज अपने माता पिता को फोन नहीं किया, वे परेशान हो रहे हैं. अरुण हैरान हो गया कि इन्हें कैसे पता चला कि उसे रोज शाम को घर फोन करना है. उसने घर फोन मिलाया और माँ और पापा से बात की. अरुण ने समय देखा रात के नौ बज चुके थे. तभी अक्षय अंदर आया और बोला भैया चलो खाना खाते हैं.
अक्षय अरुण को खाने वाले कमरे में ले गया जहाँ ज़मीन पर एक दरी बिछी हुई थी और दरी के सामने चौंकियां लगी हुई थी. अक्षय ने अरुण को एक चौंकीं के आगे बैठा दिया और खुद दूसरी चौंकी के सामने बैठ गया. अब कमरे में बहुत से लोग आने लगे. सब भीतर आते अरुण और अक्षय को हाथ जोड़ कर नमस्ते करते, और अक्षय उनका परिचय करवाता चला गया. विश्वनाथ अठारह,रमेश सत्रह, शकुंतला उन्नीस,सरोज सत्रह,विमल चौदह,राज चौदह,निगम पन्द्रह,जीतेंद्र जी से तो आप मिल ही चुके हो. सब लोगों ने अपना स्थान ले लिया. सिर्फ एक चौंकी खाली थी. माँ जी अंदर आईं तो अक्षय को छोड़ कर सभी खड़े हो गए, अरुण भी खड़ा हो गया. माँ जी का सभी ने अभिवादन किया, जिसे उन्होंने बड़ी मीठी मुस्कान के साथ स्वीकार किया. सब लोगों के बैठने के बाद अरुण ने ध्यान से देखा उसके और अक्षय के अलावा सभी पचास साल से बड़ी आयु के थे. माँ जी बोली, अरुण आप कुछ सोच रहे है खुल कर पूछ लो. अरुण बोला,” माँ जी आप जब जान ही गए हो तो मेरे प्रशन का उत्तर भी दे दो. माँ जी बोली,” मेरा नाम शुभा है और मै दसवें स्तर पर हूँ और इस आश्रय की अध्यक्षा हूँ. आज की रात तुम्हारे कुछ प्रश्नों का उतर ले कर आई है. प्रतीक्षा करो
तभी बहुत से बच्चे खाना ले कर आ गए और सब लोगों ने खाना खाना शुरू कर दिया. खाना बेहद सादा पर बेहद स्वादिष्ट था. अरुण ने ऐसा खाना कभी नहीं खाया था. खाने के बाद सब लोग चले गए. सिर्फ अरुण अक्षय और माँ जी कमरे में रह गए. माँ जी बोली अरुण जी, अरुण ने तुरंत टोका आप मुझे अरुण जी क्यूँ कहतीं है मै तो आपके बेटे जैसा हूँ, माँ जी बोली,” अरुण जी रिश्ते नाते हम लोगों को नहीं बांधते, आप मुझ से ऊंचे स्तर पर है इसलिए तो मै आपसे सम्मान से बात कर रही हूँ. अब अरुण चौंक पडा,” मै आप से ऊँचे स्तर पर, आप क्या कह रही हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा. माँ जी बोली,” मेरी बात सुनो, अब समय निकट आ गया है तुम्हे बहुत सी बातें पता चल जायेंगी. अक्षय आप अरुण जी को दिव्य दर्शन करवा दो. कह कर माँ जी कमरे से बाहर चली गयीं.
अरुण ने अक्षय की और देखा तो पाया अक्षय अब बीस बाईस साल का लड़का नहीं बल्कि एक धीर गम्भीर शांत योगी नज़र आ रहा था.
अक्षय उठा और अरुण को बोला आप मेरे साथ आइये, अरुण अक्षय के साथ चल पडा. अक्षय अरुण को ले कर एक दरवाजे में प्रवेश कर गया. सामने ही सीढियां थी वे लोग ऊपर चले गए. ऊपर फिर एक कमरा था, जहाँ जा कर अक्षय अरुण को बोला, आप अपने पहने हुए कपडे निकाल कर ये वेषा धारण कर लीजिए. अक्षय ने अपने सभी कपडे निकाल दिए और सम्पूर्ण नग्न दत्त दिगंबर हो गया और एक सफ़ेद चौगा सा पहन लिया. अरुण ने अपना कुरता पैजामा और बनियान निकाल दी पर अक्षय के सामने अंडरवियर निकालते हुए उसे शर्म आई. उसने देखा कि अक्षय वहाँ पर नहीं था उनसे जल्दी से आखिरी कपडा भी उतारा और चौगा पहन लिया. जैसे ही उसने चौगा पहना, सामने अक्षय खड़ा था. अक्षय उसका हाथ पकड़ कर एक दूसरी ही सीढ़ी से नीचे ले गया, अबकी बार सीढियां बहुत ज्यादा थी. नीचे उतर कर वे लोग एक कमरे में पहुंचे जो धुंधले से प्रकाश में नहाया हुआ था. यह रौशनी किसी बिजली के बल्ब की नहीं थी ना ही कोई दीपक या मशाल थी. अजीब सी भयावह और रहस्यमयी सी रौशनी थी. रौशनी किस चीज़ से निकल रही थी अरुण समझ नहीं पाया.
अक्षय ने एक दीवार की और इशारा किया. अरुण ने उस दीवार की और देखा तो वो देखता रह गया. दीवार जो अब तक पत्थर की लग रही थी वो धुंए की बन गयी और वहाँ अरुण को अपना अक्स दिखाई दिया. किसी टीवी की तरह दीवार पर तस्वीरें उभरने लगी. अरुण की जिंदगी फ्लैशबैक में चलने लगी. अरुण अपने शहर से हरिद्वार ट्रेन में, दोस्तों के साथ शाम को बैठे हुए, विशाल उसे माणा जाने की सलाह देते हुए, अरुण की फाइव स्टार साधुओं से मुलाकात, अरुण का बचपन, अरुण का जन्म. अब जो अरुण ने देखा वो विशवास से परे की बात थी उसने देखा कि वो बूढा है और मर रहा है फिर उसने अपने आप को देवनाथ ( जो साधू उसे गंगा से निकलते हुए ऋषिकेश में मिले थे) के साथ देखा दोनों पहाड़ों में बैठे तपस्या कर रहे थे, अब अरुण ने अपने आपको जवान देखा और वो किसी से बात कर रहा था सामने कौन था अरुण पहचान नहीं पाया. फिर अरुण ने अपने आप को बच्चे के रूप में देखा जो अपने पिता की गोद में बैठा था, उसके पिता कोई और नहीं जीतेंद्र जी थे, अब फिर अरुण ने अपना जन्म होते देखा, फिर से अरुण ने अपने आपको बूढा देखा जो अपनी अंतिम साँसे ले रहा था, अब फिर अरुण ने अपने आपको तपस्यारत देखा. और फिर धुआं बहुत तेजी से घूमा और पत्थर की दीवार फिर प्रकट हो गयी.
अरुण बोला अक्षय ये सब क्या है, कुछ तो मै समझ गया बाकी तुम बता दो. अक्षय बोला योगी अश्वनाथ आप कई जन्मो से तपस्या कर रहे हैं पर हर बार रास्ता भटक जाते हैं. विशाल ने जब आपको माणा आने का सुझाव दिया था तब वो मै ही था जो उसके मुँह से बोला था. जब आप अपने अफसर से छुट्टी लेने गए तो अफसर के मुह से मै ही बोला था. जब देवनाथ गंगा से प्रकट हुए तो मै आपके पास ही था. फिर सर्वोत्तम ने यह निर्णय लिया कि आपको मै यहाँ ले आऊँ. आप जानना चाहते थे ना मै किस स्तर पर हूँ मैं नौवें स्तर पर हूँ. और आप सातवें स्तर पर हो. कोई प्रश्न हो तो पूछ लीजिए. अरुण ने पूछा अगर मै तुमसे अधिक स्तर पर हूँ तो मै तुम्हारी तरह सामने वाले के मन की बात क्यूँ नहीं जान पाता और क्या मै भी तुम्हारी तरह नहाने के बाद शरीर सुखा सकता हूँ. अक्षय बोला भैया आप तो मुझ से बहुत ज्यादा विद्याएँ जानते हो. पर आप जीवन मरण के चक्र में भूल गए हो. आपको सभी विद्या जल्दी ही याद आ जायेंगी.
अक्षय अरुण को ले कर वापस चल पडा और वो फिर से उसी कमरे में आ गए जहाँ उन्होंने कपडे बदले थे. अबकी बार जब उन्होंने कपडे बदले तो अरुण के मन से नग्नता की हिचक टूट गयी थी. अरुण को पता चल गया था शरीर तो मिट जाता है. अरुण को अपने सवालों की गुत्थी सुलझती दिखाई देने लगी थी. अक्षय अरुण को उसके कमरे में वापस ले आया और अरुण को कहा, “भैया अब तुम्हे सो जाना चाहिए. आज का दिन बहुत लंबा और अजीब रहा है. कल तुम्हारी यात्रा और भी लंबी और और भी कठिन हो जायेगी.” अरुण बिस्तर पर लेटा और सो गया. आधी नींद में अरुण को लगा की कोई उसके हाथ पांवों और सर में किसी सुगन्धित तेल की मालिश कर रहा है. अरुण ने आँख खोलने की कोशिश की पर वो फिर गहरी नींद में डूबता गया. आज उसे बस एक ही सपना दिखाई दिया जैसे वो किसी अँधेरी गुफा में जा रहा है. दूर बहुत दूर एक रौशनी का पुंज है. जिसकी और वो बढ़ता जा रहा है. अचानक ही किसी ने उसे उसे झिंझोड दिया. अरुण एक दम उठा तो देखा अक्षय उसे हिला कर जगा रहा था. अरुण उठ बैठा.
अक्षय मे कल रात की सारी गंभीरता गायब हो चुकी थी और वो कल दिन वाला ही शरारती अक्षय बन चुका था. अरुण बोला क्या बात हो गयी. अक्षय बोला भैया आप तो ऐसे सोये पड़े थे जैसे गधे,घोडे,भेड़ बकरी सब बेच दी हों. अरुण हंस पडा. अक्षय बोला जल्दी से तैयार हो जाओ हमे आज फिर बहुत लंबा सफर करना है. और आप का दिमाग खाने के लिए आपका गुलाम एकदम तैयार भी हो चुका है. अरुण हँसते हुए बोला, तौलिए की तुम्हे ज़रूरत नहीं दाढ़ी मूछ तुम्हारी आई नहीं सिर्फ टूथब्रुश किया शरीर पर पानी डाला और तैयार. अक्षय ने अरुण का हाथ पकड़ कर अपने गाल पर रगड़ दिया, अरुण के हाथ पर अक्षय की दाढ़ी की चुभन महसूस हुई तो अरुण चिहुंक पड़ा. उसने अक्षय के गाल पकड़ कर खींच दिए अब अक्षय चिल्ला पड़ा. अक्षय बोला, गाल क्यूँ खींचा”? अरुण बोला, “तुमने अपनी दाढ़ी जो चुभा दी थे”. अक्षय बोला “तुम बोले दाढ़ी नहीं आई, मै तो फील करवा रहा था. ”
तभी माँ जी भीतर आईं और बोली क्या छोटे बच्चे बने हो अश्वनाथ. जल्दी तैयार हो जाइए. सर्वोत्तम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. और माँजी के जाते ही अरुण ने अक्षय से पूछा, यह सर्वोत्तम कौन है. अक्षय बोला भैया हमारे पंथ के सबसे बड़े जो हैं जो पहले स्तर पर हैं वो सर्वोत्तम कहलाते है. अब आप तैयार हो जाए. अरुण जल्दी से उठा और बाथरूम में घुस गया. आधे घंटे बाद वो नहा धो कर बाहर आया और जल्दी से तैयार हो गया. तभी अक्षय नाश्ता चाय ले कर आ गया. कमरे में बैठे बैठे दोनों नाश्ता करने लगे. नाश्ता करते हुए अरुण ने पूछा अक्षय यह इतने कीमती ऐंटीक बर्तन इस आश्रय में कैसे हैं. अक्षय ने जवाब दिया,” भैया ये बर्तन सदियों से इस आश्रय में हैं. बहुत से राजा महाराजा हमारे पंथ से जुड़े रहे हैं. और उन से मिले तोहफे हैं यह सब. खाना खाने के बाद वे लोग रुद्रप्रयाग के लिए निकल पड़े.
जैसे ही दोनों जिप्सी में बैठे माँ जी बाहर उन्हें मिलने आईं. धूप में मांजी की उम्र पचास नहीं अस्सी साल लग रही थी. कल उनके जो बाल काले सफ़ेद दिखाई दे रहे थे आज वो एकदम सफ़ेद दिख रहे थे. माँजी के चेहरे पर एक ही रात मे झुर्रियाँ पता नहीं कहाँ से आ गयी थी. एक ही दम बुड्ढा गयीं थी माँ जी एक ही रात में. अरुण अचम्भे में था. माँजी बोली, अश्वनाथ तीस साल के बाद तुम मिले और अब जा भी रहे हो. अरुण कुछ नहीं बोला. भीगी आँखों से माँ जी ने उन्हे विदा किया. मन अरुण का भी भर आया था. ना जाने क्यूँ, ना जाने क्यूँ ऐसा लगा कि कुछ टूट कर पीछे रह गया.
गाड़ी अक्षय के निपुण हाथों मे पहाड़ी रास्तों पर एक बार फिर भाग चली. अरुण अक्षय की तरफ मुड़ा और बोला अक्षय मेरी कुछ बातों का जवाब दो. अक्षय बोला भैया सिर्फ तीन घंटों की बात है. आपको कोई सवाल पूछने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. भीड़ भरा श्रीनगर पार होते ही फिर से पहाड़ियों के नजारों ने मन मोह लिया. नीचे बहती अलकनंदा नदी नीली पट्टी जैसी दिखाई दे रही थी. पहाड़ों की ठंडी हवा ने तन मन फूल जैसा कर दिया था. अक्षय ने अरुण की तरफ देखा तो अरुण के चेहरे पर आई सौम्यता और शान्ति ने अक्षय के चेहरे पर मुस्कान ला दी. अरुण ने देखा कि अक्षय उसे देख कर मुस्कुरा रहा है तो अरुण पूछ बैठा कि वो मुस्कुरा क्यूँ रहा है. अक्षय बोला, भैया आप इतने शांत और ताजा लग रहे हो कि मुझे लगा योगी अश्वनाथ फिरसे जागृत होने लगे हैं. अरुण बोला, कल रात मुझे ऐसा लगा कि मेरे सोते ही कोई मेरे सर, हाथों पैरों और शरीर की किसी सुगन्धित तेल से मालिश कर रहा है और मजेदार बात ये कि सुबह जब मै नहाने लगा तो पाया मेरा पूरा शरीर तेल से चिकना था. अक्षय हँसने लगा बोला भैया कल रात मैंने ही आपके पूरे शरीर की मालिश की थी. और जो तेल मैंने लगाया था वो पहाड़ी सरसों के तेल में बहुत सारी औषधियां मिला कर तैयार किया गया था. अब अरुण हैरान था कि वो तो कपडे पहन कर सोया था और सुबह उठा तो सारे कपडे ऐसे के ऐसे थे फिर अक्षय ने मालिश कैसे की. अक्षय बोला अभी दिखाता हूँ, और उसने एक अजीब सा इशारा किया तो अरुण के शरीर के तमाम कपडे गायब हो गए. अरुण ने पाया कि वो एक दम निर्वस्त्र गाड़ी में बैठा है. अरुण ने एक दम हाथों से अपनी लज्जा ढकने का प्रयास किया पर इससे पहले ही अक्षय चुटकी बजा चुका था. और अरुण एक बार फिर अपने कपडे पहने हुए हो गया. अरुण बोला, अक्षय यह कौन सी विद्या है. अक्षय ने बताया कि यह निरावरण विद्या है. अरुण बोला इसमें कैसे निपुण हुआ जा सकता है. अक्षय बोला भैया आपने ही तो यह विद्या मुझे सिखाई थी. आपको आपकी सारी विद्याएं कोटेश्वर मंदिर में वापस मिल जायेंगी. पिछले जन्म में आप उन्हें वहीँ छोड़ गए थे.
रास्ते में लगे मीलपत्थर पर अक्षय ने पढ़ा रुद्रप्रयाग बीस किलोमीटर है. उसने पूछा रुद्रप्रयाग में किन नदियों का संगम होता है. अक्षय ने बताया कि रुद्रप्रयाग में अलकनंदा नदी में मन्दाकिनी नदी आकर मिलती है. मन्दाकिनी नदी को मन्दाकिनी इस लिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ माँ गंगा एक दस वर्ष की बालिका की तरह मंद मंद बहती है और अलकनंदा की आयु चौदह साल कही जाती है. जहां दोनों नदियों का संगम होता है वहाँ रुद्रनाथ का मंदिर है. यहीं पर भगवान शिव ने नारद ऋषि को संगीत की विद्या दी थी. और पास में ही माता पार्वती का चामुंडी रूप में मंदिर है. नज़दीक ही वो शिला है जिसपर भगवान शिव ने नारद को संगीत विद्या दी थी. इस शिला को नारद शिला कहा जाता है. रुद्रप्रयाग से तीन किलोमीटर दूर गुफाओं में बना हुआ प्राकृतिक शिवलिंग, गणेश, पार्वती, दुर्गा हनुमान की मूर्तियां हैं. माना जाता है यहीं पर भगवान शिव ने केदारनाथ जाने से पहले तपस्या की थी. इसी मंदिर को कोटेश्वर मंदिर कहा जाता है. कोटेश्वर का मतलब करोड़ो का स्वामी होता है. पिछले जन्म में आपने इसी मंदिर में शिवलिंग के अंदर अपनी विद्याएँ छिपा दी थी. जब आप घी मक्खन से शिवलिंग की मालिश करेंगे तो आपको आपकी विद्याएं मिल जायेंगी.
थोड़ी देर मे रुद्रप्रयाग आ गया और दोनों वहाँ रुद्रनाथ, चामुंडी देवी, नारद शिला, तुंगनाथ आदि के मंदिरों में दर्शन करने गए. संगम पर मन्दाकिनी और अलकनंदा ऐसे मिल रही थी जैसे दो बिछड़ी हुई बहने मिल रही हों. एक दम दिव्य सा माहौल था. अक्षय ने अपने कपडे उतारे और संगम पर स्नान करना शुरू कर दिया. अक्षय के कहने पर अरुण ने अपने भी कपडे उतारे और अक्षय के साथ संगम पर स्नान किया. बर्फीले पानी ने एक बार तो अरुण की सिट्टी पिट्टी गुम कर दी. पर बाद में अरुण का मन नहीं था कि वो पानी से बाहर निकले. अक्षय हाथ पकड़ कर अरुण को पानी से बाहर ले आया और अरुण के सीने और पेट के संधिस्थल पर अपने होंठ रख दिए. अरुण का शरीर दहक उठा और कुछ ही सेकेन्डो में अरुण का पूरा शरीर और अंडरवीयर सूख गया. अब अक्षय ने अपने शरीर को खींचा और आकाश की ओर हाथ जोड़ दिए. अब अक्षय का भी सारा शरीर सूख चुका था. अरुण बोला वह अक्षय मैंने नहीं कहा था के तुम्हे तौलिए की कोई आवशयकता ही नहीं है. तुम्हारे साथ होने पर मुझे भी तौलिए की आवशकता नहीं है. दोनों हंस पड़े. अक्षय बोला भैया यह दाहन विद्या है. इसमें आप इतनी तक अग्नि अपने शरीर मे उत्पन्न कर सकते हो कि आपका शरीर जिसमे भस्म हो कर सिर्फ राख की एक चुटकी मात्र राह जाएगा. बर्फीले पहाड़ों पर योगी इसी विद्या से खुद को गर्म रखतें हैं.
अब अरुण तो कोटेश्वर मंदिर में जाना चाहता था जल्दी से जल्दी, और पाना चाहता था अपनी दिव्य शक्तियां वापस. उसे लगा रहा था कि सारे सवाल जो उसे इतने साल से परेशान कर रहे थे उनका जवाब भी शायद मिल जाए.
अक्षय बोला भैया चाय पियोगे क्या अरुण ने हामी भर दी. अक्षय चाय ले आया,दोनों वहाँ एक पत्थर पर बैठकर चाय पीने लगे. चाय पीते पीते अरुण बोला, अक्षय. अक्षय बोला भैया सब्र करो अभी सही घड़ी आई नहीं है. सही घड़ी आने के बाद ही हम शिव भगवान से अपनी शक्तियां वापस पा सकेंगे. अरुण बोला, सही घड़ी का हमें पता कैसे चलेगा. अक्षय ने कहा चलो भैया अब आपके सवालों का जवाब मिलना शुरू हो जाएगा.
अक्षय अरुण को जिप्सी में बैठा कर रुद्रप्रयाग से चोपटा की और तीन चार किलोमीटर दूर ले आया. सड़क पर गाड़ी छोड़ कर अक्षय अरुण के साथ कोटेश्वर मंदिर की ओर चल पड़ा. पहाड़ी से नीचे उतर कर वे लोग कोटेश्वर मंदिर पहुंचे. यहाँ एक अजीब ही नज़ारा था. अलकनंदा नदी आगे बहते बहते लौट कर शिव तपस्या स्थल को नमस्कार कर रही थी. यहाँ पानी का बहाव बहुत तेज था गुफा के द्वार के पास पहाड़ी के ऊपर से एक झरना गिर रहा था. जो शिव दर्शनार्थियों का स्नान करवाता हुआ प्रतीत हो रहा था. अरुण को ये सब स्थान देखा हुआ लगा. अक्षय के साथ अरुण गुफा में प्रवेश कर गया. भीतर प्राकृतिक शिवलिंग को देख कर अरुण जड़वत हो गया. अचानक ही अक्षय ने एक मन्त्र का जाप शुरू कर दिया. अरुण और अक्षय के शरीर के वस्त्र गायब हो कर एक धोती में बदल गए. अक्षय के हाथ में दो बर्तन दिखाई दिए. अक्षय ने वे दोनों बर्तन अरुण को दे दिए.
मन्त्र मुग्ध सा अरुण दोनों बर्तनों को ले कर शिवलिंग के पास चला गया. दोनों बर्तनों में घी और मक्खन था. अरुण ने दोनों चीज़ों से शिव अभिषेक शुरू कर दिया. अक्षय मन्त्र जप करता रहा. जैसे ही अरुण ने घी और मक्खन शिवलिंग पर मसलना शुरू किया अरुण के मुहँ से भी मन्त्र जप शुरू हो गया. अरुण के शरीर में एक बिजली सी दौड़ने लगी. अरुण ने कांपना शुरू कर दिया अचानक ही शिवलिंग से बिजली की तरंगें निकल कर अरुण के शरीर में समा गयी. और सब कुछ अँधेरे मे डूब गया.
अरुण की आँखें खुली तो वो अपने रोजाना वाले कपड़ों में जिप्सी में सो रहा था. कोटेश्वर मंदिर, उसका एक धोती मात्र में शिव पूजन सब गायब हो चुका था, अरुण ने अक्षय से कहा, अरे हम कहाँ हैं. अक्षय हंसा और बोला भैया क्या हुआ. अरुण बोला मुझे ऐसा लगता है कि मैंने सपने में कोटेश्वर मंदिर देखा और वहाँ पूजा की और एक बिजली शिवलिंग से निकल कर मेरे शरीर में समा गयी. आंख खुली तो मै जिप्सी में था. क्या सपना था मेरे यार. अक्षय बोला ज़रा अपनी हथेलियाँ देखिये. अरुण ने अपनी हथेलियाँ देखी. तो हैरान रह गया. उसकी दोनों हथेलियों पर चक्र बना हुआ था. अक्षय ने कहा भैया हम वहाँ गए थे और शक्तिपात को आप सहन नहीं कर पाए और बेहोश हो गए थे. मै आपको उठा कर ले आया था
अब हम कर्णप्रयाग जा रहे है जहां आप अपनी शक्तियों को इस्तेमाल करना सीख जायेंगे. शक्तियां आप इस्तेमाल तो कर सकते हैं पर उनकी ताकत को संभालना हो सकता है कि आप ना कर पायें. यहाँ आपको सत्यनाथ मिलेंगे जो हमारे साथ बद्रीनाथ तक चलेंगे. कर्णप्रयाग में माँ अलकनंदा में पिंडर नदी का संगम है और यहाँ पर दानवीर कर्ण ने तपस्या की थी. यहाँ की भूमि मानव को दानी बना देती है. आपने भी पिछले जन्म में अपना तपबल यहाँ मानवी के कारण देवनाथ को दान किया था. मानवी कौन है, अरुण ने तुरंत पूछा. अक्षय ने कहा आप अपने दिमाग पर जोर डालिए आपको खुद याद आ जाएगा.
अक्षय के कहे अनुसार अरुण ने सोचना शुरू किया. उसे ऐसा लगा कि वो किसी गहरे कुएं मे कूद गया हो. समय का पूरा पथ उसके सामने खुलता चला गया. वर्तमान जन्म से पीछे जाते ही उसका पिछला जन्म खुल गया. पिछले जन्म में उसने प्रारम्भ से देखना शुरू हुआ.
चौथा जन्म (1923 से 1970)
कूचबिहार के मशहूर रईस जीतेंद्र राय वहाँ के महाराजा जगद्दीपेंद्र नारायण के खास मित्रों में से थे. उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम अरुणेन्द्र रखा गया. घर में उसे अरुण नाम से पुकारा जाता. अरुण के अन्नप्राशन पर उसकी जन्मकुंडली बनवाई गयी तो राजपुरोहित दुर्गादत्त ने स्वयं कुंडली देख कर कहा. अरे यह बच्चा तो महात्मा है, महात्मा नहीं देवात्मा है. जीतेंद्र बाबु आपके वंश में पैसा तो था. अब मोक्ष भी आ गया है. जीतेंद्र बाबू कुछ समझे नहीं तो फिर राजपुरोहित ने समझाया कि यह बालक स्वर्ग का पथिक है और तुम्हे भी मोक्ष के रास्ते पर डाल देगा. जीतेंद्र बाबु ने बालक का पालन पोषण बेहद लाड प्यार और शानोशौकत के साथ करना शुरू किया.
बालक बेहद शांत और गंभीर प्रकृति का था. जब सब बच्चे खेलते तब अरुण अलग बैठा ना जाने क्या सोचता रहता. जीतेंद्र बाबू ने सब चीज़ें देख ली थी. उन्होंने बच्चे के लिए नयी नयी चीज़ें मंगवाई पर बच्चे ने किसी की ओर ध्यान ही नहीं दिया. बच्चा धीरे धीरे चौदह वर्ष का हो गया पर वो योगियों की तरह धीर गंभीर बना रहा,फिर एक दिन ---
कोई सन्यासी हिमालय पर्वत से गंगोत्री से चल कर गंगा सागर तक की यात्रा कर रहा था. और किसी अनजानी वजह से वो कूचबिहार आ गए और जीतेंद्र बाबू से मुलाक़ात करने आ गए. जीतेंद्र बाबू तुरंत सन्यासी से मिलने आ पहुंचे. सन्यासी वृद्ध तेजस्वी और बेहद ज्ञानी थे. नाम था देवनाथ. देवनाथ जी ने जीतेंद्र बाबू को बताया कि उन्हें एक बेहद गुप्त काम से यहाँ भेजा गया है. जीतेंद्र बाबू बोले महात्मा आप आज्ञा कीजिये. देवनाथ बोले, आपके पास हमारी एक अत्यन्त मूल्यवान धरोहर है. जो हम आज आपसे मांगने आयें हैं. जीतेंद्र बाबू हाथ जोड़ कर कहने लगे, मेरे धन्यभाग्य जो आपने मुझे इस लायक समझा. आप आज्ञा करें मै आपके श्रीचरणों में क्या अर्पित करूँ. तभी आंधी तूफ़ान की तरह वहाँ अरुण आ पहुंचा और देवनाथ को देखते ही पत्थर की तरह जाम हो गया. दोनों की आँखों से आंसू बहने लगे. एक दूसरे के हाथ उन्होंने थाम लिए. अरुण बोला कहाँ थे देवनाथ, इतने वर्ष मै तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहा. तुम्हारा वादा था ना कि मुझे लेने आओगे.
जीतेंद्र बाबू बोले यह सब क्या है. कोई मुझे भी बताओ
देवनाथ ने बताया कि हम दोनों कई जन्मो के गुरुभाई हैं.पिछले जन्म में अचानक ही इसने शरीर त्यागने का निर्णय कर लिया. और मुझसे वादा लिया कि मै इसे वापस ले जाऊँगा, हमारे तपस्या के संसार में. जीतेंद्र तुम्हारे चार पुत्रों में से ये एक मै लेने आया हूँ.
जीतेंद्र बाबू बोले, मुझे पता था कि मेरा यह पुत्र साधारण नहीं है. मै इसे आपको लौटाता हूँ.
देवनाथ अरुण को ले कर चले गए और सर्वोत्तम को सौंप दिया. अरुण को वापस तप की राह पर डाल कर सर्वोत्तम ने अरुण को देवनाथ के साथ तपस्या वन में भेज दिया. बहुत वर्षों की तपस्या और योग के बाद जब अरुण सताईस वर्षों के सुन्दर बलिष्ठ योगी थे तब एक दिन सतोपंथ के किनारे उन्हें एक तांत्रिक मिला जिसका नाम शाम्भवनाथ था. उसकी तंत्र शक्ति और अरुण की मन्त्र शक्ति दोनों मुकाबले की थी. दोनों साधकों में टकराव नहीं मित्रता हो गयी. एक दिन देवनाथ ने अरुण को कहा अरुण मै एकल तपस्या के लिए गुप्त स्थान पर जा रहा हूँ. अब तुम भी यहाँ अकेले रहो. और देवनाथ किसी गुप्त स्थान पर चले गए.
तीन वर्षों के लगातार साथ से शाम्भव और अरुण दोनों की दोस्ती गाढ़ी होती चली गयी. दोनों एक दूसरे की साधना के रास्ते में नहीं आते थे. एक दिन शाम्भव भैरवी बनाने एक लिए एक कुमारी कन्या को ले आया. उन्नीस वर्ष की यह युवती बेहद सुन्दर, गोरा रंग, काले घने लंबे बाल जो जमीन पर घिसटते हुए चलते थे. उसकी हिरन जैसी आँखे बड़ी सम्मोहिनी थी.उसका नाम मानवी था. शाम्भव नाथ मानवी को कंधार से लाया था. और शाम्भव जब उसे सामने बैठा कर तपस्या करता तो मानवी के शरीर से कस्तूरी की तीव्र सुगंध निकलती थी.कई कई मील तक फैली हुई यह सुगंध सबको मोहित कर देता था. पर अरुण की तो तपस्या ही भंग हो जाती थी. अरुण के मन में एक अजीब सा सम्मोहन कुंडली मार कर बैठ गया. एक रात अरुण एक बड़े से पत्थर पर बैठा आत्म-मंथन कर अपने मन की इस दुर्बलता पर पार पाने की कोशिश कर रहा था कि अचानक एक ज़ोरदार
आवाज़ और प्रकाश हुआ, जैसे कहीं कोई विस्फोट हुआ हो. अरुण तुरंत विस्फोट स्थल पर पहुंचा तो देखा शाम्भव की तपस्थली पृथ्वी में समा रही थी और शाम्भव नाथ का शरीर हवा में घुल रहा था. शाम्भव ने अरुण को पुकार कर कहा, अरुण मै तो महादेव के लोक में जा रहा हूँ मेरी साधना पूरी हो गयी है. मै मोक्ष का इच्छुक नहीं शम्भूदेव शंकर सदाशिव का गण बनना चाहता था. वो आज पूरी हो गयी है. विदा मेरे भाई, तुम भी अपनी साधना में सफल हो जाओ यही मेरी कामना है.
और शाम्भव नाथ गायब हो गए. शाम्भव की सारी तप सामग्री,कुंड आसन आदि ज़मीन में समा गए. अरुण ने एक साधक की साधना पूरी होने पर झुक कर हाथ जोड़ कर प्रणाम किया.
अरुण ने अपनी आकर्षण विद्या द्वारा आसपास के पत्थर इकट्ठे किये और सघनक विद्या द्वारा उन्हें जोड़ हर एक खम्बे जैसा स्मारक शाम्भव की साधना स्थली पर बना दिया. अरुण वहाँ से चलने लगा तो देखा एक बड़े से गोल पत्थर पर मानवी खड़ी थी, भैरवी बनी. वस्त्रहीन, लंबे बाल हवा में लहराते हुए, चाँद के रौशनी में चांदी की तरह चमकता यौवन से भरा बदन, तन से फूट रही कस्तूरी की सुगंध. कुछ इस तरह खड़ी थी मानवी जैसे वो भैरवी नहीं प्रेमी की बाँहों में समाने को तैयार प्रेमिका हो. अचानक ही किसी पक्षी की तरह उडती हुई मानवी अरुण के शरीर से आ चिपकी. अरुण ने जिस आकर्षण विद्या का प्रयोग पत्थरों पर किया था,उसने एक युवती को भी आकर्षित कर लिया था,
अरुण सुन्दर था बलिष्ठ था, और यौवन से भी भरा था, इस मेनका के संपर्क से विश्वामित्र की तपस्या टूटने लगी थी. अरुण जन्मो की तपस्या का मार्ग छोड़ कर आदिम राह पर चल पड़ा. कामदेव ने एक और तपस्या भंग कर दी थी. मानवी और अरुण एक दूसरे की बाँहों में ऐसे खोये कि समस्त विश्व की सुध-बुध खो बैठे.
यह तूफ़ान इतनी तेज़ी से आया कि कोई कुछ कर ही नहीं पाया. देवनाथ को उनके अज्ञातवास में सब पता चल गया, वो बहुत तेजी से आये भी पर कामदेव के बवंडर मे सब तहस नहस हो चुका था. जब देवनाथ को सामने देखा तो मानवी और अरुण अपने आपको छिपाने की कोशिश करने लगे. देवनाथ ने अरुण को कहा, ये तुमने क्या कर डाला. प्रायश्चित करो और वापस साधना मार्ग पर आ जाओ. इस लड़की को मै वापस भेज देता हूँ. अब ये लड़की भैरवी नहीं रह सकती. इस लिए अब इसका संसार में लौटना ज़रुरी हो गया है.” अरुण ने कहा,” देवनाथ मै इस लड़की को वापस नहीं जाने दूंगा, यह मेरे साथ रहेगी, मै साधना मार्ग नहीं गृहस्थ मार्ग पर चलूँगा. और अरुण ने मानवी का हाथ पकड़ा और आवरण विद्या से दोनों को वस्त्रधारी बना दिया. देवनाथ ने अरुण की सभी शक्तियों को बाँध दिया और बोले,” अब से तुम इन शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकोगे, जब तुम वापस साधना मार्ग पर आओगे तब तुम्हारी शक्तियां तुम्हे मिलेंगीं”. अरुण वहाँ से चल पड़ा और रास्ते में कोटेश्वर महादेव में अपनी शक्तियां छोड़ कर कलकत्ता में जाकर रहने लगा.
सन 1954 में जीतेंद्र बाबू अपने पुत्र से मिलने आये पर वहाँ आकर उन्हें सारी घटना का पता चला तो वे बहुत दुखी हुए. उन्होंने संसार को छोड़ साधना मार्ग अपना लिया और वहीँ के होकर रह गए. एक दिन देवनाथ से उन्होंने पूछा कि वे अपने पुत्र को कब मिलेंगे. देवनाथ ने कहा जीतेंद्रनाथ आपके पुत्र से आपकी मुलाकात उसके इस जन्म में नहीं होगी बल्कि जब वो अगला जन्म लेकर वापस यहाँ आ रहा होगा तो श्रीनगर के आश्रय में 2007 में आप उससे मिलेंगे. ध्यान रखना पुत्र मोह सिर्फ एक क्षण का हो, आप एक बार उसे गले से लगा सकोगे पर अगले ही पल आपको पिता के कर्तव्य निभाने होंगे और उसे सही मार्ग पर लगाना होगा.
अरुण कलकत्ता में अपनी पत्नी मानवी के साथ सुख से रह रहा था, कई बार रातों को सपने में उसे अपना साधना काल याद आता तो वो बड़े प्रयत्न से इन विचारों को मन से निकाल देता. कई वर्षों के साथ के बाद अचानक 1964 में मानवी ने शरीर त्याग दिया. अरुण के मन में फिर से साधना की इच्छा पैदा हो गयी और उसने देवनाथ को पुकारा. देवनाथ ने अरुण को वापस बुला लिया और अरुण को प्रायश्चित में अपनी आयु के तीस वर्ष कर्णप्रयाग में अलकनंदा और पिंडर के संगम पर त्यागने पड़े.
देवनाथ के मार्गदर्शन में छः वर्ष की तपस्या के बाद अरुण ने प्राण त्याग दिए. और उसके शरीर को सर्वोत्तम ने अणिमा विद्या से अणु के समान छोटा करके स्वर्ग के मार्ग में स्थापित कर दिया. अरुण की आत्मा अपने पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में वायुमंडल में गतिमान रही और 16 जुलाई 1979 को श्रीमती माया सिंह के गर्भ में स्थापित हो गयी और 16 मार्च 1980 को श्री सुरेन्द्र जी के पुत्र रूप में फिर से धरती पर देहधारी हो गयी.
20 अप्रैल 2007
अरुण की आँख खुली तो उसने पाया कि वो गाड़ी में अक्षय के साथ बैठा है. अक्षय बोला भैया देख लिया अपना पूर्व जन्म. जान गए, कौन थी मानवी और जीतेंद्र जी ने आपको एकदम गले क्यूँ लगा लिया था. अब अरुण ने पूछा हाँ सब देख लिया है मैंने पर यह तो बताओ माँजी के साथ मेरा सम्बन्ध कैसे है और उनको देख कर मै इतनी भावना से क्यूँ भर जाता हूँ. अक्षय बोला, भैया उसका भी समय आएगा तो आपको वो भी पता लग जाएगा. अब हम कर्ण प्रयाग आ गए हैं यहाँ आपने अपने जीवन के सत्तर साल पिछले तीन जन्मो में दंड स्वरुप जल प्रवाह किये हैं आज आप चाहें तो वो वर्ष आप वापस पा सकते हैं और अगर आप चाहें तो भविष्य में भी आप यहाँ आकर अपनी आयु ले सकते हैं. क्या इच्छा है आपकी. अरुण बोला,बाद में देखेंगे. अक्षय ने कहा कि फिर तो हम सीधे आश्रय में चलते हैं और अक्षय उसे आश्रय में ले गया जहाँ वे लोग शीशनाथ नाम के आश्रय अध्यक्ष से मिले. अक्षय ने बताया कि यह अरुण की तरह ही सातवें स्तर पर हैं. शीशनाथ अरुण से गले मिल कर मिले और अक्षय की वंदना उन्होंने अक्षय के मस्तक पर हाथ रख कर स्वीकार की. उन्होंने बताया कि सर्वोत्तम की आज्ञानुसार आज रात अरुण और अक्षय इसी आश्रय में रुकेंगे और कल सुबह उन्हें बदरीनाथ पहुंचना है
रात को अरुण और अक्षय भोजन पश्चात एक कमरे में सोने चले गए. अरुण ने अक्षय से पूछा मुझे एक बात बताओ कि मेरे पिछले जन्म में तुम मुझे दिखाई क्यूँ नहीं पड़े. अक्षय बोला आज रात आपको पता चल जाएगा. अरुण बोला क्या सपने मेंअक्षय ने जवाब दिया नहीं अभी जागते हुए. अरुण बोला तो दिखाओ. अक्षय ने हाथ हिलाया और वो निर्वस्त्र हो गया. अरुण ध्यान से देखने लगा अब अक्षय ने फिर हाथ हिलाया और अक्षय की जगह देवनाथ खड़े थे. देवनाथ बोले भैया मै ही देवनाथ हूँ मै ही अक्षय हूँ. मै पांचवें स्तर से फिसल कर ग्यारहवें स्तर पर पहुँच गया था क्यूंकि मैंने तुम्हे मानवी से अलग करने के लिए मैंने ही मानवी की आयु समाप्त करने का पाप किया था. तुम्हारे साथ साधना करके भी मै अपना पहला स्तर नहीं पा सका था. तुम्हारे शरीर त्यागने के बाद मैंने भी शरीर त्याग दिया था और फिर जन्म लेकर अपनी साधना शुरू की. और जब मैंने देखा कि तुम आने के लिए छटपटा रहे हो तो मैंने सर्वोत्तम की आज्ञा लेकर तुम्हे वापस लाने के काम में लग गया था. और यह कहते कहते देवनाथ फिर अक्षय रूप में आ गए. अरुण अक्षय से लिपट गया. अरुण बोला कितने जन्मो से तुम मेरे भाई मेरे सखा बन कर मेरे साथ रहे हो, इस जन्म में मेरी सेवा करते हुए मुझे अपने अहसानो से लाद दिया है तुमने...........
दोनों मित्र बातें करते करते सो गए. सुबह जब अरुण उठा तो उसने देखा कि अक्षय कमरे में नहीं था. उसे याद आया कि कल रात उसने घर पर फोन नहीं किया था. उसने घर पर फोन मिलाया तो माँ ने फोन उठाया. माँ बोली, इतनी सुबह कैसे फोन किया सब ठीक तो है, अरुण बोला माँ बस मन कर रहा था बात करने को. माँ बोली कल रात आधा घंटा बात की तो थी तुने, अरुण हैरान, यह सब क्या है. माँ ये क्या कह रही है. माँ अचानक बोली अरुण सच बता क्या बात है, कल रात भी तू अजीब से तरीके से बात कर रहा था. आज ऐसे बोल रहा हो जैसे कल की कोई बात याद ना हो. अरुण बोल उठा अरे माँ आज एक बहुत ज़रूरी काम से जा रहा हूँ इसलिए परेशान हूँ. अच्छा माँ बाय. कह कर अरुण ने फोन रख दिया. और वो सोच में पड़ गया. अचानक ही वहाँ अक्षय आ गया. अरुण ने अक्षय की तरफ देखा तो अक्षय बोल उठा, कल रात तुम तो भूल गए थे घर पर फोन मैंने ही कर दिया था. अब अरुण को सारी बात समझ आ गयी थी.
सुबह का खाना खा कर दोनों बद्रीनाथ के लिए चल पड़े. रास्ते में नन्दप्रयाग आया, यहाँ नंदाकिनी नदी अलकनंदा में मिलती थी. चमोली गोपेश्वर, हनुमान चट्टी नमक जगह होते हुए वे लोग दोपहर को बद्रीनाथ पहुँच गए और वहाँ बद्रीनारायण के दर्शन करके दोनों माणा चल पड़े. रास्ते में नर और नारायण पर्वतों के दर्शन भी किये. माणा मे जा कर अक्षय ने जिप्सी वहीँ छोड़ दी और अरुण के साथ भोजन करके दोनों चल पड़े स्वर्गारोहिणी की ओर.
22 अप्रैल 2007
पंथ के भीतर
अब अरुण के पूर्वजन्म की यादें अरुण के दिमाग में ताज़ा होने लगी थी. अब आगे अक्षय नहीं अरुण चल रहा था. अरुण को सारा दृश्य याद आ गया उसे याद आ गया की कितनी बार वो इस रास्ते से गुजर चुका था. माणा से आगे जाते ही अलकनंदा नदी के ऊपर बने छोटे से लकड़ी के पुल को पार करते ही इंसानी बस्तियां सब पीछे छूट गयी. आ गया वो रास्ता जिसकी अरुण को तलाश थी गणेश गुफा व्यास गुफा पार करके सामने आ गयी सरस्वती नदी. सरस्वती नदी के ऊपर वो शिला पड़ी थी, जिसे कहा जाता है कि भीम ने रास्ता बनने के लिए दो पहाड़ों के बीच रख दिया था. केशवप्रयाग में माँ सरस्वती माँ अलकनंदा में मिल रही थी.
केशवप्रयाग से आगे निकल कर अलकनंदा के बाएं किनारे चलते हुए खड़े कगारों पर अरुण ऐसे भागा जा रहा था जैसे उसके पैरों में पंख लग गए हों. बेहद दुर्गम रास्ता, कोई पगडण्डी नहीं कोई सपाट जगह नहीं, थी तो सिर्फ खड़ी ढलानें, ढीली चट्टानें, गिरे तो क्रियाकर्म करने को अस्थियां भी ना मिले. अक्षय मंद मंद मुस्काते हुए अरुण के पीछे पीछे चल रहा था. एक छोटे से ग्लेशिअर को पार करके वे लोग द्रौपदी मंदिर के सामने पहुंचे. यही वो जगह थी जहाँ द्रौपदी ने अपना शरीर त्यागा था. सामने दिख रहा था वसुधारा नाम का जलप्रपात 450 फूट ऊंचाई से गिरता पानी बेहद ठन्डे मौसम की वजह से जमीन छूने से पहले ही बर्फ में बदल जाता है. ऐसा नज़ारा कही और देखने को मिल सकता है क्या. लग रहा था स्वर्ग का द्वार है. और दुनिया मे कहीं और ऐसे दृश्य दुर्लभ हैं.
हर तरफ सुंदरता बिखरी पड़ी थी. एक कुत्ता ना जाने कहाँ से आ गया. और साथ चल पड़ा. इस रास्ते पांडवों से ले कर जो भी आज तक इस रास्ते पर गया है एक कुत्ता अवश्य उसके साथ चला है. क्या रहस्य है कोई नहीं जानता. पर बार बार हर बार हर स्वर्ग के पथिक का साथ एक कुत्ते ने ज़रूर दिया है. पीछे मुड कर देखने पर माणा दर्रा, माणा और स्वर्ग के बीच की सीमा रेखा नज़र आती है.
वसुधारा के पास जा कर अरुण ठहर गया. सब वस्त्र व सामान वहीँ फेंक दिए और जा कर नहाने लगा वसुधारा की दिव्य वर्षा में. समस्त कलुष दूर हो गए और मन के सभी बंधन खुल गए.अक्षय ने भी कपडे निकाले और वसुधारा में स्नान करने लगा. एक अनोखा सा सन्नाटा पसरा हुआ था. अरुण तो जैसे ध्यान मग्न हो गया था. पर अक्षय ने देखा के कुछ लोग वहाँ आ रहे हैं. अक्षय ने अरुण और अपने शरीर पर वस्त्र प्रकट कर दिए. अरुण अब जींस टीशर्ट वाला अरुण नहीं पीले कपडे पहने एक वैष्णव सन्यासी दिखाई दे रहा है. और अक्षय उसका अनुगामी शिष्य.
जो यात्री वहाँ पहुंचे थे वो इस योगी जोड़ी को देख कर हैरान हो गए. वे चारो यात्री बहुत से गर्म कपडे पहने हुए थे और फिर भी उन्हें ठंड लग रही थी और ये योगी मात्र दो चादरों में थे. एक धोती रूप में नीचे पहनी थी दूसरी चाद्दर रूप में ओढ रखी थी. अब अरुण और अक्षय दोनों चल पड़े आगे के रास्ते पर . समस्त आधुनिक वस्त्र और सारा सामान जो उन्होंने पीछे छोड़ दिया था वो ना जाने कैसे हवा में घुलता चला गया. अब अरुण के मुख पर एक दिव्य तेज था. पांच जन्मो की तपस्या का प्रकाश उसके चेहरे को एक अद्भुत शान्ति दिए हुए था. इन दोनों को जाते देखा तो वे यात्री किसी सम्मोहन में बंधे इनके पीछे चल पड़े.उन यात्रियों में चार लड़के थे उम्र रही होगी बीस साल के लगभग,
उन्हें अपने पीछे आते देख अक्षय ने रुक कर कहा, आप लोग हमारे साथ नहीं आ सकते. उनमे से एक लड़का बोला हम लोग सतोपंथ जाना चाहते हैं अगर आप लोग भी वहीँ जा रहे हों तो हमें साथ ले चलिए. अक्षय ने कहा नहीं आप लोग अपने गाइड के साथ ही रहिये. अब ये दोनों चमटोली बुग्याल से होते हुए चल पड़े. आगे सहस्त्रधारा के पास जा कर अरुण ठिठक गया. उसने वहीँ पर एक गुफा में प्रवेश किया. अक्षय पीछे पीछे गुफा में चला गया. गुफा का मुहँ छोटा सा था जिसमे बैठ कर ही घुसा जा सकता था. दोनों सरक सरक कर भीतर घुसते चले. पन्द्रह बीस मीटर अंदर जा कर गुफा बड़ी हो गयी, अब खड़े हो कर चला जा सकता था. अरुण अक्षय कुछ नहीं बोल रहे थे, वे सिर्फ चले जा रहे थे. आगे गुफा एक बड़े कमरे जैसी हो गयी थी. भीतर एक पत्थर पर समाधि लगाये एक वृद्ध पुरुष बैठे थे. इस गुफा में प्रकाश किस चीज़ का था, कोई समझ नहीं सकता था. ना कोई दीपक था ना कोई मशाल. पहाड़ के भीतर इस कुदरती गुफा में कोई खिडकी भी नहीं थी. पर उजाला ऐसा था मानो अल सुबह की रौशनी हो. यह रौशनी दीवारों से निकल रही थी. अरुण की नज़र तो सिर्फ उसी ध्यान मग्न मूर्ति पर थी. गुफा की जमीन पथरीली नहीं थी. बालू रेत का कालीन सा बिछा हुआ था. अरुण नीचे ज़मीन पर बैठ गया. अक्षय उस कक्ष के द्वार के पास ही बैठ गया.
गुफा में एक कंपन सी थी. जैसे कोई शब्द गूँज रहा हो. अरुण को यही शब्द यही कंपन सपने में भी दिखाई दिया था. अब ध्यानमग्न ऋषि ने आखें खोली और बोले अरुण मै तुम्हारा प्रथम गुरु ऋषि रविनाथ हूँ. तुम्हारा वापस आना एक बार फिरसे तुम्हे साधना पथ पर ले आया है. सर्वोत्तम ने तुम्हे फिर से पंथ में मिलाने की अनुमति दे दी है. आओ मेरे पास आओ. अरुण बिना उठे ही अचानक सरक कर उनके पास पहुँच गया. अब ऋषि रविनाथ ने अरुण के सर पर हाथ रख दिया और अरुण को एक बिजली का झटका सा लगा. अरुण को ऐसा लगा वो हवा में ऊपर उठता जा रहा है. सारा वातावरण उसके चारो तरफ तेजी से घूमने लगा. अब अरुण ने आंखें बंद कर ली. जब अरुण की आंखें खुली तो अरुण ने पाया कि वो एक बहुत ही तेजवान और वृद्ध पुरुष के सामने बैठा था. लंबी सफ़ेद दाढ़ी, लंबे सफ़ेद बाल, गले मे एक मोतियों की माला जिसमे एक सोने का मैडल था जिसके बीच में एक स्फटिक जड़ा हुआ था उनके व्यक्तित्व को एक दिव्य आभा दिए हुए था. अरुण पहचान गया यही तो थे सर्वोत्तम, पंथ के सबसे बड़े मुनि. स्वर्ग के रास्ते के प्रहरी.
सर्वोत्तम मुख से नहीं बोलते थे. उनका कहा हुआ सामने वाले के मन में विचार बन कर उतर जाता था. उन्होंने अरुण से मानसिक वार्तालाप शुरू कर दिया.
सर्वोत्तम:- अरुण तुम्हारी वापसी से मै बहुत खुश हूँ. पांच जन्मो से भटक रहे हो, अब तो मुक्त हो जाओ.
अरुण:- वासना मुझे भटका देती है. आपकी कृपा से इस जन्म में अब तक मैंने वासना को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया.
सर्वोत्तम:- जब तक तुम मज़बूत रहते हो तब तक सबकुछ मेरे हाथ में है, पर जब तुम कमज़ोर पड़ जाते हो तुम मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाते हो. इस जन्म में तुम्हे इसी वासना से बचना है. और अगले तीन दिन में तुम्हारा स्तर बढ़ कर छः हो जाएगा. अक्षय तुम्हारा माध्यम होगा. तुम्हारी सेवा करना उसका धर्म है. अब तुम वापस अपनी तपस्थली पर चले जाओ और ह्रीं मन्त्र का जाप करते रहो. बद्रीनारायण का ये बीज मन्त्र लगातार जाप करते रहो. ओम हरीम ओम, बोलो ओम ह्रीं ओम ओम ह्रीं ओम
अरुण ने जप शुरू कर दिया अचानक फिर से वातावरण घूमने लगा और अरुण वापस उसी गुफा कक्ष में वापस आ गया. सामने वही ऋषि बैठे थे. अरुण ने उन ऋषि को प्रणाम किया तो ऋषि बोले, अरुण अक्षय तुम यहीं पर रह कर तपस्या करो. ऋषि ने हाथ उठाया तो गुफा में एक रास्ता खुल गया. अरुण और अक्षय उसके भीतर चले गए. भीतर एक छोटा सा कक्ष था जिसमे दो आसन बने हुए थे. अरुण और अक्षय एक एक आसान पर बैठ गए.
अरुण ऐसे बैठा कि दाहिने पैर की एड़ी उसके लिंग और गुदा के बीच वाले हिस्से को नीचे से दबाने लगी और बांये पैर को लिंग के ऊपर व्यवस्थित किया. दोनों हाथों से ज्ञान मुद्रा बनायीं और जप शुरू कर दिया अक्षय ने भी इसी सिद्धासन में अपने आप को व्यवस्थित किया. और दोनों मित्रों ने जप शुरू कर दिया. उनकी सम्मिलित साधना का तेज कमरे में फैलना शुरू हो गया. अरुण को इस पवित्र और शुद्ध साधना स्थल में कोई रूकावट नहीं रोक सकती थी.
कितने घंटे कितने दिन बीत गए, सब हिसाब खत्म हो गए थे. एक समय ऐसा आया कि अरुण एक सम्पूर्ण योगी बन गया था. अक्षय भी अपने भाई जैसे दोस्त के पीछे पीछे साधना पथ पर बढ़ता चला गया. उनके चेहरे से सूर्य के समान तेज निकलने लगा. ऋषि रविनाथ उनके कक्ष में आये और दोनों को ध्यान से बाहर निकाला. अब उन्होंने दोनों को वापस बद्रीनाथ जाने की आज्ञा दे दी. अरुण को कुछ समझ नहीं आया कि अचानक इन्हें वापस बद्रीनाथ जाने की आज्ञा क्यूँ दी गयी है. पर अरुण ने अक्षय का हाथ थामा और पारगामी विद्या के द्वारा एक ही पल में बद्रीनाथ पहुँच गए. बद्रीनाथ में अरुण और अक्षय वापस पुराने वस्त्रों जींसों और टीशर्ट्स में आ गए. अरुण की जेब में उसका मोबाइल बजा. फोन माँ का था. माँ ने कहा बेटा कल से तुमने फोन नहीं किया है. मै परेशान हो गयी थी. अरुण बोला माँ मै ठीक हू आप चिंता ना करो. मै थोड़ी देर में फोन करता हूँ. अरुण ने तारीख देखी. आज बुधवार 30 मई 2007 थी. अरुण पिछले सैंतीस दिन के बाद आज संसार में वापस आया था. और माँ सिर्फ एक दिन फोन ना करने का उलाहना दे रही थी. अरुण समझ गया कि यह सब सर्वोत्तम के कारण हो रहा था.
सर्वोत्तम की आवाज़ अरुण के दिमाग में गूंजने लगी. सर्वोत्तम ने अरुण को आज्ञा दी कि अरुण को अब घर चले जाना चाहिए. अक्षय को अरुण के साथ ही जाना था. अरुण ने अक्षय का हाथ पकड़ कर फिरसे पारगामी विद्या से हरिद्वार पहुँच गया. वहाँ से ट्रेन से दोनों दोस्त अरुण के शहर के लिए चल पड़े.
पांच घंटे का ये सफर दोनों दोस्तों की बातों में कब कट गया. पता ही नहीं चला. अरुण के शहर दिल्ली आ कर दोनों अरुण के घर पहुँच गए. अरुण को वापस आया देख कर माँ पापा बेहद हैरान हुए. माँ तो रोते हुए अरुण के गले से लग गयी. अरुण ने माँ को चुप करवाया और अक्षय से उन्हें मिलवाया, और दोनों को बताया कि उसका दोस्त अक्षय उनके साथ ही कुछ दिन रहेगा. माँ बोली लो एक बेटा गया था अब दो वापस आये हैं. अक्षय ने माँ पापा के पाँव छुए. अरुण अक्षय को अपने कमरे में ले गया. दोनों दोस्त नहा धो कर नीचे आये तो रूपा ने जल्दी जल्दी खाना लगा दिया. सभी ने खाना खाया और अरुण और अक्षय खाने के बाद घूमने निकल गए. कई घन्टे घूमते रहे अब अरुण ने अक्षय से पूछा कि हमे अचानक वापस क्यूँ भेजा गया है. अक्षय बोला भैया हम भविष्य देखने के लायक अभी नहीं हैं. जब हम पांचवें स्तर पर पहुँच जायेंगे तो हम भविष्य देखने के काबिल हो जायेंगे. अभी तो सर्वोत्तम ही जानते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यूँ किया है.
वे लोग घर वापस आ गए. घर आकर दोनों अरुण वाले कमरे में चले गए. भीतर दोनों मित्र समाधिस्थ हो गए. सुबह सात बजे उनकी समाधि टूटी. अरुण ज़ल्दी से तैयार हो कर अपने ऑफिस चला गया. अक्षय घर में माँ के साथ रह गया. माँ के आगे पीछे घूमता अक्षय शाम तक माँ और रूपा के साथ एकदम ऐसा हो गया जैसे वो इसी घर का बेटा हो. शाम को जब अरुण और पापा घर आये तब अक्षय सोफे पर माँ की गोद में सर रखे लेटा था. अरुण ने हंस कर कहा, यह क्या है छोटा बेटा आया तो सारा प्यार उसी पर लुटाया जा रहा है. माँ कहने लगी तुझे तो सत्ताईस साल प्यार दिया है इसे तो सत्ताईस घंटे भी नहीं हुए हैं. अब अक्षय बोल पड़ा, माँ कोई जल रहा है. सब लोग हँसने लगे.
बस इसी तरह अरुण और अक्षय घर के वातावरण में रम गए. पूरा दिन अरुण ऑफिस में रहता, अक्षय या तो घर पर माँ के साथ या पापा के साथ फैक्ट्री में व्यस्त रहता. रात को दोनों तपस्या करते. पूरा एक महीना बीत गया. अक्षय को पता चल गया कि माँ को अरुण की शादी की बहुत चिंता है.
रविवार 1 जुलाई 2007
गृहस्थ आश्रम में अरुण
आज रविवार को सुबह सुबह अक्षय ने कहा, अब मै अपने घर जा रहा हूँ.अरुण बड़ा हैरान हुआ कि अचानक ये अक्षय को क्या हो गया. इसका घर कहाँ है. इसके माता पिता कौन हैं अक्षय ने कुछ भी नहीं बताया था. और आज अचानक ये अपने घर जाने की बात कर रहा था. अरुण ने अकेले में अक्षय से पूछा यह सब क्या चक्कर है. अक्षय ने बताया कि सर्वोत्तम की आज्ञा से वो चल रहा है. इसी सप्ताह में अरुण के लिए रिश्ता आएगा और अरुण को बिना मीन मेख के शादी कर लेनी है. अरुण बोला यह कैसे संभव है. मै शादी करके ब्रह्मचारी कैसे रह पाऊंगा. पर अक्षय ने कहा आज रात सर्वोत्तम अरुण से बात करने आयेंगे. और बाकी वो समझा देंगे. अक्षय ने अपना समान उठाया और सबसे विदा लेकर वो घर से बाहर आया तो एक मर्सिडीज गाड़ी उसे लेने आ गयी. अरुण समझ गया कि अक्षय भी बहुत बड़े घर का बेटा है. अब अक्षय जब जाने लगा तो अरुण का भी मन परेशान सा हो गया. पर उसके मनके भीतर के योगी ने अरुण को संभाल लिया, अक्षय अरुण से गले मिला और गाड़ी में बैठ कर चला गया.
रात को अरुण ने अपने सांसारिक वस्त्र निकाले और नग्न तपस्यारत हो गया. तभी उसके सामने सर्वोत्तम प्रकट हुए. अरुण ने तुरंत उनको प्रणाम वंदना की. और अरुण को कहा कि अब समय आ गया है कि अरुण शादी कर ले. अरुण ने पूछा कि अगर वो शादी करेगा तो उसके ब्रह्मचर्य का क्या होगा. सर्वोत्तम ने कहा कि शादी से अरुण का ब्रह्मचर्य नष्ट नहीं होगा. बाकी वो शादी के बाद समझ जाएगा. अरुण ने नतमस्तक हो कर कहा कि जैसी आपकी आज्ञा. सर्वोत्तम हवा में विलीन हो गए. अरुण उस रात तपस्या में इतना विलीन हो गया कि सुबह होने का उसे पता ही नहीं लगा. सुबह जब रूपा ने दरवाज़ा खटखटाया तब अरुण की तन्द्रा टूटी. अरुण ने आवरण विद्या से अपने शरीर पर वस्त्र आवरण चढ़ाया और इच्छा मात्र से दरवाजा खोल दिया. रूपा चाय ले कर आई थी. अरुण ने जल्दी से चाय पी और तैयार हो कर ऑफिस जाने लगा तो माँ कहने लगी कि अक्षय के जाने से घर कितना सूना सूना हो गया है. अरुण बोला हाँ माँ ये बात तो है. अरुण ऑफिस चला गया तो माँ के पास अक्षय का फोन आया. बोला, माँ मैंने भैया के लिए एक रिश्ता भेजा है. लड़की मेरी बुआ की बेटी है. भैया उसे देखेंगे तो मना नहीं करेंगे. मैंने भैया को मना लिया है. माँ बोली, बेटा मेरा ये काम करके तुने कमाल कर दिया है. उसी शाम को राजविंद्र जोशी नाम के एक सज्जन घर पर अरुण के पापा से मिलने आये और उन्होंने बताया कि वो रिश्ता ले कर आये हैं. पापा और राजविंद्र जी बातें कर रहे थे तो पता चला पापा के कई कारोबारी मित्र राजविंद्र जी के भी मित्र निकले. राजविंद्र जी ने तुरंत फोन करके ऐसे कई लोगों को बुला लिया. पापा बड़े खुश हुए कि टक्कर का खानदान मिला है जब उन्होंने अपनी बेटी राजेश्वरी की फोटो दिखाई तो माँ पापा देखते रह गए. इतनी सुन्दर इतनी प्यारी और एक दम सादी लड़की थी. उसने कोई मेकअप वगरह भी नहीं किया हुआ था. अगले रविवार काठगोदाम में लड़की देखने का कार्यक्रम बना. अरुण ने कोई आपत्ति नहीं की.
अगले रविवार ये लोग काठगोदाम लड़की देखने गए. वहाँ लड़की सबको पसंद आ गयी. अरुण ने भी अपनी सहमति दे दी. माँ के तो पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. जुलाई की बाईस तारीख की शादी रखी गयी. और घर वापस आ कर माँ शादी की तयारियों में लग गयी. सारे घर में गहमागहमी थी. और फिर बाईस तारिख भी आ गयी और बड़े धूम धाम से राजेश्वरी दुल्हन बनके अरुण के साथ उसके घर आ गयी.
फिर सुहागरात को अरुण बेहद परेशान था कि अब पतिधर्म वो कैसे निभाए. सर्वोत्तम के कहने के बावजूद मन में एक डर था. पर रिश्ते की भाभियाँ और भाई उसे छेड़े जा रहे थे और उन्होंने अरुण को उसके कमरे में धकेल दिया. भीतर सजी हुई सुहाग सेज पर दुल्हन गठरी बनी बैठी थी. अरुण की समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. वो जा कर सेज पर दुल्हन के पास बैठ गया. अचानक ही दुल्हन ने अरुण के गले में बाहें डाल दी. अरुण हकबका गया. दुल्हन ने अपनी चुनरी हटा दी. अरुण की आँखें फटी की फटी रह गयी. दुल्हन के वेश में अक्षय बैठा हुआ जोर जोर से हंस रहा था. अरुण एकदम हैरान. अक्षय ने अरुण को बाहों में भर कर उसको छेड़ते हुए बोला चलो सुहागरात मनाये. अब अरुण ने पूछा अक्षय ये सब क्या है. अक्षय ने बताया कि माँ की इच्छा थी कि तुम्हारी शादी हो जाए. सर्वोत्तम ने मुझे नारी रूप और शीशनाथ को मेरे पिता का रूप देकर आपकी शादी की माँ की इच्छा पूरी कर दी. अब मै दिन में आपकी पत्नी रूप में माँ पापा की सेवा करूँगा और रात को आपके पुत्र रूप में आपके साथ साधना करूँगा. दोनों मित्र इस अनोखी साधना यात्रा पर चल पड़े. सारी रात साधना व् दिन में माँ पापा की सेवा अक्षय बहुत तेजी से साधना पस्त पर बढ़ता जा रहा था. जिस दिन अरुण सातवें स्तर से ऊपर चढ कर छटे स्थान पर पहुंचा उसी दिन अक्षय अपनी साधना और सेवा से नौंवे स्थान से सातवें स्थान पे पहुँच गया.
स्वयं ऋषि रविनाथ ने उन्हें आकर इस आशय की सूचना दी और अरुण को मोतियों की माला में जड़े हुए शंख और अक्षय को स्फटिक की माला पहना कर उनकी सफलता का पुरस्कार दिया. जैसे ही मालाएं दोनों के गले में पहनाई गयी मालाएं उनके शरीर में प्रवेश कर गयी. अब अरुण और अक्षय का उत्साह और भी बढ़ गया. उनकी तपस्या गहन से गहनतम होती गयी.
दिसंबर के साथ सर्दियाँ अपने पूरे यौवन पर पहुँच गयी. दोनों मित्रों का रहस्य रहस्य ही बना रहा. कोई भी इसे जान नहीं पाया. फिर एक दिन अचानक उनकी नौकरानी रूपा की शादी हो गयी. अक्षय ने माँ को और नौकरानी रखने नहीं दी. घर का सारा काम अरुण की पत्नी राजेश्वरी रूप में अक्षय ने करना शुरू कर दिया. रूपा के जाने से एक बार सारा घर अस्त व्यस्त हो गया था. रूपा इस घर में बारह वर्ष काम कर कर गयी थी. घर की एक सदस्य जैसी हो गयी थी, उसके जाने के बाद घर सुना सुना सा भी हो गया था,
पच्चीस दिसंबर की रात थी. दिल्ली में क्रिसमस की धूम मची हुई थी. माँ पापा हर साल की तरह डीसूजा अंकल के यहाँ पार्टी में गए थे. अरुण और अक्षय घर पर अकेले थे. दोनों ने ध्यान में बैठने की तैयारी की ही थी कि फोन बजा, सूचना मिली कि घनी धुंध में अरुण के माँ पापा का भयानक एक्सीडेंट हो गया था. अरुण और अक्षय तुरंत वहाँ पहुंचे. वहाँ जा कर देखा कि सर्वनाश हो चुका था. दोनों का प्राणांत हो गया था. एक तेज आते ट्रक ने अरुण को अनाथ बना दिया था. अरुण टूट गया. अरुण और अक्षय फूट फूट कर रोने लगे. पर अब कोई चारा नहीं था.
अगले दिन दोपहर को दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया. तेरह दिन तक सारे रिश्तेदार आदि आते रहे. अक्षय राजेश्वरी के रूप मे सभी काम करता रहा. चौदहवें दिन घर में सिर्फ अरुण और अक्षय ही बचे थे. सभी रिश्तेदार जा चुके थे. अरुण के सामने सर्वोत्तम प्रकट हुए. उन्होंने कहा अरुण मुझे पता था कि तुम्हारे माता पिता का शरीर पूरा होने वाला है इसलिए मैंने तुम्हे वापस भेज दिया था और उनके मन में तुम्हारी शादी का बड़ा चाव था इसलिए तुम्हारी शादी उन्ही के सामने करवा दी. तुम्हारा ब्रह्मचर्य बचा रहे इसलिए अक्षय को स्त्री रूप में भेज दिया गया. अब तुम संसार त्याग सकते हो. पीछे कोई बंधन तुम्हे अब खींचेगा नहीं. अब तुम वापस पंथ में आ जाओ.
28 जनवरी 2008
साधना और पंथ
अरुण ने घर फैक्ट्री जमीन जायदाद आदि बेच कर पैसे से अपने माता पिता के नाम से एक धर्मार्थ ट्रस्ट बना दी और अक्षय को साथ ले कर हरिद्वार पहुँच गया. हरिद्वार से पारगामी विद्या द्वारा वो बद्रीनाथ और फिर सहस्त्रधारा पहुँच गये. वहाँ ऋषि रविनाथ से मिले. ऋषि रविनाथ ने अरुण और अक्षय को सतोपंथ जाने की आज्ञा दे दी. अरुण ने जैसे ही पारगामी विद्या का प्रयोग करने लगा रविनाथ ने कहा. अरुण अब समय आ गया है कि तुम शरीर को कष्ट देने शुरू करो. आज तुम अपनी पारगामी विद्या को त्याग दो. अरुण ने कहा, जैसी आपकी आज्ञा. अरुण ने दोनों हथेलियों की अंजुली बनायीं और उसमे हवा लेकर अपनी पारगामी विद्या को तर्पण के साथ त्याग दिया, अक्षय ने भी अपनी पारगामी विद्या त्याग दी. अब रविनाथ के आदेश पर अरुण ने अपनी आवरण विद्या, आकर्षण विद्या, प्राकट्य विद्या, मोहन-सम्मोहन जैसी अनेको विद्याओं का तर्पण कर दिया. अक्षय ने भी अपनी अधिकतर शक्तियों को तर्पण कर दिया. तभी एक गडगडाहट हुई और सर्वोत्तम प्रकट हुए. उन्होंने अरुण और अक्षय दोनों को पांचवां स्तर देने की घोषणा की. अब अरुण और अक्षय एक ही स्तर पर आ गए थे.
सर्वोत्तम ने कहा आज से तुम दोनों त्रिकाल भूत,वर्तमान,भविष्य सब जान सकोगे. और आज से तुम दोनों साधना के लिए अपने पिछले साधना स्थल सतोपंथ के पास चले जाओगे. वहाँ पर तुम अगले स्तर तक साधना करोगे. अरुण और अक्षय ने रविनाथ और सर्वोत्तम की चरण वंदना की और गुफा से बाहर आ गए. बाहर आ कर दोनों फिरसे सहस्त्रधारा पहुंचे और वहाँ से लक्ष्मीवन के लिए चल पड़े. एक तलवार की धार जैसा रास्ता बर्फ से लदा हुआ जिस पर एक बार में सिर्फ एक ही पाँव रखा जा सकता था को पार करके वो लोग लक्ष्मीवन पहुँच गए .लक्ष्मीवन इस पेड़ पौधे रहित भूमि में एक चमत्कार जैसी जगह है. मीलों तक जहाँ कोई पेड़ दिखाई नहीं देता वहाँ भोजपत्रों के पेड़ों का इतना बड़ा झुंड हर किसी को अचम्भे में डाल देता है. इस वृक्ष समूह में माँ लक्ष्मी ने विष्णु को पाने के लिए तपस्या की थी. इस जगह पर की गयी तपस्या से विष्णु अवश्य प्राप्त होते हैं ऐसा भागवत में कहा गया है. इसी जगह पर नकुल नामक पांडव ने प्राण त्यागे थे.
फरवरी का महीना शुरू हो गया था और बर्फ गिरनी बंद भी हो चुकी थी. जो रुई के फाहों जैसी बर्फ आकाश से गिरी थी वो ज़मीन पर चट्टानी बर्फ के रूप में जम चुकी थी. अब एवालांच वगेरह का खतरा भी नहीं थी. पर ठंड इतनी ज्यादा थी की अगर उबलता हुआ पानी हवा में फेंका जाए तो वो बर्फ बन कर जमीं पर गिरेगा. यह दोनों योगी शरीर पर सिर्फ हवा ओढ कर चले जा रहे थे. लक्ष्मीवन के किनारे उन्होंने अपना डेरा जमा लिया. अक्षय बड़ी मुश्किल से लकडियाँ इकट्ठी कर के लाया और उनसे हवन शुरू कर दिया. अब उनके हवन और जप से आसपास से सूखी लकडियाँ इकट्ठी हो कर उनके पास पहुँचने लगी. अरुण और अक्षय की कुण्डलिनी उठने लगी.
अपान वायु गुदा द्वार से निकल नहीं सकी. क्यूंकि वो मार्ग उनकी दाहिनी एड़ी से रुका हुआ था. अब अपान वायु ऊपर उठते हुए मूलाधार चक्र को बेध गयी. मूलाधार के बेध से मूलाधार चक्र नींद से जाग उठा. मूलाधार चक्र के जागृत होते ही उनके शरीर में मूषक पर बैठे हुए श्री गणेश का वास हो गया. अब गणेश जी के गुण उनके देह मंदिर में समा गए. जबसे ये दोनों यहाँ के लिए निकले थे उस दिन से आज तक तेईस दिन हो गए थे, इन दोनों ने एक तिनका भी नहीं खाया था. अब उनके शरीर में भूख जाग उठी थी. यहाँ कौन से पकवान मिलने थे. अचानक ही उनके सामने कुछ अजीब से फल आ गए. दोनों ने उन फलों को खाना शुरू कर दिया. फलों के बीच में वे लोग बर्फ भी खाते रहे.
जब उनका पेट भर गया तो दोनों मित्रों ने मूलाधार चक्र पर पूरा नियंत्रण पाने के लिए उस के बीज मन्त्र लँ(लम) का जप शुरू कर दिया. उनके सामने एक ऋषि प्रकट हुए. बोले मै इस मूलाधार चक्र का सेवक हूँ आज मै तुम्हे मूलाधार चक्र के विषय में सारी जानकारी दूँगा.
मूलाधार चक्र :- ये चक्र आपकी रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले सिरे पर आपके मलद्वार के भीतर स्थित होता है. इस चक्र का काम मानव की आदतें बनाने का होता है, शारीरिक रूप से यह चक्र काम भावना को नियंत्रित करता है. मानसिक रूप से यह चक्र स्थायित्व देता है. और दैविक रूप से यह आपको सुरक्षा भावना देता है. काले शिवलिंग के चारो ओर साढे तीन कुंडली मारे सर्पिनी से तीनो नाड़ी- इड़ा, पिंगला, सुषम्ना का नियंत्रण होता है. सृष्टि निर्माण के समय शक्ति इसी जगह पर बाँध दी गयी थी. जिस साधक का यह चक्र जाग जाता है उसकी शक्ति ऊपर की और बढ़ जाती है.
आपकी इस कठिन साधना से आपको मूलाधार नक्षत्र जाग गया है और आपकी कुंडलिनी ऊपर की ओर चलने लगी है.इसलिए अगले चौदह दिनों में आपकी कुण्डलिनी स्वाधिष्ठान चक्र में पहुँच जायेगी. मै गणक ऋषि आपको इस सफलता पर आशीर्वाद देने आया था, यह कह कर ऋषि गणक अंतरध्यान हो गए.
अरुण और अक्षय ने ऋषि गणक के कहे अनुसार अब काम भावना से ऊपर उठ गए थे. मार्च का महीना आने से बसंत चारों और बहार ले आया था. अब बसंत के देवता कामदेव के बाण भोथरे हो गए थे दोनों योगी अब अब समाधि से बाहर आ कर आस पास के इलाके में घूमने लगे. एक दिन उन्हें वहाँ एक चरवाहा मिला जो अपनी भेड़ें ले कर वहाँ घूम रहा था. उसने इस योगी जोड़ी को देखा तो चरण वंदना करके भेड़ों का दूध निकाल कर ले आया. दोनों मित्रों ने वो दूध पिया तो उन्हें याद आया सोलह जनवरी के बाद उन्होंने पहली बार दूध पिया था. अब वे लोग चक्रतीर्थ में जा कर रहने लगे. वही चरवाहा अब रोज इनके लिए मोटे अनाज की रोटियां याक का घी, आदि ले आता. दोनों मित्रों के शरीर भरने लगे.
एक दिन अचानक ही अरुण के मन में विचार आया कि हम भोजन पाने के लिए उस चरवाहे का इन्तेज़ार करते रहते हैं. इसका मतलब हमारे मन में अभी भोजन का बंधन बाकी है. उसने अपने मन की बात अक्षय को बताई. अक्षय बोला भैया कह तो आप ठीक ही कह रहें हैं. आज से हम प्रण करते हैं दिन में एक ही बार खायेंगें और वो भी बस वही चीज़, जो समाधी खुलने के तुरंत बाद हमारे सामने होगी. दोनों मित्रों ने यह व्रत ले लिया. (इसे उपसर्ग भी कहते हैं)
अब जब भी चरवाहा भोजन ले कर आता उससे पहले ही ये घास, पौधे, जंगली बेरी आदि खा कर पेट भर लेते. चरवाहे का भोजन बड़ी विनामार्ता से वापस कर देते. एक दिन चरवाहा रोने लगा, बोला, मुझ से क्या गलती हो गयी जो आपने मेरा भोजन करना छोड़ दिया है. दोनों मित्र बोले हमने उपसर्ग लिया है, इसलिए अब हम किसी का लाया भोजन कभी नहीं करेंगे. चरवाहा रोते रोते हंस पड़ा. और उसका शरीर पिघल कर वहाँ ज़मीन में समा गया, उसकी भेडें भी गायब हो गयी. और अब उनके सामने खड़े थे एक सफ़ेद वस्त्रों में ऋषि, वे बोले मै ऋषि ब्रहमणक हूँ. मै स्वाधिष्ठान चक्र का रक्षक हूँ आज तुम्हारा उपसर्ग तुम्हे आदतों से मुक्त कर गया है. तुम्हारी जरूरतें बहुत ही कम रह गयी हैं. और अब तुम्हारा स्वाधिष्ठान चक्र भी बेध हो गया है.
यह चक्र सफ़ेद कमल के बीच में चांदी के चंद्रमा का होता है. चारों और छः केसरी रंग की पंखुड़ी होती हैं. इसके देवता ब्रह्माजी होते हैं. शारीरिक रूप में यह चक्र संतान देता है मानसिक रूप से यह चक्र निर्माण धर्मिता देता है और दैविक रूप से उत्साह देता है. शरीर में यह अंडकोषों/अंडाशय से नाभि के बीच में स्थित होता है. इसका बीज मन्त्र वं(वम) होता है.
ब्रहमणक ऋषि यह कह कर दोनों को आशीर्वाद दे कर लुप्त हो गए.
अब उनके शरीर में नाभि से नीचे का सारा भाग जागृत हो गया था.
ऋषि रविनाथ अरुण और अक्षय के सामने प्रकट हुए और उन्हें चक्रतीर्थ जाने की आज्ञा दे दी. दोनों मित्र चक्रतीर्थ पहुँच गए. चक्रतीर्थ में अरुण और अक्षय के सामने उनका तीसरा जन्म खुल गया.
तीसरा जन्म 1804- 1919
नागपुर के भोंसले राजा राघोजी जानोजी भोंसले के सेनापति सरदार व्यौहार दरियाव सिम्हा ने पिंडारी मीर खान को बड़ी बहादुरी से हराया. इन्ही दरियाव सिम्हा ने कई बार अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए थे. राजा ने अपने सेनापति की बहादुरी से खुश हो कर उसे जब्बलगढ़( आज के जबलपुर) की जागीर दे दी. अब दरियाव ने अपना नाम रखा राज्यमन राजश्री व्यौहार दरियाव सिम्हा और एक सुलतान की तरह सारे जब्बलगढ़ पर अपने सुशासन से उत्तम नगर बना दिया. दरियाव सिम्हा के सुशासन के चर्चे दूर दूर तक थे. इसके शहर में एक वणिक परिवार रहता था. परिवार के मुखिया थे सेठ रामजी आगरावाल.
यह आगरा से आया परिवार रानी दुर्गावती के समय से इस नगर में रह रहा था. परिवार बेहद धनी और मानी था. सारे नगर में इनकी इज्ज़त थी. इनके धार्मिक आस्थाओं की वज़ह से ही नगर में गणेश उत्सव, शिव रात्री के त्यौहार मनाये जा रहे थे. सेठ रामजी जिन्हें दरियाव सिन्हा भी सम्मान से श्रेष्ठ जी कह कर बुलाते थे, के चार पुत्र थे, आश्विन, कार्तिक, श्यामल और शम्भू.
तीसरे पुत्र श्यामल अगरावाल व्यापार के सिलसिले में दिल्ली गए हुए थे. वहाँ से वापस आते हुए इनका कारवां ठगों के चंगुल में फँस गया और ठगों ने सारे कारवां को खत्म करके जमीन में दबा दिया गया. एक पन्द्रह सोलह साल का लड़का जो इस कारवां के साथ था वो किस्मत से बच निकला और एक दूसरे कारवां के साथ वो जब्बलगढ़ पहुंचा और सारी खबर बताई. अब सारे नगर में शोक की लहर दौड गयी.
( उस ज़माने में घर से दूसरे शहर जा रहे व्यक्तियों को रास्ते में अक्सर एक लुटेरा समूह मिल जाता था जो अक्सर कारवां में शामिल हो कर रात को रूमाल से फंदा बना कर सारे कारवां को मार डालते थे और गड्ढा खोद कर सभी को ज़मीन में दबा देते थे और सारा सामान लूट कर गायब हो जाता था. इनका तरीका इतना कारगर था और यह पूरे कारवां को खत्म कर देता था कि कोई बताने वाला जिंदा नहीं रहता था. इसी ठग जाति ने मध्य भारत में सात सौ आठ सौ सालों में बेहिसाब लोगों को मार डाला था. और विलियम हेनरी कलीनन नामक अँगरेज़ ने एक ठग से दोस्ती करके सारी जानकारी हासिल की और 1830 से 1844 के बीच मे तीस हज़ार ठगों को फांसी पर लटका दिया और भारत से ठग जाति को लगभग समाप्त कर दिया. जो भी मुसाफिर घर से निकलता था और वापस नहीं आता था वो कहाँ गायब हो जाता था इस रहस्य का हमेशा के लिए खुलासा भी हो गया था.)
श्यामल की पत्नी ने सदमे में आत्महत्या कर ली और अपने पीछे दो बेटे छोड़ गयी, जिनके नाम अरुण और अक्षय थे. अरुण पन्द्रह साल का और अक्षय दस साल का था. दोनों भाई चाचा ताऊ की छत्रछाया में पलने लगे. एक दिन एक सन्यासी नर्मदा के किनारे बैठा था. उसने अरुण को आते हुए देखा और वो साधु अरुण को देख कर हैरान रह गया. वो उठा और आकर अरुण की चरण वंदना करने लगा. अरुण के साथ आये नौकरों ने यह दृश्य देखा तो वो हैरान हो गए और घर आकर रामजी जिन्हें सब लोग आदर से बाबा सेठ के संबोधन से पुकारते थे को बताई. बाबा सेठ ने तुरंत नौकरों को भेज कर उस साधु को बुलवा लिया. साधु आये तो बाबा सेठ ने उनसे पूछा कि उनके पुत्र के पाँव वो क्यूँ छू रहे थे. साधु ने बताया, आपके पुत्र के रूप में जन्म लेने वाला बालक पिछले जन्म का सिद्ध पुरुष है और इसका नाम अश्वनाथ था. ये और इनका भाई देवनाथ हिमालय पर्वत के तपस्वी थे और मेरे गुरु के यह गुरु थे. इस कारण यह
मेरे दादा गुरु हो गए. इस कारण मैंने इनके पाँव छुए थे.
बाबा सेठ बड़े प्रसन्न हुए कि उनके वंश में ऐसे सिद्ध पुरुष ने जन्म लिया है. तभी वहाँ अक्षय भी आ गया. साधु ने उसे देखा तो उसकी आँखों से आंसू बहने लगे. बोला मेरा तो जन्म सफल हो गया जो अश्वनाथ और देवनाथ दोनों के दर्शन एक साथ हो गए. साधु ने दोनों लड़कों के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और बोला इन दोनों को बद्रीनाथ ले जाना. ये दोनों वापस वहीँ के लिए आये हैं और साधु ने ये कहते कहते चोला(शरीर) छोड़ दिया. बाबा सेठ ने पूरे सम्मान के साथ साधु को नर्मदा में समाधी दिलवा दी.
सारे शहर में इस बात की चर्चा हो गयी और लोग झुण्ड के झुण्ड इन बालकों के दर्शन को उमड़ पड़े. चर्चा जागीरदार के भाई गन्धर्व सिम्हा तक भी पहुंची. उन्होंने भी आकर बालकों के दर्शन किये और बाबा सेठ को कहा, श्रेष्ठ जी अब आप एक बार इन बालकों को बद्रीनाथ भी ले जाओ. बाबा सेठ कहने लगे, मेरे श्यामल की आखरी निशानी हैं ये दोनों. बद्रीनाथ में ले जा कर अगर यह दोनों सन्यासी हो गए तो मै अपने दिल को तसल्ली कैसे दूँगा, गन्धर्व सिन्हा ने समझाया, श्रेष्ठ जी, हम लोग इन सिद्ध महात्माओ की लीला क्या जाने, मेरी बात मानो एक बार इन्हें बद्रीनाथ भेज ही दो. मै मानता हूँ छः महीने का रास्ता है, पर अँगरेज़ आपके बेटे श्यामल का बदला लेने के लिए रोज कितने ठगों को मार रहे हैं. उसका नाम तो इतिहास में वैसे ही अमर हो जाएगा मै अँगरेज़ सरकार के साथ इनका दल भिजवा देता हूँ. जो इन्हें देहरादून तक छोड़ देंगे वहाँ से बहुत जत्थे हरद्वार होते हुए बद्रीधाम जाते हैं. बाबा सेठ ने कह दिया कि अच्छा सोचूंगा. पर उनका मन बिलकुल भी नहीं था. रोज लोग उन्हें कहने लगे, पर उन्होंने ठान लिया की वो अपने पौत्रो को नहीं भेजेंगे.
1822 में अरुण का विवाह कर दिया गया और चार साल बाद अक्षय का भी विवाह कर दिया गया. 1837 में बाबा सेठ ने शरीर त्याग दिया और सारा घर कारोबार का बंटवारा हो गया. अरुण अपना हिस्सा लेकर अपने भाई के साथ दिल्ली चला गया. जब्बलगढ़ के ऊपर 1942 में अंग्रेजों ने अपना हक जमा लिया और इसका नाम जबलपुर कर दिया.
दिल्ली में अरुण और अक्षय का कारोबार ठीक नहीं चल रहा था वे लोग वहाँ से पानीपत और फिर वहाँ से सहारनपुर चले गए. सहारनपुर में अरुण ने गुड़ शक्कर का काम कर लिया. यहाँ अरुण का व्यापार चल निकला. अरुण और अक्षय के यहाँ दो दो बेटों थे. अरुण और अक्षय मशहूर व्यापारी बन गए. इनका काम सारे पौड़ी गढ़वाल राज्य में फैला हुआ था . अक्सर दूर दूर के व्यापारी इनके यहाँ आते. एक दिन किसी व्यापारी ने इन्हें जोशीमठ आने का न्योता दिया और अरुण जोशीमठ चला गया. जोशीमठ में अरुण की मुलाकात एक साधु से हुई जो बद्रीनाथ जा रहा था. अरुण उसके साथ बद्रीनाथ चला गया. वहाँ अरुण की मुलाकात रविनाथ से हुई, जिसने अरुण को तुरंत पहचान लिया. अरुण को रविनाथ अपने साथ पहाड़ों में बेहद दुर्गम स्थानों पर यात्रा करवा कर अरुण को पिछले जन्म की याद दिलवा दी. अरुण अठारह दिन की यात्रा के बाद जब घर वापस आया तो वो एकदम बदल चुका था. अरुण ने कामकाज में रूचि लेनी बहुत कम कर दी. अक्षय की समझ में नहीं आया कि वजह क्या थी. 1858 में अंग्रेजों ने देश में हुए स्वतंत्रता संग्राम को बुरी तरह कुचल दिया. और बहुत से राजा रियासत खत्म हो गए. देश में एक भय का माहौल था. इसी दौरान चौवन साल की पकी उम्र में अरुण ने अक्षय को साथ लिया और सारा कारोबार बेटो को सौंप कर वे लोग पत्नियों सहित बद्रीधाम की यात्रा पर निकल पड़े. बद्रीधाम में अरुण की पत्नी का देहांत हो गया और आठवें दिन अक्षय की पत्नी भी चल बसी.
अब अरुण और अक्षय के सामने रविनाथ प्रकट हुए और उन्हें साधना मार्ग पर डाल दिया. बड़ी कठिन तपस्या करते करते अरुण ने 1919 में शरीर त्याग दिया. अक्षय ने अरुण की बेहद सेवा की, इसी सेवा से प्रसन्न हो कर अरुण ने अपने भाई अक्षय की आयु पचास वर्ष पर रोक दी और अक्षय को कहा मेरा अगला जन्म कूचबिहार में होगा, तुम मुझे वहाँ लेने आ जाना. जिस दिन तुम मुझे ले जाओगे उसके बाद ही तुम्हारी आयु बढ़नी शुरू होगी. अरुण ने अक्षय से प्रण लेकर प्राण त्याग दिए. अक्षय देवनाथ बन कर अकेले ही तप करता रहा. 1919 से 1934 तक देवनाथ ने अकेले तपस्या की और अरुण के पुर्नजन्म की प्रतीक्षा की और फिर अरुण को लाने वो कूचबिहार चला गया.
सम्पूर्ण योगी 18 अप्रैल2008(वापस पांचवें जन्म में)
अब चक्रतीर्थ में अरुण और अक्षय ने एक गुफा में अपना डेरा डाला और वहाँ अपनी तपस्या शुरू करदी. और मणिपुर चक्र और अनाहत चक्र को बेध लिया
इस चक्र के लिए ऋषि रुद्रक ने अरुण और अक्षय को बताया कि वे दोनों अब मणिपुर चक्र को बेध चुके हैं. यह नाभि के पास स्थित होता है और पाचन क्रिया को नियंत्रित करता है. इसमें पीले रंग के कमल में एक उल्टा त्रिकोण होता है जो शारीरिक रूप में पाचन, मानसिक रूप में आत्मिक संबल और दैविक रूप में विस्तार का द्योतक है. इसका बीज मंत्र रं(रम) है. इसके देवता वृद्ध रूद्र हैं. और अरुण व् अक्षय को आशीर्वाद दे कर ऋषि रुद्रक गायब हो गए
इसके कुछ दिनों के बाद इनके सामने इशांक ऋषि प्रकट हुए और उन्हें बताया कि उन्होंने अनाहत चक्र को बेध लिया है. अनाहत चक्र के जागृत होने के बाद मानव को कोई आहत( घायल) नहीं कर सकता. इस चक्र का वास शरीर मे नाभि हे ऊपर व् छाती से नीचे होता है.
यह हरे रंग का बारह पंखुड़ी का कमाल होता है जिसमे दो त्रिकोण एक दूसरे को काटते हैं यो नर नारी के मिलन का प्रतीक है. यह शरीर में रोग प्रतिरोधकता और रक्त संचार को नियंत्रित करता है मानसिक रूप में यह मम स्वयं की भावना को नियंत्रित करता है. और दैविक रूप में यह अपने इष्ट के लिए समर्पण भाव को जगाता है.
धीरे धीरे अरुण और अक्षय की कुण्डलिनी के सातों चक्र जागृत हो चुके थे. अब ब्रह्माण्ड से आई दिव्य तरंगे सहस्रार चक्र से हो कर उनके शरीर में पहुंचनी शुरू हो गयी थी. अब शरीर में किसी भी रोग का वास नहीं हो सकता था. मानसिक रूप से योगित्व लगभग सम्पूर्ण हो चुका था. नवंबर का महीना शुरू हो गया था. अब रविनाथ ने दोनों को वापस गुफा में बुला लिया और वहाँ पर अगले चरण की तपस्या की आज्ञा दे दी.
अरुण और अक्षय अब गुफा के भीतर तपस्या में लग गए. पर अरुण की तपस्या एक दिन शाम के समय अरुण गुफा से बाहर खड़ा हुआ उस रास्ते को निहार रहा था जहाँ से स्वर्ग जाया जा सकता था. लंबा गोरा बलिष्ठ शरीर कंधे तक लंबे बाल जो हवा में रेशम की तरह उड़ते जा रहे थे, गले में एक मोतियों की माला जिसमे एक मोती शंख पेंडेंट की तरह लटका हुआ. एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में कमंडल, दृष्टि दूर क्षितिज को निहारते हुए. शाम के सुनहरे धूप के आवरण ने अरुण के शरीर को एक दिव्यता प्रदान कर दी थी. हवा में ठंडक शुरू हो चुकी थी. पर अरुण को इसका अहसास भी नहीं था. दिगंबर योगी जिसकी नज़र जमी हुई थी सिर्फ मंजिल पर. राह के कंकड पत्थर तो छोडो इनको तो पहाड़ और खाइयां भी नहीं रोक पाती.
अक्षय भी आकर अरुण के पास में खड़ा हो गया, एकदम अरुण की ही प्रतिमूर्ति था बस फर्क इतना था कि जहां अरुण लंबा था वहीँ अक्षय का कद औसत सा था. अक्षय कहने लगा भैया क्या सोच रहे हो. अरुण बोला, मुझे ऐसा लग रहा है कि एक सूनापन सा मेरे अंतर में पसर रहा है. आज मेरा मन साधना में नहीं लग रहा. जाने क्यूँ मेरा मन कह रहा है कि कहीं और चला जाऊं.
अक्षय एकदम घबरा गया उसे लगा कि कहीं अरुण भैया फिर पथभ्रष्ट तो ना हूँ जाएँ. तभी अचानक ही गुफा द्वार पर एक औसत से कद का साधक आ गया जिसे पहले कभी इन्होने देखा नहीं था. साधक पीले रंग की धोती और शरीर पर एक गरम चादर ओढे था. विशाल और हाथी की तरह उभरा हुआ मस्तक, छोटी आंखे जो सोच में डूबी प्रतीत हो रही थी. होंठों पर मुस्कान एक दिव्य सा अपनापन उनके शरीर से फूट रहा था. गले में एक स्वर्ण गणपति बता रहे थे कि साधक गाणपत्य हैं. साधक ने आकर दोनों साधकों से वंदना अभ्यर्थना की.
अरुण इस साधक को देख कर फूट फूट कर रोने लगा. अक्षय कुछ समझ नहीं पा रहा था. अक्षय ने पारिची शक्ति प्रारंभ कर दी. पारिची को समक्ष देख साधक ने तुरंत प्रणाम किया. पारिची ने साधक के वक्ष पर हाथ रख दिया और साधक के वक्ष में समा गयी. साधक बोले, अक्षय कहूँ या देवनाथ, मेरा परिचय जानने के लिए तुम्हे शक्तियों का उपयोग नहीं करना चाहिए. तुम सिर्फ मुझ से पूछ भी सकते थे. अरुण सुन्न सा खड़ा था और उसकी आँखों से आंसुओं की दो लकीरें गालों से नीचे उतर कर गर्दन वक्ष से होती हुई सीने के मध्य संगम कर रहीं थी.
साधक बोले, मै बुद्धिनाथ, समयनाथ आदि नामो से जाना जाता हूँ. जब रविनाथ ने तुम्हे पांच सौ सोलह साल पहले तुम्हे दीक्षा दी थी तब से मै तुम्हारे साथ चलता रहा हूँ. गणेश जी की आज्ञा से तुम्हारे विघ्न दूर करता रहा हूँ. इस रूप में मेरा नाम रोहिताश्व है. मेरा यह स्वरुप 1968 से है और तुम्हारे जन्म 1980 और 1986 में हुए दैविक आज्ञा से अरुण के हर जन्म से बारह वर्ष पूर्व मै जन्म लेता रहा हूँ. हर जन्म में इसे अरुण से अश्वनाथ का व् तुम्हे अक्षय से देवनाथ का रूप मै ही देता रहा हूँ. चलो मै तुम्हे तुम्हारे उस जन्म में ले चलता हूँ जहां से तुम्हारा साधना पथ शुरू हुआ था.
पहला जन्म (1482-1639)
लखनऊ में गोमती के किनारे एक कायस्थ परिवार रहता था. परिवार के मुखिया थे रासबिहारी भटनागर. भगवन कृष्ण के अनन्य भक्त इस परिवार में रासबिहारी के अलावा उनकी धर्मपत्नी सुलभा और एक पुत्र गोविन्द थे. रासबिहारी जी कपडे का काम करते थे. दिल्ली के तख़्त पर सिकंदर लोधी का राज था. सिकंदर लोधी बहुत अच्छा प्रशासक था. उसमे मुस्लिम कट्टरता बहुत थी. पर हिंदुओं पर ज्यादा बंदिशे उसने नहीं लगा रखी थी. गोविन्द के विवाह की बात चल रही थी. दिल्ली के राधाकृष्ण श्रीवास्तव की पुत्री सुलेखा से गोविन्द का विवाह कर दिया गया. शादी के कई बरस बाद तक यह दंपत्ति निस्संतान रहा और इसी चिंता मे डूबे हुए रासबिहारी मथुरा में कृष्ण जी के मंदिर में अक्सर पौत्र के लिए भगवान से प्रार्थना करते रहते. एक दिन मंदिर में जब रासबिहारी सोच में डूबे बैठे थे तो एक साधु उनके पास आये और बोले कि अगर वे अपना प्रथम पौत्र सत्यपंथ को सौंप दें तो उनकी वंशबेल फिर से हरी भरी हो जायेगी. रासबिहारी जी ने तुरंत हाँ कर दी. उस साधु ने अपने झोले में से कुछ दाने निकाले और रासबिहारी जी को दे दिए और कहा घर जाकर शालिग्राम को छुआ कर एक दाना अपनी पुत्रवधू को खिला देना दस महीनों के बाद आपके यहाँ पौत्र पैदा होगा. इस बच्चे के एक बरस का होने पर अपनी पौत्र वधु को एक और दाना खिला देना. फिर दसवें माह उसे पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी और इस तरह आपके यहाँ पांच पौत्र हो जायेंगे.जब आपका सबसे बड़ा पौत्र चार बरस का हो जाएगा तब उसे मै ले जाऊँगा. और वो हमारे पंथ का भाग बन जाएगा. रासबिहारी जी साधु को प्रणाम करके लखनऊ की ओर चल पड़े.
घर पहुँच कर उन्होंने सारी बात अपनी पत्नी को बताई और सुलभा ने अपनी पुत्रवधू को. सुलेखा की इतनी हिम्मत नहीं थी के ससुर के फैसले का उल्लंघन कर सके. साधु के कहे अनुसार ही हुआ. सुलेखा के यहाँ पुत्र हुआ जिसका नाम अरुण रखा गया, दो बरसों के बाद उसके यहाँ दूसरा पुत्र हुआ, फिर दो बरसों में एक और पुत्र हो गया. रासबिहारी जी तो निहाल हो गए थे. उनके यहाँ तीन तीन पोते हो चुके थे. साधु कैसे आएगा उसे तो मेरे घर का भी पता नहीं यह सोच कर उन्हें बड़ी तसल्ली थी. पर एक दिन एक साधु द्वार पर आकर अलख जगाने लगा तो सुलभा खाना ले कर द्वार पर पहुँची. साधु बोला, माई खाने के साथ पोता भी दे दे. अब सुलभा ने रासबिहारी को बुला लिया. साधु को देखते ही रासबिहारी पहचान गए. उन्होंने अपने बेटे बहु को भी बुला लिया और चारों ने हाथ जोड़ कर साधु की झोली में अपने दिल के टुकड़े अरुण को डाल दिया. सारा परिवार कई दिन तक रोता रहा फिर समय की मलहम ने घाव को भर भी दिया और भुला भी दिया. रासबिहारी जी के यहाँ चार पौत्र हो चुके थे. एक ही दिन लंबे चौड़े सुखी जीवन के बाद रासबिहारी और सुलभा ने शरीर त्याग दिया.
उधर साधु अरुण को ले कर लखनऊ से हरिद्वार चला गया और वहाँ उसे सदाचर्य गुरुकुल में डाल दिया. जब अरुण पन्द्रह वर्ष का हो गया तो उसे पंथ में ले जाया गया. यह सम्पूर्ण ब्रह्मचारी गुरुकुल के सख्त अनुशासन में योग साधना और वेद पुराण के अध्ययन से बलिष्ठ शरीर और ज्ञानी मस्तिष्क के साथ एक बेहद तेजस्वी बटुक बन कर रुद्रप्रयाग के आश्रय में पहुंचा. पंथ में जाते ही उसको पंथ की सम्पूर्ण जानकारी दी गयी.
ऋषि रविनाथ और ऋषि रोहिताश्व ने अरुण को बताया कि स्वर्ग जाने का रास्ता सबसे पहले रावण ने ढूँढा था और वो किसी को भी स्वर्ग में सशरीर नहीं ले जा पाया. सत्यपंथ की स्थापना ऋषि सत्यव्रत ने 3217 ईसा पूर्व (4713 साल पहले) आज के पाठकों के लिए आज से 5229 साल
पहले) की थी. उन्होंने स्वर्ग में सशरीर जाने का रास्ता ढूँढ निकाला था. इन्द्र देवता के आदेश से वे स्वर्ग के द्वार के प्रहरी बन गए थे. जब भगवान कृष्ण ने पांडवों को स्वर्ग जाने की आज्ञा दी तो उन्होंने ऋषि सत्यव्रत से पांडवों को सारा मार्ग बताने को कहा पर युधिष्ठिर के अलावा सभी पांडव रास्ते में ही शरीर त्याग गए. भगवान कृष्ण तक इस मार्ग को नहीं पा सके.
4604 वर्ष पहले कलियुग के प्रारंभ में सत्यव्रत सशरीर स्वर्ग में प्रवेश पा गए. और उनके बाद विश्वनाथ जी सर्वोत्तम के पद पर पहुंचे और 4003 साल पहले उन्हें भी स्वर्ग में वास की आज्ञा मिल गयी. उनके बाद सर्वोत्तम बने ऋषि गौनाथ जिन्हें 3176 वर्ष पहले स्वर्ग में वास मिला. उनके बाद राजेश्वर, गोविन्द्नाथ, राघवेंदु, सरसनाथ, विशेश्वर आदि सर्वोत्तम बनते रहे और स्वर्ग में वास पाते रहे. सन 1253 में सर्वोत्तम सहस्त्रनाथ ने स्वर्गवास पाया था. और अब सर्वोत्तम के पद पर इन्द्रनाथ विराजमान हैं. जिनके बाद पहले स्तर पर श्रीनाथ और दूसरे स्तर पर रघुनाथ और तीसरे स्तर पर विशेषनाथ और चौथे स्तर पर कर्णराज और पांचवें स्तर पर रविनाथ और रोहिताश्व हैं. पंथ में प्रवेश के प्रारंभ में आप इक्कीसवें स्तर को पाते हैं और साधना से आप ऊंचे स्तर पर चढ़ते जाते हैं. साधना के दौरान आपको बहुत सी शक्तियां और विद्याएँ मिलती जातीं हैं. जब आप पहले स्तर पर पहुँच जाते हैं तब आप को स्वर्ग का मार्ग बता दिया जाता है. जब आप सर्वोत्तम बन जाते हैं तब सही क्षण में आपको स्वर्ग में प्रवेश दे दिया जाता है,
अरुण तुम्हारे लिए आज साधना पंथ का प्रारंभ हो रहा है. तुम्हारी आयु इस जन्म में दो सौ साल निश्चित की गयी है. आज की दीक्षा के बाद तुम साधना पंथ पर चलते चले जाओगे. आज तुम्हारा स्तर इक्कीसवां है.जहां भी मार्ग से भटक जाओगे वहाँ तुम्हे प्रायश्चित करना होगा, तभी साधना पथ पर वापस आ पाओगे. तुम्हारी सज़ा सर्वोत्तम निर्धारित करेंगे. अब तुम स्वर्ग के पथिक हो. स्वर्ग पाने के लिए ही तुम्हे मानव शरीर दिया गया है.
एक पीले रंग की धोती और तुलसी चन्दन की मालाएं अरुण को दे दी गयी और उसे साधना की दीक्षा दे कर बना दिया साधक. अरुण बहुत वर्षों तक तपस्या करता रहा और धीरे धीरे साधना स्तर पर ऊँचे चढ़ता गया. अरुण की आयु चौबीस वर्ष की थी तब उसे एक नया नाम मिला अश्वनाथ. यह नाम स्वयं रविनाथ ने दिया था. एक दिन एक और साधक अरुण के पास आ गया जिसका नाम अक्षय था और उसका नाम देवनाथ रखा गया था. अरुण और अक्षय में बहुत जल्दी मित्रता हो गयी. अक्षय अरुण से छोटा होने के नाते अरुण को भैया कह कर बुलाता था. अक्षय सोलहवें स्थान और अरुण पन्द्रहवें स्थान तक पहुँच गए थे कि अचानक ही अरुण अपना मार्ग खो बैठा. एक दिन अरुण ने एक युवती को देखा जिसका नाम मेखला था. मेखला और अरुण एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो गए और फिर दोनों वैवाहिक बंधन में बंध गए. अरुण ने रुद्रप्रयाग छोड़ दिया और चमोली में मेखला के परिवार के साथ रहने लगा. मेखला के पिता बेहद धनी व्यक्ति थे. अरुण अब दिन रात राग रंग में डूबा रहता. ब्रह्मचर्यं का अभ्यासी नारी देह के पीछे सत्यपंथ छोड़ काम की पगडण्डी पर इस तरह भाग निकला जानो यही मार्ग उसका ध्येय था. दस सालों तक अरुण रास्ता भटकता रहा. अक्षय एक दिन उसके घर के द्वार पर पहुंचा तो अरुण घर पर नहीं था. अक्षय ने अलख जगायी तो मेखला की माँ ने पूछा, आप क्या लेंगे. अक्षय ने कहा, शायद जो मै चाहता हूँ वो तुम दे ना सको. मेखला की माँ ने कहा साधु महाराज आप मांगिये मै देने का वचन देती हूँ. अक्षय ने उसी पल उसकी बेटी यानी मेखला के लिए संन्यास मांग लिया. जब मेखला को पता चला तो उसने अपनी माँ के वचन का मान रखने के लिए संन्यास ले लिया. अरुण को जब पता चला तो उसे अक्षय पर बहुत क्रोध आया और उसने अक्षय पर मारिणी शक्ति चला दी. रोहिताश्व ने मारिणी को रोक लिया और अक्षय को बचा लिया. अब रविनाथ और रोहिताश्व ने सम्मिलित शक्ति से निर्मला यक्षिणी को अरुण के भीतर उतार दिया. अरुण के मन का मैल और वासना समाप्त हो गए. अरुण वापस पंथ में लौट आया. उसे प्रायश्चित रूप में अपने जीवन के चालीस साल अलकनंदा को सौंपने पड़े. अरुण ने अगले तीस वर्ष दुरूहतम साधना की. अब अरुण ग्यारहवें स्तर तक पहुँच गया.
एक दिन अचानक अरुण को आदेश मिला की वो वृन्दावन पहुँच जाए. वहाँ स्वामी हरिदास नामक एक कृष्ण भक्त ने भक्ति रस की अनुपम गंगा बहा रखी है. अरुण बहुत लंबा रास्ता पार करके मथुरा अयोध्या आगरा आदि जगहों पर बहुत से भक्तों से मिला. अरुण ने अब बद्रीनाथ का प्रचार शुरू कर दिया. अरुण बादशाह अकबर से भी मिला. अकबर इस ज्ञानी साधु से बहुत प्रभावित हुआ और उसे हिंदू धर्म का ज्ञान देने के लिए अपना सलाहकार बना लिया . जब 1604 में अकबर की मृत्यु हुई तब अरुण वापस बद्रीनाथ की ओर चल पड़ा. बद्रीनाथ पहुँच कर अरुण ने वहाँ साधना पथ छोड़ दिया और भक्तिपथ पर चल पड़ा. अरुण बद्रीनारायण के भजन करता तो सारा जन समूह भक्ति सागर में गोते लगाने लगता. एक दिन अरुण का साक्षात्कार देव ऋषि नारद से हो गया. नारद ने अरुण को बताया कि उसने भक्ति ओर साधना दोनों में पारंगतता पा ली है. अब उसे अपना शरीर त्याग कर विष्णुलोक चले जाना चाहिए.
अरुण अपने सत्कर्मों का भोग करने के लिए 1639 में विष्णुलोक चला गया और वहाँ ग्यारह वर्ष बिता का वापस पृथ्वीलोक पर जन्म लेने आ गया. अक्षय पृथ्वी पर अरुण के जन्म की प्रतीक्षा कर रहा था
दूसरा जन्म (1650-1792)
अरुण का जीव एक नए शरीर की तलाश में घूम रहा था. उसकी सुदीर्घ तपस्या के फलस्वरूप उसे पुनः मानव शरीर मिलना तय था. अरुण को एक दिन एक युवती दिखाई दी. जिसमे बत्तीस के बत्तीस गुण थे. उस युवती का नाम शुभा था. सच में ही बेहद पवित्र व् धर्मात्मा थी वो.बिलकुल ऐसे ही स्वभाव का युवक सोहन उसका पति था, अरुण ने उस युवती के गर्भ में प्रवेश पा लिया और 14 अप्रैल 1650 को पुत्र रूप में जन्म लिया. उसका फिर से नाम अरुण ही रखा गया. अरुण के पिछले जन्म की साधना और भक्ति व् घर में भक्ति का माहौल ने अरुण को फिर से भक्ति पथ पर डाल दिया. चौदह साल की आयु में अरुण का विवाह सुमंगला नामक लड़की से हो गया. सुमंगला से विवाह के पश्चात बीस वरस की आयु में अरुण के यहाँ पुत्र ने जनम लिया जिसका नाम हेमवंत रखा गया. हेमवंत बेहद बीमार रहता था. एक दिन एक साधु की प्रशंसा सुन कर अरुण अपने पुत्र को उस साधु का आशीर्वाद दिलवाने चला गया. वो साधु कोई और नहीं अक्षय ही था. अक्षय के आशीर्वाद देने से बालक ठीक होने लगा. अब अक्षय को अरुण बहुत मानने लगा था. पर अरुण की समझ में एक बात नहीं आती थी कि साधु देवनाथ(अक्षय) उसे पाँव क्यूँ नहीं छूने देता. अरुण के माता पिता भी इस साधु के भक्त हो गए थे. अरुण के पिता की मृत्यु के बाद अरुण की माता शुभा ने संसार त्याग कर संन्यास ले लिया और अक्षय ने उन्हें श्रीनगर नामक शहर के आश्रय का प्रबंधन सौंप दिया. माता शुभा को सब लोग माँ जी कहने लगे. देवनाथ ने खुद भी माँ जी का पुत्रत्व ले लिया.
अक्षय की प्रेरणा से 1709 में अरुण ने संन्यास ले लिया और साधना पथ पर बढ़ चला. अक्षय के साथ अरुण ने तपस्या शुरू की. देवनाथ अरुण को लेकर सतोपंथ चला गया. और वहाँ दोनों ने तपस्या शुरू कर दी. अक्षय ने अरुण को उसके पिछले जन्म का दर्शन करवा दिया. अरुण ने ठान लिया की वो अब अपनी यात्रा पूरी कर लेगा और स्वर्ग में सशरीर प्रवेश पायेगा.
अरुण ने बीस वर्षों की साधना से दसवां स्तर पा लिया.
एक दिन ऋषि रविनाथ और ऋषि रोहिताश्व ने अरुण और अक्षय को पंथ सञ्चालन का कार्य सौंप दिया और अब अरुण और अक्षय सभी आश्रयों में घूमने लगे और पथभ्रष्ट साधकों को फिर से पंथ में लाने के काम में लग गए. इसी दौरान एक दिन अरुण को एक साधक मिला जो पथभ्रष्ट हो कर संसार में कई जन्म ले चुका था. उसे अरुण ने वापस पंथ के पथ पर डाल दिया. इस साधक का नाम विशेष था. यह साधक बेहद उच्च स्तर की साधना करता था. विशेष बहुत शीघ्रता से साधना पथ पर आगे बढ़ने लगा. एक दिन इन्द्रनाथ ने स्वर्ग में प्रवेश पा लिया और उसके तीन ही साल के बाद श्रीनाथ ने भी स्वर्ग पा लिया. सर्वोत्तम के पद पर अब रघुनाथ आसीन हुए.
रघुनाथ बेहद गंभीर और अनुशासित ऋषि थे. उन्होंने विशेष को अरुण का पुत्र घोषित कर दिया. अब अरुण की आयु पिच्चानवे वर्ष की हो चली थी. नियमित साधना व् सुदीर्घ उपवास से उसका शरीर सिर्फ हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था. अक्षय ने 1748 में शरीर त्याग दिया और उसके बाद विशेष ने 1754 में शरीर त्याग दिया. अरुण एकदम अकेला रह गया था. अब अरुण शरीर के अशक्त होने के कारण शरीर त्यागने के लिए तत्पर हो गया. उसने संत राह नामक व्रत लेने की इच्छा सर्वोत्तम के सामने रखी, इस व्रत में योगी जीर्ण शरीर को त्यागने के लिए भोजन जल सबका सम्पूर्ण त्याग कर देते हैं. पर सर्वोत्तम ने बताया कि अभी उसे अडतीस साल और जीना है. अरुण ठीक अडतीस साल के बाद 7 मार्च 1792 को शरीर त्याग कर अंतरिक्ष में अक्षय के जीव से मिला. दोनों भाई अपने प्रतीक्षा काल को पूरा करके पृथ्वी पर जब्बलगढ़ में जन्म लेने पहुँच गए.
पांचवें जन्म में वापस
21 नवंबर 2008
अब अपने और अक्षय के सारे जन्म समक्ष देखकर अरुण के मन में सवाल उठने लगे. रोहिताश्व उन दोनों को गुफा के भीतर ले गया. वहाँ रविनाथ और रोहिताश्व बड़े स्नेह से मिले. दोनों एक चोकोर पत्थर पर बैठ गए. और अरुण के सवालों का जवाब देना शुरू कर दिया
अरुण:- डेढ़ सौ दो सौ साल की आयु मुझे कैसे मिली.
रविनाथ;- नियमित जीवन जीने और ध्यान साधना से जीवन कितना भी लंबा किया जा सकता है
अरुण;- आपकी आयु कितनी है.
रविनाथ:- मेरी आयु तीन सौ वर्ष के लगभग है और रोहिताश्व की आयु तैतालीस वर्ष है. रोहिताश्व हर अस्सी साल में शरीर बदल लेते हैं और मुझे इस शरीर को त्यागने की आज्ञा आज तक नहीं मिली थी.
अरुण:- तो क्या अब आपको आज्ञा मिल गयी है
रविनाथ:- हाँ अब मेरा शरीर बिंदु रूप हो कर रोहिताश्व के शरीर में समा जाएगा. और हमारा सम्मिलित नाम तुलसीनाथ हो जाएगा.
अरुण:- क्या पहले भी कोई इस तरह दो आत्मा शरीर समा कर एक हुए हैं.
रविनाथ- हाँ विशेष तुम्हारे शरीर में समा गया था.
अरुण – क्या मेरे दूसरे जन्म की माँ ही माँजी हैं.
रविनाथ –हाँ मेरे बाद पंथ में सबसे बड़ी उम्र की वहीँ हैं.
अरुण – उनकी इतनी लंबी आयु की वजह
रविनाथ – तुम्हारे प्रति स्नेह तुम्हारा स्वर्गारोहण देखने के लिए उन्होंने अपने स्तर वहीँ पर रोक लिए हैं, और आयु भी,
अरुण – उनकी तपस्य पूरी कब होगी
रविनाथ- जिस दिन तुम सर्वोत्तम बनोगे उस दिन शुभा और जीतेंद्र तुम्हारे शरीर में समा जायेंगे. तुम दूसरे जन्म में शुभा के शरीर से और चौथे जन्म में जीतेंद्र के शरीर से उत्पन्न हुए हो. माता पिता का क़र्ज़ तुम ऐसे चुकाओगे.
अरुण- अक्षय का स्वर्गारोहण कब होगा
रविनाथ- तुम्हारे बाद
अरुण- पर वो तो मुझ से ज्यादा बड़ा योगी है मै तो भटक भी गया हूँ हर जन्म में पर ये तो कभी भटका भी नहीं
रविनाथ- इसमें एक कमी है ये तुमसे जुड़ा रहता है. इसलिय ये अभी पीछे रहता है.
अरुण- मेरी यात्रा कब तक चलेगी
रविनाथ- मै नहीं जानता
अरुण- किस कमी से मै हर बार भटक जाता हूँ.
रविनाथ- तुम बहुत जल्दी ऊब जाते हो.
अरुण- किस साधना से मेरा मन एकाग्र होगा
रविनाथ- त्राटक से
अरुण- त्राटक की विद्या मुझे देने की कृपा करे
रविनाथ- त्राटक के लिए रोहिताश्व तुम्हे दीक्षा देंगे.
अरुण- अब सर्वोत्तम कौन है.
रविनाथ- विशेषनाथ अब हमारे सर्वोत्तम हैं
अरुण- क्या मै आपका रोहिताश्व जी के शरीर में विलय देख सकता हूँ.
रविनाथ- हाँ तुम और अक्षय ही इसके साक्षी बनोगे.
अरुण- सबसे बड़े इश्वर कौन हैं.
रविनाथ- विष्णु विष्णु के शरीर से निकले स्वेद( पसीने) से रूद्र शिव् प्रकट हुए. ब्रह्मा भी विशु के शरीर से निकले कमल पर प्रकट हुए थे.
अरुण- मै विष्णुलोक से वापस क्यूँ आया.
रविनाथ- तुम अपनी साधना के फल के अनुसार ही वहाँ रुक पाए. अगर तुम्हारी साधना सम्पूर्ण हो जाती तो तुम विष्णु लोक के स्थायी निवासी बन जाते.
अरुण-
अति मनोहारी।साधुवाद
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