Friday, April 13, 2012

part 3

चलिए कहानी आगे बढ़ाते हैं.

असीम और अरुण का मिलना
10 सितम्बर 2011
सितम्बर के महीने में असीमनाथ(असीम) गणपति साधना करते थे और उन दिनों अक्सर ही उनपर शक्तिपात होता था. अक्षय यह बात जानता था. और अक्षय और असीम दोनों जब भी देवविग्रह के सामने एक साथ आते थे शक्ति अवश्य निकलती थी. ना जाने दोनों के कौन से गुण मिल कर देवों को इनपर कृपा करने को मजबूर कर देते थे. दिल्ली से वापस जाते हुए अक्षय ने असीम से मिलने का कार्यक्रम बनाया.  उत्तम की आज्ञा मिलते ही दोनों असीम की तपस्थली पर पहुँच गए. असीम इन दोनों को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ. असीम से मिल कर अरुण को ऐसा लगा कि वो असीम से पहले मिल चुका है. और असीम को बहुत अच्छे से जानता है. असीम ने दोनों के माथे चूम कर स्वागत किया. असीम ने जैसे ही अरुण के माथे पर होंठ रखे. अरुण एक दम पहचान गया. असीम रोहिताश्व के ही कई जन्म पहले के भाई थे. और दोनों भाई अलग अलग मार्ग से चलते हुए मोक्ष की ओर बढ़ रहे थे. असीम ने अरुण अक्षय के साथ रात को उच्छिष्ट गणपति साधना की. और अरुण व् अक्षय अदृश्य रूप में असीम के साथ गणपति पूजा समापन तक साथ रहे.

अरुण ने असीम से पूछा, भद्र आप हमारे पंथ के अनुसार किस स्तर तक पहुँच गए हैं. असीम ने हँसते हुए कहा कि स्तर तो उसे पता नहीं पर उसे इतना पता है कि गणेश लोक जिसे स्वानंद लोक भी कहते हैं के दरवाजे तो खुल चुकें हैं पर वहाँ पर स्थायी निवास में अभी समय और साधना बाकी हैं. इसपर अरुण ने पूछा कि क्या आप सशरीर स्वर्ग जाने के इच्छुक नहीं हैं. असीम ने कहा नहीं, मुझे अपना यह शरीर त्यागना ही है. मेरा सोचना है कि जब राम ओर कृष्ण तक ने शरीर त्याग दिए थे तो मै इस शरीर को क्यूँ ढोऊ. शरीर से लगाव मुझे नहीं है. मै शरीर को मृत्यु तक चलाना चाहता हूँ. बस इतनी ही कामना है कि मृत्यु पर शरीर त्याग कर परम गणाधिप में मेरा विलय हो जाए. अरुण ने पूछा कि आपका निजी जीवन आपके दैविक जीवन में परेशानी तो नहीं करता. असीम ने कहा नहीं मेरा सब कुछ इष्ट के निमित और उनकी कृपा प्रसाद है. इसी भावना से मै अपने दोनों जीवन में एक संतुलन बनाये रखता हूँ. मेरे गुरु ने मुझे राजर्षि बनने की अनुमति दी. अब मै संसारी भी हूँ सन्यासी भी.

अरुण ने सर्वोत्तम की आज्ञा ले कर असीम का भ्रातृत्व ले लिया और अक्षय ने असीम का पुत्रत्व ले लिया. अब अरुण असीम का छोटा भाई और अक्षय असीम का पुत्र हो गए. असीम ने दोनों को आशीष रूप में अपने देवकर्म दे दिए. अक्षय ने ज्ञानिनी विद्या और अरुण ने दिव्य अवलोकन विद्या असीम को अर्पित कर दी और तब तीनो ने स्वानंद लोक के दर्शन सर्वोत्तम की कृपा से किये. सर्वोत्तम तुलसीनाथ का एक भाग रोहिताश्व असीम के पूर्व जन्मो का भाई था. पूर्वजन्मो की  स्नेह स्मृति दोनों में बनी हुई थी. पर तत्व ज्ञान पाने से दोनों इस बात से ऊपर उठ चुके थे.   

एक महीने तक असीम,अरुण और अक्षय की सम्मिलित साधना चली. और इस दौरान बहुत से पथ इन तीनो ने पार कर लिए और फिर दीवाली के अवसर पर अरुण और अक्षय को वापस वाता बुला लिया गया.25 अक्टूबर 2011, को दीवाली के दिन अरुण और अक्षय विदा ले कर वापस वाता चले गए. और असीम अपने तप में लीन हो गए. जाते जाते अरुण और अक्षय ने पृथ्वी वास तक संपर्क में रहने का वादा किया. असीम सब जानते थे कि तीनो का पृथ्वी वास कितना कितना था. पर सर्वोत्तम ने यह भेद अपने साधकों के लिए अलभ्य बना रखा था. 

     
वाता जा कर अरुण अक्षय फिर से पंथ सेवा और साधना में लग गए. नवंबर महीने के शुरू  में अरुण अक्षय फिर से सतोपंथ स्थित अपनी साधना स्थली में पहुँच गए. इस वर्ष के शीतवास के लिए अरुण और अक्षय ने गुफा के द्वार पर पत्थर आदि लगा कर आस पास का सारा हिस्सा साफ़ करके अपनी साधना स्थली में कुछ बदलाव आदि ले आये. एक दिन शाम को जब अरुण सतोपंथ के पास अपने साधनास्थल के पास घूम रहे थे कि अरुण ने एक ज़ोरदार चीख सुनी. किसी मानव का ह्रदय विदारक क्रंदन सुन कर अरुण उस ओर लपके. एक इंसान के ऊपर एक तेंदुए ने हमला किया हुआ था. और तेंदुआ उसकी गर्दन दबोचने के चक्कर में था पर वो इंसान पूरी मेहनत के साथ तेंदुए से भिड़ा हुआ था. अरुण चीखते ही और पत्थर फेंकते हुए उस ओर झपटे. अब तेंदुआ भाग निकला. अरुण ने जा कर देखा एक पन्द्रह सोलह साल का दुबला पतला लड़का था. काफी चौटें खाए हुए वो लड़का कराह रहा था. काफी खून भी बह रह था.
अरुण ने उस लड़के को उठाया और गुफा में ले आया. गुफा में लाकर अरुण ने देखा कि उसके कई घाव गहरे थे.

अरुण को लड़के का शरीर एकदम ठंडा सा लगा. अरुण ने अक्षय को याद किया अक्षय तुरंत वहाँ हाज़िर हो गया, अब दोनों मिल कर उस लड़के की सेवा में लग गए. लड़के का एकदम ठंडा पड़ा हुआ शरीर देख कर उन्हें लगा कि शायद खून ज्यादा बह जाने के कारण ऐसा हो रहा था. उस लड़के को अपने शरीरों के बीच लेकर दोनों योगी दाहन विद्या से शरीर को गर्म करने लगे. जैसे जैसे लड़के के शरीर में गर्मी आती गयी लड़का होंश में आने लगा. उसके होंश में आते ही दोनों साधक उसके घाव साफ़ करके एक जड़ी का लेप करने लगे. लड़का अभी भी कराह रहा था. अक्षय गुफा से बाहर गया और कहीं से एक बर्तन में दूध ले आया.

लड़का दूध पीने के बाद काफी ठीक लग रहा था. अब अरुण ने एक अन्य जड़ी निकाली और उस लड़के को मुह में रखने को दे दी. वह जड़ी मुहँ में रखते ही लड़का तेज़ी से ठीक होने लगा. अब अरुण ने लड़के से पूछा कि वो कौन है तब लड़के ने कहा कि उसका नाम आलोक था और वो सतोपंथ घूमने आया था और अपने दल से अलग हो गया था. तीन दिन से वो यहाँ भटक रहा था और आज अचानक तेंदुए ने हमला कर दिया. और उसके बाद इन दोनों को वो मिल गया था. अरुण को उस लड़के की बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा था. क्यूंकि इस मौसम में यहाँ कोई घूमने नहीं आता था. और कोई भी तीन दिन तक इन सूने पहाड़ों में खोया नहीं रह सकता था. अक्षय  अरुण के मन के भाव जान गया था, अरुण अपनी दिव्य शक्तियों का इस्तेमाल बहुत कम करता था, पर अक्षय ने तुरंत पारिची विद्या को जागृत कर दिया, पारिची  सामने वाले का परिचय तुरंत दे देती है.
पारिची यक्षिणी प्रकट हुई और सिर्फ अक्षय को दिखाई दी. पारिची ने अक्षय को कहा कि ये लड़का कोई साधारण मानव नहीं है और उसे सिर्फ इतना ही बताने की आज्ञा है. और अब अक्षय भी इस बात को भूल जाएगा. यक्षराज कुबेर का यही आदेश है. पारिची अक्षय के मस्तिष्क से उस लड़के का परिचय मिटा कर गायब हो गयी.
अब दोनों मित्र उस लड़के को सुला कर सो गए. अगले दिन सुबह 21 नवंबर का दिन और सुबह उत्पत्ति एकादशी और सोमवार का सुबह योग, दोनों साधक सतोपंथ में स्नान करने के लिए जाने लगे तो वो लड़का बोला अगर आप दोनों चले जाओगे तो मुझे अकेले डर लगेगा. एक तो मेरे पास ठहर जाओ. अरुण ने लड़के को कहा कि वो उसे साथ ले जायेंगे. लड़का बोला मै तो काफी कमजोरी महसूस कर रहा हूँ चलूँगा कैसे. अरुण ने उस लड़के को गोद में उठा लिया और सतोपंथ की और चल पड़े.

सतोपंथ पहुँच कर अक्षय और अरुण ने लड़के को किनारे पर एक जगह बैठा दिया और खुद किनारे पर बैठ कर वंदन आराधन आदि करने लगे. दोनों साधक नग्न रहते थे कपडे आदि तो निकलने की आवश्यकता थी नहीं. अब दोनों जल में प्रवेश करने लगे. पानी की शीतलता तो लगता था कि बर्फ से भी अधिक थी, शरीर का जितना हिस्सा पानी के भीतर जाता जा रहा था सुन्न होता जा रहा था. पर मोक्षमार्गी इन साधकों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.
जल के भीतर पहुँच कर दोनों ने स्नान किया, बद्रीनारायण का स्मरण करते रहे और जल में खड़े होकर सूर्य को जलअर्पण किया. सभी देवताओं दिशाओं को तर्पण दिया. और जब बाहर निकले तो देखा पूर्व की और मुख करके तीन साधक बैठे थे. एक पीताम्बर, एक श्वेताम्बर और एक बाघ का चमड़ा पहने था. महाज्ञानी जानकार तीनो को इन दोनों ने वंदन किया पर तीनो साधक ध्यान मग्न रहे.अब अरुण अक्षय उस लड़के के पास आ गए. कल रात को हुई तेंदुए के साथ मुठभेड़ से उस लड़के के सारे शरीर पर मिटटी और खून सूख चुके थे. सारे बाल भी मिटटी में लथपथ थे. अरुण और अक्षय ने उस लड़के के सारे कपडे निकाले और उसे उठा कर स्नान करवाने के लिए सतोपंथ ताल में ले आये लड़का चिल्लाने लगा मुझे ठंड लग जायेगी, मै मर जाऊँगा. पर अरुण और अक्षय ने एक नहीं सुनी और उसे सतोपंथ में स्नान करवाने लगे. जल में जाते ही वो लड़का एकदम इनके हाथ से फिसल कर जल में तैरता हुआ चला गया. उस लड़के का तैरना बहुत ही अजीब सा था. वो हाथ पाँव चला कर नहीं तैर रहा था बल्कि किसी मछली के तरह पानी में फिसलता सा जा रहा था. मैल समाप्त कर निर्मल बनाना तो जल का काम है. पर सतोपंथ का जल तो मन को भी निर्मल बना देता है. उस लड़के के शरीर और बालों में भरी हुई मिटटी घावों पर सूखा खून सब साफ़ हो गया. और एक नवजात शिशु जैसी सफेद साफ़ कोमल देह के साथ वो लड़का बाहर निकला तो थर थर कांप रहा था. अरुण ने उसके छाती पर दाहन का स्पर्श किया तो उसके शरीर पर लगा सारा पानी सूख चुका था और उसके शरीर में गर्मी भी आ गयी थी. अक्षय ने आवरनी विद्या से उसे नए वस्त्र पहना दिए. पर उसने तुरंत सब वस्त्र निकाल फेंके और अरुण अक्षय की तरह दिगंबर हो गया, बोला अब मै आप लोगों के साथ ही रहूँगा और आप ही की तरह रहूँगा.
अरुण अक्षय कुछ कह नहीं पाए. अब वे तीनो वापस गुफा की ओर चले तो अरुण ने देखा कि उस लड़के आलोक के घाव काफी हद तक ठीक हो गए थे. अरुण समझ गया कि यह सब उस चमत्कारी बूटी का कमाल है जो रविनाथ ने उसे बताई थी और अरुण ने कल रात इसको चूसने के लिए दी थी. अरुण और अक्षय जब वापस गुफा में पहुंचे तो अरुण ने कहा आलोक पुत्र  तुम हमारे साथ यहाँ नहीं रह पाओगे. यहाँ बहुत ज्यादा बर्फ पड़ती है और हम लोग चार महीने उपवास करते हैं. यहाँ खाने के लिए कुछ उपलब्ध नहीं होता. बेहद ठंड होती है ऐसे तुम यहाँ कैसे रह पाओगे. आलोक बोला, आप लोग चाहें तो मेरे लिए खाने का सामान यहीं प्रकट कर सकते हैं और रही बात ठंड की तो जैसे आज आप लोगों ने मेरी ठंड दूर की थी वैसे ही आगे भी कर सकते हैं. मुझे यहाँ से भगाने की कोशिश नहीं करो, मै यहीं रहना चाहता हूँ, अरुण ने कहा तुम्हारे माता पिता तुम्हे ढूँढ रहे होंगे, इसपर लड़का बोला कि उसका कोई नहीं है और वो तो एक अनाथाश्रम में पला बढ़ा है. उसकी प्रतीक्षा किसी को नहीं है.अरुण और अक्षय कुछ कह नहीं पाए.और कुछ कहने को था भी नहीं.

दोनों मित्रों ने खाने का सामान प्रकट किया और साधना में डूब गए. उनकी सेवा में आलोक समय बिताने लगा. फिर छः दिसंबर को वैकुण्ठ एकादशी के दिन तीनो सतोपंथ फिर चले गए, और वहाँ स्नान किया, बाहर आकर उन्हें वही तीनो श्वेताम्बर, पीताम्बर और बाघम्बर साधक फिर मिले. तीनो ने उन तीनो दिव्य साधकों की आराधना वंदना की. इस बार तीनो साधकों ने मुस्करा कर वंदना स्वीकार की.


 जब ये तीनो वापस गुफा में पहुंचे तो ना जाने क्यूँ अरुण और अक्षय बहुत प्रसन्न थे. उन दिव्य साधकों के दर्शन का असर था शायद. अब अरुण और अक्षय धयान में गए तो उनका ध्यान फरवरी में खुला. ध्यान खुलते ही उन्होंने आलोक को ध्यान में बैठे पाया. आलोक का शरीर भी उनकी तरह ही सूख गया था. खाने का ज्यादातर सामान ऐसे ही पड़ा हुआ था. साफ़ दिखाई दे रहा था कि आलोक ने ज्यादातर सामान छुआ ही नहीं था. उनके ध्याम खुलने के थोड़ी देर बाद ही आलोक का भी ध्यान खुल गया. अरुण ने पूछा कि आलोक को ध्यान लगाना कैसे आ गया और वो कितने दिन से ध्यान में डूबा हुआ है. आलोक ने कहा कि उसे कुछ नहीं पता कि उसे क्या हुआ था. अरुण और अक्षय ने समय चक्र देखा तो पता चला कि कल सत्रह फ़रवरी है और विजया एकादशी का पावन दिन है.

सतोपंथ में स्नान करने से ज्यादा तो उन तीनो साधकों के दर्शन की उत्कंठा मन में लिए अरुण और अक्षय, आलोक के साथ सतोपंथ में पहुंचे. चरों तरफ बर्फ का साम्राज्य था. जैसे ही स्नान तर्पण आदि से निवृत हो कर उन्होंने देखा तो तीनो साधक वहीँ बैठे थे. अरुण और अक्षय उनके पास पहुंचे और वंदना की. तीनो साधकों ने इस बार हाथ उठा कर इन्हें आशीर्वाद दिया. तभी आलोक बोल पड़ा, ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तसे नमो नमः. बस यही पल था जब अरुण अक्षय समझ गए कि सामने त्रिदेव हैं. और त्रिदेव अन्तर्ध्यान हो गए. अब अरुण ने आलोक से पुछा, सच बताओ तुम कौन हो






आलोक का रहस्य (17 फरवरी 2012)

आलोक कहने लगा, आप लोग मेरा रहस्य कभी नहीं जान पाते अगर आज मैंने आप लोगों को त्रिदेव साक्षात्कार के समय नहीं चेताया होता. मै भी क्या करता इतनी बार देव दर्शन करने के बाद भी आप दोनों पहचान नहीं पाए थे. अब मुझे लगा कि इनकी सहायता कर ही दी जाए. मेरा नाम दंषक है, मै एक सर्प हूँ. मानव रूप धरने की विद्या जानता हूँ. जिस रात मै अरुण को मिला था उस रात मै मानव रूप में घूम रहा था और तभी तेंदुए ने मुझ पर हमला बोल दिया. अचानक हुए इस हमले में मेरी मणि कहीं गिर गयी. और मणि के बिना मै अब ना तो रूप बदल सकता था और ना ही अपने घावों को ठीक कर सकता था.

जब अरुण मुझे उठा कर लाये तो उन्हें मेरा शरीर बहुत ठंडा लगा था. हम सर्प जाति के प्राणियों का शरीर का तापमान जब कम हो जाता है तो हम चल फिर नहीं पाते, जब शरीर का तापमान बढ़ता है तब हम क्रियाशील हो जाते हैं. यहाँ के ठन्डे वातावरण में मै बहुत कमज़ोर हो गया था. जब आप दोनों ने अपने शरीर से मुझे ताप दिया तो मै ठीक हो गया था. जब मै सतोपंथ के पानी में पहुंचा तो सर्प की तरह ही पानी में तैरने लगा. अचानक मुझे ध्यान आया कि आप लोग मुझे देख रहें हैं तो मै पानी से बाहर आ गया. मेरी मणि जब मुझे मिल जायेगी तो मै वापस अपने लोक में जा सकूंगा. अब बर्फ पिघलने लगेगी और मै अपनी मणि ढूँढ लूँगा.

आलोक अरुण और अक्षय के साथ उस जगह पहुंचा जहाँ उसकी तेंदुए से मुठभेड़ हुई थी. बहुत तलाश किया पर मणि नहीं मिली. अचानक ही आलोक को याद आया और वो बोला कि उन्हें सूर्यास्त की प्रतीक्षा करनी चाहिए. सूर्यास्त के समय आलोक ने एक अजीब सी फुफकार के साथ एक मन्त्र जप किया तो बर्फ और पत्थरों के बीच एक जगह से प्रकाश फूटने लगा. वहाँ पर बर्फ और पत्थर हटाये तो एक बेहद चमकती हुई मणि पड़ी थी. आलोक ने उसे उठाया और तुरंत ही दंषक नाग के रूप में आ गया. अब वो वापस मानव रूप में आया और अरुण और अक्षय की सहायता के लिए उनका धन्यवाद किया. अलोक बोला  अक्षय ने जब पारिची से मेरा परिचय माँगा तो वो बेचारी क्या बोलती, मै यक्षराज कुबेर का मित्र हूँ. और मेरे कहने पर ही यक्षराज ने यक्षिणी को यह आदेश दिया था कि वो आप लोगो को कुछ ना बताये. अब आप लोग वापस वाता चले जाओगे.मै अपने स्मृति चिन्ह के रूप में आप दोनों को यह मणि देता हूँ, मेरी मणि के समान यह मणि दिव्य है. आप इस मणि से जो भी चाहेंगे वो यह मणि आपको दे देगी. यह कहते हुए आलोक ने एक मणि अरुण को दे दी. अरुण बोला, हे दंषक आलोक  हम लोगों के लिए यह मणि निरर्थक है. आपकी स्मृति तो हमारे ह्रदय में सदा रहेगी. यह कह कर अरुण ने मणि लौटा दी. अरुण के मणि लौटाते ही एक तीव्र प्रकाश वहाँ हो गया और सामने सर्वोत्तम खड़े थे. सर्वोत्तम ने अरुण और अक्षय से कहा, आज तुम दोनों अपनी परीक्षा में सफल हो गए हो. अब तुम दोनों का स्तर बढ़ कर दो हो गया है. अक्षय और अरुण सर्वोत्तम के चरणों में झुक गए. सर्वोत्तम उन्हें आशीष दे कर अन्तर्ध्यान हो गए. अब दंषक आलोक ने अरुण और अक्षय से उनके साथ रहने की आज्ञा मांगी, अरुण ने जब आलोक से इसकी वजह पूछी तो आलोक ने बताया कि वो अरुण और अक्षय के गण रूप में उनकी सेवा करना चाहता है, इसपर अक्षय ने हाथ जोड़ कर कहा, हे नाग हम योगी हैं हमे सेवकों गणों की आवशयकता नहीं है. हम राही हैं, स्वर्ग के राही, कृपया हमे आशीर्वाद दीजिए कि हम अपने इस राह की मंजिल पा सकें. आपके कष्ट काल में हम आपके काम आये, यह हमारा सौभाग्य है. आप इसे अहसान या बोझ ना समझे. आप ही की कृपा से हम त्रिदेव के दर्शन करने में सफल हुए.

दंषक आलोक ने  कहा मै तुम्हारे त्याग से बेहद प्रसन्न हूँ, देव दर्शन कभी खाली नहीं जाता, तुम मुझसे मिले इसका कोई ना कोई फल तो मै तुम्हे दे कर ही जाऊँगा, मै  तुम्हे बेहद गुप्त ज्ञान  देवताओं की श्रेणियाँ बता देता हूँ. यह देवताओं के अलावा बहुत ही कम मानव जानते हैं. देवताओं की कुल नौ श्रेणी है.
 सबसे बड़ी श्रेणी में महामाया हैं
 उनके बाद त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु,महेश हैं,
 तीसरी श्रेणी में गणेश, इंद्र,पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती आदि आते हैं
चौथी श्रेणी में वायु अग्नि वरुण पृथ्वी आदि प्राकृतिक देवता आते हैं
पाँचवी श्रेणी में गरुड़, कुबेर, नंदी, सप्तऋषि, नारद, यम, वासुकी, शेषनाग आदि देवता आते हैं
छठी श्रेणी में देवताओं के सेवक यक्ष गन्धर्व किन्नर आतें हैं यहाँ तक के देव देवलोकों में निवास करते हैं
सातवीं श्रेणी मे हम जैसे देवलोक और पृथ्वीलोक पर विचरने वाले देव आते हैं जो विभिन्न त्रिदेवों के लोक में सेवक का काम करते हैं.
आठवीं श्रेणी में भूत, प्रेत, स्थानदेव, गृहदेव आदि निम्न कोटि के देव आते हैं जो केवल पृथ्वी पर ही रह सकते हैं जो देवलोक केवल मुक्ति के पश्चात ही जा पाते हैं.
नौंवी श्रेणी में वो योगी ऋषि महात्मा आते हैं जिनका देवलोक गमन निश्चित होता है.
अरुण और अक्षय  तुम दोनों भी अब नौवें स्तर के देव बन चुके हो और तुम्हारा साधना मार्ग तुम्हे सीधे महामाया में विलीन कर देगा इसलिए तुम्हारी साधना से तुम नौवीं कोटि से सीधे पहली कोटि में कूद जाओगे.
यह है देवलोक का रहस्य.
अरुण में बेहद विनीत भाव से पूछा, हे देव यह तो बताइए कि पृथ्वी पर विचरते देवों को कैसे पहचाना जा सकता है. इसपर दंषक आलोक बोले  अरुण और अक्षय  आप दोनों को इसकी क्या आवश्यकता है. आप तो स्वयं देव कोटि में पहुँच गएँ हैं, इसपर अक्षय बोले, कृपया करके आप हमे बता दीजिए.

अब आलोक दंषक बोले, हे योगी जोड़ी  मै वह सबसे आसान तरीका बता देता हूँ जिससे आप देवों को पहचान सकते हैं, देवो के सिर के ऊपर एक दम बालों के साथ के एक अंगुल की मोटाई में हवा आपको विरल दिखाई देगी. ऐसा महसूस होगा जैसे सर से गर्मी निकल रही है.

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