Sunday, April 22, 2012

part 4


अब कहानी का और अगला भाग 
असीम  और अरुण का मिलना
10 सितम्बर 2011
सितम्बर के महीने में असीमनाथ(असीम) गणपति साधना करते थे और उन दिनों अक्सर ही उनपर शक्तिपात होता था. अक्षय यह बात जानता था. और अक्षय और असीम दोनों जब भी देवविग्रह के सामने एक साथ आते थे शक्ति अवश्य निकलती थी. ना जाने दोनों के कौन से गुण मिल कर देवों को इनपर कृपा करने को मजबूर कर देते थे. दिल्ली से वापस जाते हुए अक्षय ने असीम से मिलने का कार्यक्रम बनाया.  उत्तम की आज्ञा मिलते ही दोनों असीम की तपस्थली पर पहुँच गए. असीम इन दोनों को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ. असीम से मिल कर अरुण को ऐसा लगा कि वो असीम से पहले मिल चुका है. और असीम को बहुत अच्छे से जानता है. असीम ने दोनों के माथे चूम कर स्वागत किया. असीम ने जैसे ही अरुण के माथे पर होंठ रखे. अरुण एक दम पहचान गया. असीम रोहिताश्व के ही कई जन्म पहले के भाई थे. और दोनों भाई अलग अलग मार्ग से चलते हुए मोक्ष की ओर बढ़ रहे थे. असीम ने अरुण अक्षय के साथ रात को उच्छिष्ट गणपति साधना की. और अरुण व् अक्षय अदृश्य रूप में असीम के साथ गणपति पूजा समापन तक साथ रहे.

अरुण ने असीम से पूछा, भद्र आप हमारे पंथ के अनुसार किस स्तर तक पहुँच गए हैं. असीम ने हँसते हुए कहा कि स्तर तो उसे पता नहीं पर उसे इतना पता है कि गणेश लोक जिसे स्वानंद लोक भी कहते हैं के दरवाजे तो खुल चुकें हैं पर वहाँ पर स्थायी निवास में अभी समय और साधना बाकी हैं. इसपर अरुण ने पूछा कि क्या आप सशरीर स्वर्ग जाने के इच्छुक नहीं हैं. असीम ने कहा नहीं, मुझे अपना यह शरीर त्यागना ही है. मेरा सोचना है कि जब राम ओर कृष्ण तक ने शरीर त्याग दिए थे तो मै इस शरीर को क्यूँ ढोऊ. शरीर से लगाव मुझे नहीं है. मै शरीर को मृत्यु तक चलाना चाहता हूँ. बस इतनी ही कामना है कि मृत्यु पर शरीर त्याग कर परम गणाधिप में मेरा विलय हो जाए. अरुण ने पूछा कि आपका निजी जीवन आपके दैविक जीवन में परेशानी तो नहीं करता. असीम ने कहा नहीं मेरा सब कुछ इष्ट के निमित और उनकी कृपा प्रसाद है. इसी भावना से मै अपने दोनों जीवन में एक संतुलन बनाये रखता हूँ. मेरे गुरु ने मुझे राजर्षि बनने की अनुमति दी. अब मै संसारी भी हूँ सन्यासी भी.

अरुण ने सर्वोत्तम की आज्ञा ले कर असीम का भ्रातृत्व ले लिया और अक्षय ने असीम का पुत्रत्व ले लिया. अब अरुण असीम का छोटा भाई और अक्षय असीम का पुत्र हो गए. असीम ने दोनों को आशीष रूप में अपने देवकर्म दे दिए. अक्षय ने ज्ञानिनी विद्या और अरुण ने दिव्य अवलोकन विद्या असीम को अर्पित कर दी और तब तीनो ने स्वानंद लोक के दर्शन सर्वोत्तम की कृपा से किये. सर्वोत्तम तुलसीनाथ का एक भाग रोहिताश्व असीम के पूर्व जन्मो का भाई था. पूर्वजन्मो की  स्नेह स्मृति दोनों में बनी हुई थी. पर तत्व ज्ञान पाने से दोनों इस बात से ऊपर उठ चुके थे.   

एक महीने तक असीम,अरुण और अक्षय की सम्मिलित साधना चली. और इस दौरान बहुत से पथ इन तीनो ने पार कर लिए और फिर दीवाली के अवसर पर अरुण और अक्षय को वापस वाता बुला लिया गया.25 अक्टूबर 2011, को दीवाली के दिन अरुण और अक्षय विदा ले कर वापस वाता चले गए. और असीम अपने तप में लीन हो गए. जाते जाते अरुण और अक्षय ने पृथ्वी वास तक संपर्क में रहने का वादा किया. असीम सब जानते थे कि तीनो का पृथ्वी वास कितना कितना था. पर सर्वोत्तम ने यह भेद अपने साधकों के लिए अलभ्य बना रखा था. 

     
आलोक का आगमन
20 नवंबर 2011
                           वाता जा कर अरुण अक्षय फिर से पंथ सेवा और साधना में लग गए. नवंबर महीने के शुरू  में अरुण अक्षय फिर से सतोपंथ स्थित अपनी साधना स्थली में पहुँच गए. इस वर्ष के शीतवास के लिए अरुण और अक्षय ने गुफा के द्वार पर पत्थर आदि लगा कर आस पास का सारा हिस्सा साफ़ करके अपनी साधना स्थली में कुछ बदलाव आदि ले आये. एक दिन शाम को जब अरुण सतोपंथ के पास अपने साधनास्थल के पास घूम रहे थे कि अरुण ने एक ज़ोरदार चीख सुनी. किसी मानव का ह्रदय विदारक क्रंदन सुन कर अरुण उस ओर लपके. एक इंसान के ऊपर एक तेंदुए ने हमला किया हुआ था. और तेंदुआ उसकी गर्दन दबोचने के चक्कर में था पर वो इंसान पूरी मेहनत के साथ तेंदुए से भिड़ा हुआ था. अरुण चीखते ही और पत्थर फेंकते हुए उस ओर झपटे. अब तेंदुआ भाग निकला. अरुण ने जा कर देखा एक पन्द्रह सोलह साल का दुबला पतला लड़का था. काफी चौटें खाए हुए वो लड़का कराह रहा था. काफी खून भी बह रह था.
अरुण ने उस लड़के को उठाया और गुफा में ले आया. गुफा में लाकर अरुण ने देखा कि उसके कई घाव गहरे थे.

अरुण को लड़के का शरीर एकदम ठंडा सा लगा. अरुण ने अक्षय को याद किया अक्षय तुरंत वहाँ हाज़िर हो गया, अब दोनों मिल कर उस लड़के की सेवा में लग गए. लड़के का एकदम ठंडा पड़ा हुआ शरीर देख कर उन्हें लगा कि शायद खून ज्यादा बह जाने के कारण ऐसा हो रहा था. उस लड़के को अपने शरीरों के बीच लेकर दोनों योगी दाहन विद्या से शरीर को गर्म करने लगे. जैसे जैसे लड़के के शरीर में गर्मी आती गयी लड़का होंश में आने लगा. उसके होंश में आते ही दोनों साधक उसके घाव साफ़ करके एक जड़ी का लेप करने लगे. लड़का अभी भी कराह रहा था. अक्षय गुफा से बाहर गया और कहीं से एक बर्तन में दूध ले आया.

लड़का दूध पीने के बाद काफी ठीक लग रहा था. अब अरुण ने एक अन्य जड़ी निकाली और उस लड़के को मुह में रखने को दे दी. वह जड़ी मुहँ में रखते ही लड़का तेज़ी से ठीक होने लगा. अब अरुण ने लड़के से पूछा कि वो कौन है तब लड़के ने कहा कि उसका नाम आलोक था और वो सतोपंथ घूमने आया था और अपने दल से अलग हो गया था. तीन दिन से वो यहाँ भटक रहा था और आज अचानक तेंदुए ने हमला कर दिया. और उसके बाद इन दोनों को वो मिल गया था. अरुण को उस लड़के की बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा था. क्यूंकि इस मौसम में यहाँ कोई घूमने नहीं आता था. और कोई भी तीन दिन तक इन सूने पहाड़ों में खोया नहीं रह सकता था. अक्षय  अरुण के मन के भाव जान गया था, अरुण अपनी दिव्य शक्तियों का इस्तेमाल बहुत कम करता था, पर अक्षय ने तुरंत पारिची विद्या को जागृत कर दिया, पारिची  सामने वाले का परिचय तुरंत दे देती है.
पारिची यक्षिणी प्रकट हुई और सिर्फ अक्षय को दिखाई दी. पारिची ने अक्षय को कहा कि ये लड़का कोई साधारण मानव नहीं है और उसे सिर्फ इतना ही बताने की आज्ञा है. और अब अक्षय भी इस बात को भूल जाएगा. यक्षराज कुबेर का यही आदेश है. पारिची अक्षय के मस्तिष्क से उस लड़के का परिचय मिटा कर गायब हो गयी.
अब दोनों मित्र उस लड़के को सुला कर सो गए. अगले दिन सुबह 21 नवंबर का दिन और सुबह उत्पत्ति एकादशी और सोमवार का सुबह योग, दोनों साधक सतोपंथ में स्नान करने के लिए जाने लगे तो वो लड़का बोला अगर आप दोनों चले जाओगे तो मुझे अकेले डर लगेगा. एक तो मेरे पास ठहर जाओ. अरुण ने लड़के को कहा कि वो उसे साथ ले जायेंगे. लड़का बोला मै तो काफी कमजोरी महसूस कर रहा हूँ चलूँगा कैसे. अरुण ने उस लड़के को गोद में उठा लिया और सतोपंथ की और चल पड़े.

सतोपंथ पहुँच कर अक्षय और अरुण ने लड़के को किनारे पर एक जगह बैठा दिया और खुद किनारे पर बैठ कर वंदन आराधन आदि करने लगे. दोनों साधक नग्न रहते थे कपडे आदि तो निकलने की आवश्यकता थी नहीं. अब दोनों जल में प्रवेश करने लगे. पानी की शीतलता तो लगता था कि बर्फ से भी अधिक थी, शरीर का जितना हिस्सा पानी के भीतर जाता जा रहा था सुन्न होता जा रहा था. पर मोक्षमार्गी इन साधकों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.
जल के भीतर पहुँच कर दोनों ने स्नान किया, बद्रीनारायण का स्मरण करते रहे और जल में खड़े होकर सूर्य को जलअर्पण किया. सभी देवताओं दिशाओं को तर्पण दिया. और जब बाहर निकले तो देखा पूर्व की और मुख करके तीन साधक बैठे थे. एक पीताम्बर, एक श्वेताम्बर और एक बाघ का चमड़ा पहने था. महाज्ञानी जानकार तीनो को इन दोनों ने वंदन किया पर तीनो साधक ध्यान मग्न रहे.अब अरुण अक्षय उस लड़के के पास आ गए. कल रात को हुई तेंदुए के साथ मुठभेड़ से उस लड़के के सारे शरीर पर मिटटी और खून सूख चुके थे. सारे बाल भी मिटटी में लथपथ थे. अरुण और अक्षय ने उस लड़के के सारे कपडे निकाले और उसे उठा कर स्नान करवाने के लिए सतोपंथ ताल में ले आये लड़का चिल्लाने लगा मुझे ठंड लग जायेगी, मै मर जाऊँगा. पर अरुण और अक्षय ने एक नहीं सुनी और उसे सतोपंथ में स्नान करवाने लगे. जल में जाते ही वो लड़का एकदम इनके हाथ से फिसल कर जल में तैरता हुआ चला गया. उस लड़के का तैरना बहुत ही अजीब सा था. वो हाथ पाँव चला कर नहीं तैर रहा था बल्कि किसी मछली के तरह पानी में फिसलता सा जा रहा था. मैल समाप्त कर निर्मल बनाना तो जल का काम है. पर सतोपंथ का जल तो मन को भी निर्मल बना देता है. उस लड़के के शरीर और बालों में भरी हुई मिटटी घावों पर सूखा खून सब साफ़ हो गया. और एक नवजात शिशु जैसी सफेद साफ़ कोमल देह के साथ वो लड़का बाहर निकला तो थर थर कांप रहा था. अरुण ने उसके छाती पर दाहन का स्पर्श किया तो उसके शरीर पर लगा सारा पानी सूख चुका था और उसके शरीर में गर्मी भी आ गयी थी. अक्षय ने आवरनी विद्या से उसे नए वस्त्र पहना दिए. पर उसने तुरंत सब वस्त्र निकाल फेंके और अरुण अक्षय की तरह दिगंबर हो गया, बोला अब मै आप लोगों के साथ ही रहूँगा और आप ही की तरह रहूँगा.
अरुण अक्षय कुछ कह नहीं पाए. अब वे तीनो वापस गुफा की ओर चले तो अरुण ने देखा कि उस लड़के आलोक के घाव काफी हद तक ठीक हो गए थे. अरुण समझ गया कि यह सब उस चमत्कारी बूटी का कमाल है जो रविनाथ ने उसे बताई थी और अरुण ने कल रात इसको चूसने के लिए दी थी. अरुण और अक्षय जब वापस गुफा में पहुंचे तो अरुण ने कहा आलोक पुत्र  तुम हमारे साथ यहाँ नहीं रह पाओगे. यहाँ बहुत ज्यादा बर्फ पड़ती है और हम लोग चार महीने उपवास करते हैं. यहाँ खाने के लिए कुछ उपलब्ध नहीं होता. बेहद ठंड होती है ऐसे तुम यहाँ कैसे रह पाओगे. आलोक बोला, आप लोग चाहें तो मेरे लिए खाने का सामान यहीं प्रकट कर सकते हैं और रही बात ठंड की तो जैसे आज आप लोगों ने मेरी ठंड दूर की थी वैसे ही आगे भी कर सकते हैं. मुझे यहाँ से भगाने की कोशिश नहीं करो, मै यहीं रहना चाहता हूँ, अरुण ने कहा तुम्हारे माता पिता तुम्हे ढूँढ रहे होंगे, इसपर लड़का बोला कि उसका कोई नहीं है और वो तो एक अनाथाश्रम में पला बढ़ा है. उसकी प्रतीक्षा किसी को नहीं है.अरुण और अक्षय कुछ कह नहीं पाए.और कुछ कहने को था भी नहीं.

दोनों मित्रों ने खाने का सामान प्रकट किया और साधना में डूब गए. उनकी सेवा में आलोक समय बिताने लगा. फिर छः दिसंबर को वैकुण्ठ एकादशी के दिन तीनो सतोपंथ फिर चले गए, और वहाँ स्नान किया, बाहर आकर उन्हें वही तीनो श्वेताम्बर, पीताम्बर और बाघम्बर साधक फिर मिले. तीनो ने उन तीनो दिव्य साधकों की आराधना वंदना की. इस बार तीनो साधकों ने मुस्करा कर वंदना स्वीकार की.


 जब ये तीनो वापस गुफा में पहुंचे तो ना जाने क्यूँ अरुण और अक्षय बहुत प्रसन्न थे. उन दिव्य साधकों के दर्शन का असर था शायद. अब अरुण और अक्षय धयान में गए तो उनका ध्यान फरवरी में खुला. ध्यान खुलते ही उन्होंने आलोक को ध्यान में बैठे पाया. आलोक का शरीर भी उनकी तरह ही सूख गया था. खाने का ज्यादातर सामान ऐसे ही पड़ा हुआ था. साफ़ दिखाई दे रहा था कि आलोक ने ज्यादातर सामान छुआ ही नहीं था. उनके ध्याम खुलने के थोड़ी देर बाद ही आलोक का भी ध्यान खुल गया. अरुण ने पूछा कि आलोक को ध्यान लगाना कैसे आ गया और वो कितने दिन से ध्यान में डूबा हुआ है. आलोक ने कहा कि उसे कुछ नहीं पता कि उसे क्या हुआ था. अरुण और अक्षय ने समय चक्र देखा तो पता चला कि कल सत्रह फ़रवरी है और विजया एकादशी का पावन दिन है.

सतोपंथ में स्नान करने से ज्यादा तो उन तीनो साधकों के दर्शन की उत्कंठा मन में लिए अरुण और अक्षय, आलोक के साथ सतोपंथ में पहुंचे. चरों तरफ बर्फ का साम्राज्य था. जैसे ही स्नान तर्पण आदि से निवृत हो कर उन्होंने देखा तो तीनो साधक वहीँ बैठे थे. अरुण और अक्षय उनके पास पहुंचे और वंदना की. तीनो साधकों ने इस बार हाथ उठा कर इन्हें आशीर्वाद दिया. तभी आलोक बोल पड़ा, ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तसे नमो नमः. बस यही पल था जब अरुण अक्षय समझ गए कि सामने त्रिदेव हैं. और त्रिदेव अन्तर्ध्यान हो गए. अब अरुण ने आलोक से पुछा, सच बताओ तुम कौन हो






आलोक का रहस्य (17 फरवरी 2012)

आलोक कहने लगा, आप लोग मेरा रहस्य कभी नहीं जान पाते अगर आज मैंने आप लोगों को त्रिदेव साक्षात्कार के समय नहीं चेताया होता. मै भी क्या करता इतनी बार देव दर्शन करने के बाद भी आप दोनों पहचान नहीं पाए थे. अब मुझे लगा कि इनकी सहायता कर ही दी जाए. मेरा नाम दंषक है, मै एक सर्प हूँ. मानव रूप धरने की विद्या जानता हूँ. जिस रात मै अरुण को मिला था उस रात मै मानव रूप में घूम रहा था और तभी तेंदुए ने मुझ पर हमला बोल दिया. अचानक हुए इस हमले में मेरी मणि कहीं गिर गयी. और मणि के बिना मै अब ना तो रूप बदल सकता था और ना ही अपने घावों को ठीक कर सकता था.

जब अरुण मुझे उठा कर लाये तो उन्हें मेरा शरीर बहुत ठंडा लगा था. हम सर्प जाति के प्राणियों का शरीर का तापमान जब कम हो जाता है तो हम चल फिर नहीं पाते, जब शरीर का तापमान बढ़ता है तब हम क्रियाशील हो जाते हैं. यहाँ के ठन्डे वातावरण में मै बहुत कमज़ोर हो गया था. जब आप दोनों ने अपने शरीर से मुझे ताप दिया तो मै ठीक हो गया था. जब मै सतोपंथ के पानी में पहुंचा तो सर्प की तरह ही पानी में तैरने लगा. अचानक मुझे ध्यान आया कि आप लोग मुझे देख रहें हैं तो मै पानी से बाहर आ गया. मेरी मणि जब मुझे मिल जायेगी तो मै वापस अपने लोक में जा सकूंगा. अब बर्फ पिघलने लगेगी और मै अपनी मणि ढूँढ लूँगा.

आलोक अरुण और अक्षय के साथ उस जगह पहुंचा जहाँ उसकी तेंदुए से मुठभेड़ हुई थी. बहुत तलाश किया पर मणि नहीं मिली. अचानक ही आलोक को याद आया और वो बोला कि उन्हें सूर्यास्त की प्रतीक्षा करनी चाहिए. सूर्यास्त के समय आलोक ने एक अजीब सी फुफकार के साथ एक मन्त्र जप किया तो बर्फ और पत्थरों के बीच एक जगह से प्रकाश फूटने लगा. वहाँ पर बर्फ और पत्थर हटाये तो एक बेहद चमकती हुई मणि पड़ी थी. आलोक ने उसे उठाया और तुरंत ही दंषक नाग के रूप में आ गया. अब वो वापस मानव रूप में आया और अरुण और अक्षय की सहायता के लिए उनका धन्यवाद किया. अलोक बोला  अक्षय ने जब पारिची से मेरा परिचय माँगा तो वो बेचारी क्या बोलती, मै यक्षराज कुबेर का मित्र हूँ. और मेरे कहने पर ही यक्षराज ने यक्षिणी को यह आदेश दिया था कि वो आप लोगो को कुछ ना बताये. अब आप लोग वापस वाता चले जाओगे.मै अपने स्मृति चिन्ह के रूप में आप दोनों को यह मणि देता हूँ, मेरी मणि के समान यह मणि दिव्य है. आप इस मणि से जो भी चाहेंगे वो यह मणि आपको दे देगी. यह कहते हुए आलोक ने एक मणि अरुण को दे दी. अरुण बोला, हे दंषक आलोक  हम लोगों के लिए यह मणि निरर्थक है. आपकी स्मृति तो हमारे ह्रदय में सदा रहेगी. यह कह कर अरुण ने मणि लौटा दी. अरुण के मणि लौटाते ही एक तीव्र प्रकाश वहाँ हो गया और सामने सर्वोत्तम खड़े थे. सर्वोत्तम ने अरुण और अक्षय से कहा, आज तुम दोनों अपनी परीक्षा में सफल हो गए हो. अब तुम दोनों का स्तर बढ़ कर दो हो गया है. अक्षय और अरुण सर्वोत्तम के चरणों में झुक गए. सर्वोत्तम उन्हें आशीष दे कर अन्तर्ध्यान हो गए. अब दंषक आलोक ने अरुण और अक्षय से उनके साथ रहने की आज्ञा मांगी, अरुण ने जब आलोक से इसकी वजह पूछी तो आलोक ने बताया कि वो अरुण और अक्षय के गण रूप में उनकी सेवा करना चाहता है, इसपर अक्षय ने हाथ जोड़ कर कहा, हे नाग हम योगी हैं हमे सेवकों गणों की आवशयकता नहीं है. हम राही हैं, स्वर्ग के राही, कृपया हमे आशीर्वाद दीजिए कि हम अपने इस राह की मंजिल पा सकें. आपके कष्ट काल में हम आपके काम आये, यह हमारा सौभाग्य है. आप इसे अहसान या बोझ ना समझे. आप ही की कृपा से हम त्रिदेव के दर्शन करने में सफल हुए.

दंषक आलोक ने  कहा मै तुम्हारे त्याग से बेहद प्रसन्न हूँ, देव दर्शन कभी खाली नहीं जाता, तुम मुझसे मिले इसका कोई ना कोई फल तो मै तुम्हे दे कर ही जाऊँगा, मै  तुम्हे बेहद गुप्त ज्ञान  देवताओं की श्रेणियाँ बता देता हूँ. यह देवताओं के अलावा बहुत ही कम मानव जानते हैं. देवताओं की कुल नौ श्रेणी है.
 सबसे बड़ी श्रेणी में महामाया हैं
 उनके बाद त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु,महेश हैं,
 तीसरी श्रेणी में गणेश, इंद्र,पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती आदि आते हैं
चौथी श्रेणी में वायु अग्नि वरुण पृथ्वी आदि प्राकृतिक देवता आते हैं
पाँचवी श्रेणी में गरुड़, कुबेर, नंदी, सप्तऋषि, नारद, यम, वासुकी, शेषनाग आदि देवता आते हैं
छठी श्रेणी में देवताओं के सेवक यक्ष गन्धर्व किन्नर आतें हैं यहाँ तक के देव देवलोकों में निवास करते हैं
सातवीं श्रेणी मे हम जैसे देवलोक और पृथ्वीलोक पर विचरने वाले देव आते हैं जो विभिन्न त्रिदेवों के लोक में सेवक का काम करते हैं.
आठवीं श्रेणी में भूत, प्रेत, स्थानदेव, गृहदेव आदि निम्न कोटि के देव आते हैं जो केवल पृथ्वी पर ही रह सकते हैं जो देवलोक केवल मुक्ति के पश्चात ही जा पाते हैं.
नौंवी श्रेणी में वो योगी ऋषि महात्मा आते हैं जिनका देवलोक गमन निश्चित होता है.
अरुण और अक्षय  तुम दोनों भी अब नौवें स्तर के देव बन चुके हो और तुम्हारा साधना मार्ग तुम्हे सीधे महामाया में विलीन कर देगा इसलिए तुम्हारी साधना से तुम नौवीं कोटि के देवों से सीधे पहली कोटि में कूद जाओगे.
यह है देवलोक का रहस्य.
अरुण में बेहद विनीत भाव से पूछा, हे देव यह तो बताइए कि पृथ्वी पर विचरते देवों को कैसे पहचाना जा सकता है. इसपर दंषक आलोक बोले  अरुण और अक्षय  आप दोनों को इसकी क्या आवश्यकता है. आप तो स्वयं देव कोटि में पहुँच गएँ हैं, इसपर अक्षय बोले, कृपया करके आप हमे बता दीजिए.

अब आलोक दंषक बोले, हे योगी जोड़ी  मै वह सबसे आसान तरीका बता देता हूँ जिससे आप देवों को पहचान सकते हैं, देवो के सिर के ऊपर एक दम बालों के साथ के एक अंगुल की मोटाई में हवा आपको विरल दिखाई देगी. ऐसा महसूस होगा जैसे सर से गर्मी निकल रही है. या आग के ऊपर जिस तरह हवा आग के ऊपर गरम हो कर पानी के तरह बहती नज़र आती है ठीक ऐसा ही उनके सिर के चारों तरफ महसूस होता है. यही धरती पर घूमते देवों की पहचान है. इसे प्रभा मंडल भी कहा जाता है.
आप लोग नित्य अभ्यास से इसमें पारंगत हो सकते हैं.

नागदेव आलोक दंषक दोनों को आशीष दे कर अंतर्ध्यान हो गए. अरुण और अक्षय अब दूसरे स्तर के योगी बन चुके थे. शमिनाथ और शुभनाथ दोनों से मिलने आये और अब वे गले मिल कर मिले. अरुण अक्षय उनके समकक्ष जो पहुँच गए थे. अरुण अक्षय अब बिना किसी की आज्ञा लिए पृथ्वी के किसी भी कोने में पहुँच सकते थे. अरुण जो बात नहीं जानते थे वो थी अक्षय के इस जन्म की कहानी. अक्षय कुछ बताता नहीं था. अक्षय पिछले जन्म में देवनाथ रूप में 20 जुलाई 1976 को प्राण त्याग कर अंतरिक्ष में विचरता रहा था . उसने दोबारा जन्म कहाँ लिया था और कब कैसे वो इस जन्म में अक्षय के रूप में पैदा हुआ था और वो वापस पंथ में कैसे आया. यह सब प्रश्न अरुण के मन में उठे तो अक्षय मुस्करा उठा. इतने बड़े योगी एक दूसरे के मन के भाव तो आसानी से पढ़ सकते थे.
अक्षय ने कहा, भैया आज मै आपको मेरे इस जन्म के बारें में सब कुछ बताने को तैयार हूँ, पर यहाँ नहीं. चलिए हम लोग मेरे धर्मपिता असीम के पास चलतें हैं. वो ही आपको मेरे इस जन्म के विषय में सबकुछ बता देंगे. क्यूंकि मेरे इस जन्म के रहस्य की चाबी और मेरे पंथ में वापस आने की कथा उनके पास सुरक्षित रखी है. मेरे इस जन्म का  पूरा वृतान्त मैंने सबसे छिपा कर रखा था. पर जब मै उनसे मिला तो मुझे उनमे अपने पिता की छवि दिखाई दी. मैंने उनके पास अपना भूतकाल सुरक्षित रख दिया था.
अरुण भैया आपने जब कूचबिहार में चौथा जन्म लिया था तब मै अपने दूसरे जन्म में ही था. आपके जीव अवतरण से अब तक पांच जन्म देखें हैं. जबकी मेरे जीव अवतरण से अब तक सिर्फ तीन ही जन्म हुए हैं. अब आपको मै अपनी पूरी कथा सुनाने के लिए पितृ असीम के पास ले चलता हूँ. दोनों योगी असीमनाथ के पास जाने को निकल पड़े.

















अक्षय के जन्म
16 मार्च  2012   

दोनों योगी असीमनाथ के पास चले गए. असीमनाथ गणेश पीठ में साधना रत थे. जब अरुण और अक्षय पहुंचे तो असीम का ध्यान खुल गया. असीम अपने धर्मभाई अरुण और धर्मपुत्र अक्षय को देख कर बहुत  प्रसन्न हुए. तीनो साधक बड़े उत्साह से गले मिले, और आरंभिक बातों के बाद अरुण ने असीम से कहा, हे योगी ज़रा मुझे अक्षय की सम्पूर्ण जीवन  कथा तो बताइए, अक्षय के बारे में मै कुछ भी नहीं जानता. यह लगभग पांच सौ वर्ष से मेरे साथ है पर इसके जीव(आत्मा) की सम्पूर्ण यात्रा के विषय में मुझे बहुत ही कम पता है. आपके पास इसकी सम्पूर्ण जानकारी है कृपया करके आप मुझे बता दीजिए.
असीमनाथ कहने लगे, योगी अरुण  आपका अक्षय जिसका एक नाम देवनाथ भी है, ब्रह्मा जी के अंश का अवतार है. इसने एक छोटे भाई के सभी कर्तव्य निभाए हैं. हर जन्म में आपकी सेवा की, आपके बहुत से पाप कर्मो को सुधार आपको वापस पुण्य मार्ग पर लगाया है. यह योगी धर्म का साक्षात रूप है. बहुत लंबी लंबी आयु पाने वाला यह साधक कितनी बार आपसे आगे निकल सकता था, पर इसने सदा आपको ही आगे रखा. जब स्वर्ग का द्वार खुलेगा  आपके भीतर जाने के बाद ही यह स्वर्ग में प्रवेश करेगा.
 इसके बांये हाथ में कमल और दांये हाथ में माला सदा बनी रही है, धर्म का मार्ग इसने कभी नहीं छोड़ा. इसकी शक्तियां अगणित हैं. आपके चरणों में अपना जीवन बिताना इसका ध्येय रहा है. अब इसकी पूरी जीवन कथा सुनिए

अक्षय का पहला जन्म  
1 अप्रैल 1488 से 20 अगस्त 1748
मंगलवार एक अप्रैल 1488  को गुजरात के एक गाँव में कृष्णदत्त नामक ब्राह्मण के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ. कृष्णदत्त एक बहुत ज्ञानी ब्राह्मण थे, उन्होंने अपने पुत्र की कुंडली बनायीं तो उसमे पाया कि इस बच्चे की भुक्त दशा थी ही नहीं इसका अर्थ हुआ कि इस बालक का पिछला जन्म था ही नहीं. पंडितजी बहुत हैरान हुए और उन्होंने अपने गुरु से संपर्क  किया. गुरूजी भी कुंडली देख कर हैरान हो गए . सूर्य की महादशा में जन्मा यह बालक दीर्घ आयु, महाज्ञानी, संन्यास मार्गी था. स्त्री तो इस बालक की दृष्टि मे ही नहीं थी यानि विवाह तो दूर वासना का अणु भी इसके मानस में ना था, इस कारण यह बाल ब्रह्मचारी था. पंडित जी सभी जानकारी ले कर घर वापस लौटे और अपनी पत्नी को सारी बात बताई. एक तरफ तो इतने महान पुत्र को पा कर दोनों धन्य हो गए थे, पर इस बात का दुःख रह गया था कि इनका ये पुत्र संन्यास मार्ग पर चला जाएगा और बुढापे में उनकी सेवा ना करेगा. बच्चा बचपन से बहुत धीर गंभीर था. उसका नाम खेत्रपाल रखा गया. एक दिन गाँव में एक सन्यासी आये. उन्होंने जब इस बच्चे को देखा तो बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने कहा यह तो ब्रह्मा का अंश ले कर आया है. इस बच्चे को काशी  में किसी योग्य गुरु के पास भिजवा दीजिए. खेत्रपाल के माता पिता इतने अमीर ना थे कि बेटे को काशी भेज सकते. फिर एक दिन भाग्य ने पल्टा खाया. क्षेत्र के राजा रविजौहर सिंह गाँव में पधारे. ब्राह्मण कृष्णदत्त ने राजा को देखा तो परेशान हो गया, राजा के मस्तक पर बिच्छू की छाया थी. इसका अर्थ था चार घंटे के अंदर एक बिच्छू काटने वाला था. पंडित कृष्णदत्त ने यह बात मंत्री जी को बताई, मंत्री ने राजा को बताया. राजा ने पंडित को बुलवाया और पूछा कि अगर तुम्हे यह पता है कि मुझे बिच्छू काटने वाला है तो यह भी बताओ कहाँ कब और कैसे काटेगा. पंडित ने वाहन बैठकर हिसाब लगाया और बोला महाराज अब तो मुश्किल से आधा घंटा रह गया है. डंक आपके पैर में लगेगा और जब आप रथ मे बैठे होंगे तब लगेगा. बिच्छू लाल रंग का होगा. बिच्छू की लम्बाई छः उँगल होगी. राजा ने तुरंत रथ की जांच करवाई. रथ के अंदर गलीचे के नीचे एक बिच्छू मिल गया जो लाल रंग का और छः उँगल लंबा था. राजा के आदमियों ने बिच्छू को मार डाला पर बिच्छू को मारते हुए उसका डंक टूट कर गलीचे पर गिर गया. राजा पंडित की ज्योतिष शक्ति से बहुत प्रभावित हुआ और उसे राज ज्योतिषी बना दिया. जैसे ही राजा रथ में बैठ कर जाने लगा, राजा ने जूतियाँ निकाल दी. बिच्छू का डंक राजा के पाँव में लग गया और राजा दर्द से तदपने लगा. पंडित को बुलाया गया तो पंडित ने बताया  महाराज मै आपको कहना चाहता था कि यह बाते टलती नहीं हैं. अब उपचार यह है कि आप अपने पैर पर लस्सी कि धार गिरवाते रहे और बिच्छू बूटी को पीस कर इसपर बाँध लें. आपका कष्ट चार घंटे का है. राजा ने ऐसा ही किया. राजा ने ठीक होने के बाद पूछा, क्या कोई तरीका था जिससे मै इस कष्ट से बच जाता. कृष्णदत्त ने कहा जी महाराज अगर आपने सुबह चार गरीब विधवाओं को अनाज का दान दे दिया होता तो आप कष्ट से बच जाते. मेरी विद्या के अनुसार मुसीबत के आने से आठ घंटे पहले अगर उपचार कर लिया जाए तो मुसीबत से बचा जा सकता है.
 राजा उसके बाद रोज पंडितजी  से रोज अपने दिन के बारे में पूछ लेता. पंडितजी की विद्या के प्रभाव से राजा दिन पर दिन ज्यादा ताकतवर और प्रजा में प्रिय होता गया. पंडितजी का पुत्र खेत्रपाल अब दस वर्ष का हो चुका था. एक दिन एक बहुत बड़े साधु दक्षिण देश से राजदरबार में पधारे. राजा ने उनका बहुत स्वागत किया. उन साधु का नाम गुरुपाद था. गुरुपाद ने राजा के महल में बच्चे खेत्रपाल को देखा और स्तंभित रह गया. उसने राजा को कहा इस बच्चे को तो महान योगी बनना है, इसे इसका मार्ग दिखाना बहुत ज़रूरी है. इस बच्चे में ब्रह्मा जी ने स्वयं अंश रूप में अवतार लिया है. पंडितजी साथ में ही थे. उन्होंने कहा कि पहले भी एक साधु ने यह बात कही थी. उन्होंने कहा था कि इसे काशी के किसी गुरुकुल में डाल दो.

साधु गुरुपाद ने कहा  ठीक है मै काशी ही जा रहा हूँ मै इसे साथ ले जाता हूँ. और खेत्रपाल को उस साधु के साथ काशी भेज दिया गया. वहाँ  एक विद्वान ब्राह्मण विष्णु के गुरुकुल में डाल दिया. बालक का नाम बदल कर अक्षय रख दिया गया और आठ साल की विद्या के बाद अक्षय एक प्रकांड पंडित बन गया. एक दिन अक्षय ने अपनी जन्म गणना की और उसे पता चल गया कि उसका वास तो रुद्रप्रयाग में लिखा है और वो गंगा के सहारे सहारे चलता हुआ रुद्रप्रयाग पहुँच गया और वहाँ उसने सत्यपंथ नामक योगाश्रम में दीक्षा ले ली. योगी रविनाथ ने उसे नया नाम दिया देवनाथ. उस आश्रम में एक और युवा योगी था जिसका नाम अरुण था. अक्षय और अरुण की दोस्ती हो गयी और अक्षय अरुण को बड़े होने के नाते भैया कह कर बुलाने लगा. दोनों साधक साथ रहते साथ तपस्या  करते, दोनों का स्नेह ऐसा हो गया कि लोग उन्हें सगा भाई समझने लगे. फिर एक दिन अरुण एक युवती मेखला से विवाह कर पंथ को छोड़ कर चला गया. 
अक्षय को बहुत धक्का लगा, अक्षय ने एक दिन मेखला की माँ से मेखला को संन्यास के लिए मांग लिया, मेखला अपनी माँ का वचन रखने के लिए सन्यासिन हो गयी. वासना में अंधे हुए अरुण ने अक्षय पर मारिणी नामक शक्ति चला दी जिसे रविनाथ ने निष्फल कर अरुण का मन निर्मल करने के लिए निर्मला विद्या का प्रयोग किया. अरुण का मन निर्मल हो गया और वो पंथ में लौट आया. अरुण को प्रायश्चित रूप में अपने जीवन के चालीस साल  अलकनंदा नदी में प्रवाहित करने पड़े. और फिर दोनों साधक तीस वर्ष तक एक साथ तपस्या करते रहे.
एक दिन अरुण को वृंदावन जाने का आदेश मिला और अरुण व् अक्षय अलग अलग हो गए. बहुत दिनों तक अक्षय अरुण से दूर रह कर तपस्या करता रहा. फिर सन 1604 में अरुण वापस बद्रीनाथ लौटा तो वो साधना पथ छोड़ भक्तिपथ पर चल पड़ा था. अक्षय साधनापथ और अरुण भक्तिपथ पर चलते रहे पर दोनों साथ ही रहे. 1639   में अरुण ने शरीर त्याग दिया और अक्षय एक बार फिर से अरुण से अलग हो गया.  1650 में अरुण ने दोबारा जन्म लिया.  1671 में अरुण अक्षय के पास अपने पुत्र की बीमारी  के लिए आया. अक्षय तो पहचान गया था, पर अरुण पहचान नहीं पाया. अक्षय के आशीर्वाद से अरुण का पुत्र ठीक हो गया और अरुण, उसके उस जन्म के माता पिता शुभा और् सोहन अरुण की पत्नी सुमंगला सब अक्षय के भक्त हो गए, जब भी अरुण अक्षय के पाँव छूने लगता अक्षय उसे बाँहों में भर लेता, आखिर उसका बड़ा भाई जो था. एक दिन अरुण के पिता सोहन की मृत्यु हो गयी. और अरुण की माता शुभा ने संन्यास ले लिया. अब अक्षय ने माँजी शुभा का पुत्रत्व ले लिया. माँजी को श्रीनगर के आश्रय का जिम्मा सौंप दिया गया.

1709  मे अरुण ने संन्यास ले लिया और दोनों साधक फिर मिल गए और एक साथ साधना पथ पर चल पड़े. इन दोनों ने सतोपंथ ताल पर तपस्या प्रारंभ कर दी, फिर एक विशेष नाम का साधक इनके साथ आ मिला. अक्षय की आयु अब दो सौ साठ साल हो चुकी थी, उसने अपने बड़े भाई अरुण की गोद में 20 अगस्त 1748 को शरीर त्याग दिया और फिर इकहतर वर्ष अंतरिक्ष में बिताए, अक्षय ने जिस तरह से मेखला से अरुण को अलग किया था उसकी सज़ा उसने मानव जन्म की इन्तज़ार करके पाई.


अक्षय का दूसरा जन्म
17 फरवरी 1809 से  30 जून  1972



अरुण ने 1796 में शरीर त्याग दिया और 1804 में जब्बलगढ़ में जन्म लिया और अक्षय ने 1809 में अरुण के छोटे भाई के रूप में जन्म लिया. यहाँ से दोनों भाई गृहस्थ आश्रम में रम गए और फिर 1859 में यह दोनों भाई  वापस साधना पथ पर पहुँच गए. 1919 में अरुण ने अक्षय की आयु जोकि एक सौ बीस वर्ष की हो गयी थी को कम करके पचास वर्ष आयु का हो जाने का आशीर्वाद दिया और अक्षय को आदेश दिया कि अगले जन्म में जब अरुण कूचबिहार में जन्म लेगा तब उसे वहाँ से वापस अक्षय ही लाएगा और फिर अरुण  ने शरीर त्याग दिया. अक्षय कई सालों तक यहाँ वहाँ घूमता रहा  
अरुण ने 1923 में कूचबिहार में जन्म लिया और फिर जब अरुण चौदह वर्ष का हो गया तब उसे वापस लाने अक्षय कूचबिहार पहुँच गया , अरुण को वापस पंथ में ला कर उन्हें फिर से साधना पथ पर डाल कर अक्षय अरुण को ले कर सतोपंथ पहुँच गया. वहाँ अरुण और अक्षय ने बहुत वर्ष तपस्या की.  और फिर सोलह साल की गूढ़ तपस्या के बाद अरुण को अकेला छोड़ सर्वोत्तम के आदेश से अक्षय को एक गुप्त साधना के लिए गंगासागर भेज दिया गया. सतोपंथ पर अरुण की मुलाक़ात एक तंत्र साधक शाम्भवनाथ से हो गयी. अरुण और शाम्भवनाथ के बीच बहुत गहरी मित्रता हो गयी. फिर शाम्भवनाथ एक कन्या मानवी को भैरवी बनाने के लिए ले आया. भैरवी को माध्यम बना कर तांत्रिक साधना में उच्चता पाते हैं. भैरवी तांत्रिक के लिए माता पार्वती का रूप होती है. पर अरुण के मन में मानवी ने काम वासना जगा दी. जब शाम्भवनाथ की मुक्ति हुई तो वो भैरवी को वहीँ छोड़ गया. अरुण  मानवी  का यह एकांत मिलन शायद  विधि ने ही लिखा था.  कामदेव के  बाणों से बिंधा अरुण मानवी के साथ कामरत हो गया और फिर साधना पथ छोड़ 1953 में गृहस्थ आश्रम में चला गया. अक्षय ने अरुण के सारी दैवी शक्तियां छीन कर उन्हें कोटेश्वर महादेव में सुरक्षित रख दिया. ग्यारह वर्ष अरुण ने  गृहस्थ आश्रम में बिताए और फिर मानवी की  मृत्यु के बाद जब अरुण वापस पंथ में लौटे तो प्रायश्चित रूप में अरुण को तीस साल अलकनंदा में फिर त्यागने पड़े. और अक्षय के साथ फिर अरुण ने  छः साल तपस्या करके 1970 में शरीर त्याग दिया. अरुण के जाने से व्याकुल अक्षय ने सर्वोत्तम से शरीर त्यागने की अनुमति मांगी. और सर्वोत्तम के आज्ञानुसार 163 वर्ष की आयु 30 जून  1972 को  प्राण त्याग दिए. अक्षय ने अरुण के ममत्व में जो गलतियाँ की थी उसके फल स्वरुप पन्द्रह वर्ष का समय अंतरिक्ष में बिताया. अरुण ने 1980 में जब जन्म लिया तो अक्षय बेहद प्रसन्न हुआ. उसने भी अब जन्म लेने का निश्चय किया. ब्रह्मा जी ने सर्वोत्तम की प्रार्थना पर अक्षय को इच्छा जन्म का आशीर्वाद दे दिया था. परन्तु मृत्यु से पन्द्रह वर्ष का समय उसे बिना जन्म लिए ही बिताना था उसके बाद वो कभी भी जन्म ले सकता था,अक्षय का जीव इधर उधर घूमता रहा और उसके बाद एक दिन उसने एक दंपत्ति को देखा. अक्षय ने इस दंपत्ति में सभी गुण पाए और फिर इनका पुत्र बनकर जन्म लेने का निश्चय किया.




  


अक्षय का तीसरा जन्म
6 जून 1987 से अब तक

हिमाचल प्रदेश के बसपा घाटी के इलाके में जिससे किन्नौर भी कहा जाता है में एक जनजाति निवास करती है जिसे किन्नर कहा जाता है. किन्नर आजकल उभयलिंगी लोगों(हिजड़ों) को कहते हैं जो कि गलत है. किन्नर जनजाति के लोग बेहद खूबसूरत होते हैं, कई पुराणों में इन्हें गंधर्वों की तरह देवताओं के सेवक कहा जाता है. बहरहाल इस जनजाति का मुख्य काम चावल, मक्का उगाना, सेबों के बाग आदि होता है. ठन्डे इलाके के रहने वाले यह लोग बड़े सीधे सादे  और मेहनतकश होते हैं.

इसी जन जाति में 6 जून  1987 को रामेषर और सुरती नामक दंपत्ति के यहाँ एक बच्चे का जन्म हुआ जिसका नाम रामकिशोर रखा गया. रामकिशोर इस दंपत्ति का तीसरा पुत्र था. रामेषर का मुख्य काम उसके सेब के बगीचे और चावल के खेत थे. काम बढ़िया चल रहा था. घर में सब सुख सुविधाएँ भी थी. बड़े दोनों बेटे स्कूल जाते थे. रामकिशोर को घर में केशा बोला जाता था. यह रामकिशोर बड़ा ही समझदार बच्चा था. एक रात घर के बाहर एक तेंदुआ आ गया, घर में सब सोये हुए थे. रामकिशोर भेड़ों की आवाज़ से जगा और तुरंत समझ गया. उसने उसी वक्त अपने पिता को जगाया और कहा कि भेड़ों के बाड़े में तेंदुआ आ गया है. उसके पिता तुरंत बन्दूक ले कर बाहर लपके और हवा में फायर कर दिया तेंदुआ भाग निकला. उसके पिता बड़े हैरान हुए कि इसे कैसे पता चल गया कि तेंदुआ है. फिर अक्सर कमाल होने लगे. एक दिन उसके पिता रामपुर जाने के लिए निकलने लगे तो वो बोला, आज आप मत जाओ आज पहाड़ हिल रहे हैं, उसके पिता कुछ समझ नहीं पाए, पर उसके बार बार जिद करने और रोने से उसके पिता ने कार्यक्रम छोड़ दिया. पर कसबे के चार लोग एक जीप में वाहन गए थे और रास्ते में पहाड़ धसकने से खाई में गिर कर मारे गए. अब केशा जो बोलता उस पर ध्यान दिया जाता.

सारे कसबे में केशा बहुत मशहूर हो गया. जब केशा सात साल का हो गया तो उसका चर्चा आसपास के गाँवों में भी होने लगी. बहुत से लोग उससे पूछने आने लगे पर केशा जवाब तभी देता  जब उसका मूड होता. जब केशा नौ साल का हुआ तो उसकी दादी की मृत्यु हो गयी और उनकी अस्थियां प्रवाहित करने के लिए सारा परिवार हरिद्वार चला गया. हरिद्वार में गंगा स्नान के बाद जब वे लोग वापस जाने लगे तब केशा अपने परिवार से बिछड गया. सारा परिवार उसे ढूँढने लगा पर केशा कहीं नहीं मिला, पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई, बहुत जगह ढूँढा पर केशा तो जैसे हवा में घुल गया था. सारा परिवार कई दिन तक हरिद्वार में रहा पर केशे का कोई सुराग नहीं लगा. फिर रोते पीटते वे लोग वापस अपने कसबे में लौट गए.

इधर केशा भीड़ में अपने परिवार से अलग होकर रोता हुआ भटक रहा था. एक साधु ने अकेले बच्चे को देखा तो उसके मन में पाप आ गया और वो बच्चे को लखलखा सुंघा कर बेहोश कर उठा कर ले गया. वो साधु इस बच्चे को डरा धमका कर अपने साथ लेकर घूमता रहा. वो केशे से छोटे मोटे काम करवाता, भीख मंगवाता. अगर केशा किसी बात के लिए मना करता तो उसे मारता पीटता, तीन साल निकल गए, घूमते घूमते वे लोग दिल्ली पहुँच गए, एक रात जब साधु गांजा पीकर सोया पड़ा था उस समय केशा मौका पाकर भाग निकला. रात को ना जाने कैसे वो रेलवे स्टेशन पहुँच गया और एक ट्रेन में चढ कर छिप गया. वो ट्रेन अम्बाला  जा रही थी. जिस डिब्बे में केशा छिपा, उस डिब्बे में एक वृद्ध महिला भी थी. जिसने केशे को देख लिया. उसने केशे को उठाईगीर चोर समझा. केशा रोने लगा और उस महिला को सारी बात बताई. केशे की साफ़ भाषा और रंगरूप देख कर उस महिला को दया आ गयी और वो केशे को अपने साथ अपने घर ले गयी. यह महिला शारदा अरोड़ा  एक समाजसेविका थी जो किसी काम से दिल्ली आई थी. घर ले जाकर उन्होंने केशे का नाम बदल कर अक्षय रख दिया, उन्हें लगा केशा तो कोई नाम नहीं हो सकता ज़रूर इसका नाम अक्षय होगा जो यह बच्चा भूल चुका है.
शारदा जी के घर जाकर जब अक्षय नहा धोकर नए कपड़ों में तैयार हुआ तो उसकी सारी खूबसूरती निखर कर आ गयी. उसे स्कूल में डाल दिया गया . शारदा जी के अपने कोई बच्चे नहीं थे. उन्होंने अपना सारा प्यार अक्षय पर उड़ेल दिया. धीरे धीरे अक्षय बढ़िया स्कूलों में पढता हुआ शारदा जी के पुत्र के रूप में सभी सुख सुविधाओं में पल रहा था. एक दिन जब अक्षय अठारह साल का था तो अचानक हृदयगति रूकने से शारदा जी की मृत्यु हो गयी. अक्षय एक बार फिर अकेला हो गया. एक रात सपने में अक्षय को अपने पूर्वजन्म याद आ गए और वो उत्तरकाशी जा पहुंचा और वापस पंथ में जा पहुंचा.
अब उसे अरुण याद आने लगा, अपने पिछले जन्मो की तपस्या से मिली उसकी शक्तियां वापस लौटने लगी और वो पंथ में सबसे मिला. एक दिन ध्यान में उसने अरुण को देखा और अरुण को पंथ में वापस लाने के काम में जुट गया. और जब अरुण वापस लौट आया तो अक्षय और अरुण फिरसे साधना पथ पर एक साथ बढ़ चले.
बाकी सब आपको ज्ञात है ही, कह कर योगी असीम मौन हो गए, अरुण तो जैसे नींद से जागा. उसे लगा की अक्षय की सारी जीवन घटना उसकी आँखों के सामने ही घटी हो. असीम के साथ अरुण और अक्षय ने कुछ समय बिताया. एक रात असीम ने अरुण और अक्षय को बताया कि अब उन्हें सभी सिद्धियाँ पा लेनी चाहियें. योगी असीम की बात सुनकर अरुण और अक्षय पितृ आज्ञा समझ कर सतोपंथ पहुँच गए.

Friday, April 13, 2012

part 3

चलिए कहानी आगे बढ़ाते हैं.

असीम और अरुण का मिलना
10 सितम्बर 2011
सितम्बर के महीने में असीमनाथ(असीम) गणपति साधना करते थे और उन दिनों अक्सर ही उनपर शक्तिपात होता था. अक्षय यह बात जानता था. और अक्षय और असीम दोनों जब भी देवविग्रह के सामने एक साथ आते थे शक्ति अवश्य निकलती थी. ना जाने दोनों के कौन से गुण मिल कर देवों को इनपर कृपा करने को मजबूर कर देते थे. दिल्ली से वापस जाते हुए अक्षय ने असीम से मिलने का कार्यक्रम बनाया.  उत्तम की आज्ञा मिलते ही दोनों असीम की तपस्थली पर पहुँच गए. असीम इन दोनों को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ. असीम से मिल कर अरुण को ऐसा लगा कि वो असीम से पहले मिल चुका है. और असीम को बहुत अच्छे से जानता है. असीम ने दोनों के माथे चूम कर स्वागत किया. असीम ने जैसे ही अरुण के माथे पर होंठ रखे. अरुण एक दम पहचान गया. असीम रोहिताश्व के ही कई जन्म पहले के भाई थे. और दोनों भाई अलग अलग मार्ग से चलते हुए मोक्ष की ओर बढ़ रहे थे. असीम ने अरुण अक्षय के साथ रात को उच्छिष्ट गणपति साधना की. और अरुण व् अक्षय अदृश्य रूप में असीम के साथ गणपति पूजा समापन तक साथ रहे.

अरुण ने असीम से पूछा, भद्र आप हमारे पंथ के अनुसार किस स्तर तक पहुँच गए हैं. असीम ने हँसते हुए कहा कि स्तर तो उसे पता नहीं पर उसे इतना पता है कि गणेश लोक जिसे स्वानंद लोक भी कहते हैं के दरवाजे तो खुल चुकें हैं पर वहाँ पर स्थायी निवास में अभी समय और साधना बाकी हैं. इसपर अरुण ने पूछा कि क्या आप सशरीर स्वर्ग जाने के इच्छुक नहीं हैं. असीम ने कहा नहीं, मुझे अपना यह शरीर त्यागना ही है. मेरा सोचना है कि जब राम ओर कृष्ण तक ने शरीर त्याग दिए थे तो मै इस शरीर को क्यूँ ढोऊ. शरीर से लगाव मुझे नहीं है. मै शरीर को मृत्यु तक चलाना चाहता हूँ. बस इतनी ही कामना है कि मृत्यु पर शरीर त्याग कर परम गणाधिप में मेरा विलय हो जाए. अरुण ने पूछा कि आपका निजी जीवन आपके दैविक जीवन में परेशानी तो नहीं करता. असीम ने कहा नहीं मेरा सब कुछ इष्ट के निमित और उनकी कृपा प्रसाद है. इसी भावना से मै अपने दोनों जीवन में एक संतुलन बनाये रखता हूँ. मेरे गुरु ने मुझे राजर्षि बनने की अनुमति दी. अब मै संसारी भी हूँ सन्यासी भी.

अरुण ने सर्वोत्तम की आज्ञा ले कर असीम का भ्रातृत्व ले लिया और अक्षय ने असीम का पुत्रत्व ले लिया. अब अरुण असीम का छोटा भाई और अक्षय असीम का पुत्र हो गए. असीम ने दोनों को आशीष रूप में अपने देवकर्म दे दिए. अक्षय ने ज्ञानिनी विद्या और अरुण ने दिव्य अवलोकन विद्या असीम को अर्पित कर दी और तब तीनो ने स्वानंद लोक के दर्शन सर्वोत्तम की कृपा से किये. सर्वोत्तम तुलसीनाथ का एक भाग रोहिताश्व असीम के पूर्व जन्मो का भाई था. पूर्वजन्मो की  स्नेह स्मृति दोनों में बनी हुई थी. पर तत्व ज्ञान पाने से दोनों इस बात से ऊपर उठ चुके थे.   

एक महीने तक असीम,अरुण और अक्षय की सम्मिलित साधना चली. और इस दौरान बहुत से पथ इन तीनो ने पार कर लिए और फिर दीवाली के अवसर पर अरुण और अक्षय को वापस वाता बुला लिया गया.25 अक्टूबर 2011, को दीवाली के दिन अरुण और अक्षय विदा ले कर वापस वाता चले गए. और असीम अपने तप में लीन हो गए. जाते जाते अरुण और अक्षय ने पृथ्वी वास तक संपर्क में रहने का वादा किया. असीम सब जानते थे कि तीनो का पृथ्वी वास कितना कितना था. पर सर्वोत्तम ने यह भेद अपने साधकों के लिए अलभ्य बना रखा था. 

     
वाता जा कर अरुण अक्षय फिर से पंथ सेवा और साधना में लग गए. नवंबर महीने के शुरू  में अरुण अक्षय फिर से सतोपंथ स्थित अपनी साधना स्थली में पहुँच गए. इस वर्ष के शीतवास के लिए अरुण और अक्षय ने गुफा के द्वार पर पत्थर आदि लगा कर आस पास का सारा हिस्सा साफ़ करके अपनी साधना स्थली में कुछ बदलाव आदि ले आये. एक दिन शाम को जब अरुण सतोपंथ के पास अपने साधनास्थल के पास घूम रहे थे कि अरुण ने एक ज़ोरदार चीख सुनी. किसी मानव का ह्रदय विदारक क्रंदन सुन कर अरुण उस ओर लपके. एक इंसान के ऊपर एक तेंदुए ने हमला किया हुआ था. और तेंदुआ उसकी गर्दन दबोचने के चक्कर में था पर वो इंसान पूरी मेहनत के साथ तेंदुए से भिड़ा हुआ था. अरुण चीखते ही और पत्थर फेंकते हुए उस ओर झपटे. अब तेंदुआ भाग निकला. अरुण ने जा कर देखा एक पन्द्रह सोलह साल का दुबला पतला लड़का था. काफी चौटें खाए हुए वो लड़का कराह रहा था. काफी खून भी बह रह था.
अरुण ने उस लड़के को उठाया और गुफा में ले आया. गुफा में लाकर अरुण ने देखा कि उसके कई घाव गहरे थे.

अरुण को लड़के का शरीर एकदम ठंडा सा लगा. अरुण ने अक्षय को याद किया अक्षय तुरंत वहाँ हाज़िर हो गया, अब दोनों मिल कर उस लड़के की सेवा में लग गए. लड़के का एकदम ठंडा पड़ा हुआ शरीर देख कर उन्हें लगा कि शायद खून ज्यादा बह जाने के कारण ऐसा हो रहा था. उस लड़के को अपने शरीरों के बीच लेकर दोनों योगी दाहन विद्या से शरीर को गर्म करने लगे. जैसे जैसे लड़के के शरीर में गर्मी आती गयी लड़का होंश में आने लगा. उसके होंश में आते ही दोनों साधक उसके घाव साफ़ करके एक जड़ी का लेप करने लगे. लड़का अभी भी कराह रहा था. अक्षय गुफा से बाहर गया और कहीं से एक बर्तन में दूध ले आया.

लड़का दूध पीने के बाद काफी ठीक लग रहा था. अब अरुण ने एक अन्य जड़ी निकाली और उस लड़के को मुह में रखने को दे दी. वह जड़ी मुहँ में रखते ही लड़का तेज़ी से ठीक होने लगा. अब अरुण ने लड़के से पूछा कि वो कौन है तब लड़के ने कहा कि उसका नाम आलोक था और वो सतोपंथ घूमने आया था और अपने दल से अलग हो गया था. तीन दिन से वो यहाँ भटक रहा था और आज अचानक तेंदुए ने हमला कर दिया. और उसके बाद इन दोनों को वो मिल गया था. अरुण को उस लड़के की बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा था. क्यूंकि इस मौसम में यहाँ कोई घूमने नहीं आता था. और कोई भी तीन दिन तक इन सूने पहाड़ों में खोया नहीं रह सकता था. अक्षय  अरुण के मन के भाव जान गया था, अरुण अपनी दिव्य शक्तियों का इस्तेमाल बहुत कम करता था, पर अक्षय ने तुरंत पारिची विद्या को जागृत कर दिया, पारिची  सामने वाले का परिचय तुरंत दे देती है.
पारिची यक्षिणी प्रकट हुई और सिर्फ अक्षय को दिखाई दी. पारिची ने अक्षय को कहा कि ये लड़का कोई साधारण मानव नहीं है और उसे सिर्फ इतना ही बताने की आज्ञा है. और अब अक्षय भी इस बात को भूल जाएगा. यक्षराज कुबेर का यही आदेश है. पारिची अक्षय के मस्तिष्क से उस लड़के का परिचय मिटा कर गायब हो गयी.
अब दोनों मित्र उस लड़के को सुला कर सो गए. अगले दिन सुबह 21 नवंबर का दिन और सुबह उत्पत्ति एकादशी और सोमवार का सुबह योग, दोनों साधक सतोपंथ में स्नान करने के लिए जाने लगे तो वो लड़का बोला अगर आप दोनों चले जाओगे तो मुझे अकेले डर लगेगा. एक तो मेरे पास ठहर जाओ. अरुण ने लड़के को कहा कि वो उसे साथ ले जायेंगे. लड़का बोला मै तो काफी कमजोरी महसूस कर रहा हूँ चलूँगा कैसे. अरुण ने उस लड़के को गोद में उठा लिया और सतोपंथ की और चल पड़े.

सतोपंथ पहुँच कर अक्षय और अरुण ने लड़के को किनारे पर एक जगह बैठा दिया और खुद किनारे पर बैठ कर वंदन आराधन आदि करने लगे. दोनों साधक नग्न रहते थे कपडे आदि तो निकलने की आवश्यकता थी नहीं. अब दोनों जल में प्रवेश करने लगे. पानी की शीतलता तो लगता था कि बर्फ से भी अधिक थी, शरीर का जितना हिस्सा पानी के भीतर जाता जा रहा था सुन्न होता जा रहा था. पर मोक्षमार्गी इन साधकों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.
जल के भीतर पहुँच कर दोनों ने स्नान किया, बद्रीनारायण का स्मरण करते रहे और जल में खड़े होकर सूर्य को जलअर्पण किया. सभी देवताओं दिशाओं को तर्पण दिया. और जब बाहर निकले तो देखा पूर्व की और मुख करके तीन साधक बैठे थे. एक पीताम्बर, एक श्वेताम्बर और एक बाघ का चमड़ा पहने था. महाज्ञानी जानकार तीनो को इन दोनों ने वंदन किया पर तीनो साधक ध्यान मग्न रहे.अब अरुण अक्षय उस लड़के के पास आ गए. कल रात को हुई तेंदुए के साथ मुठभेड़ से उस लड़के के सारे शरीर पर मिटटी और खून सूख चुके थे. सारे बाल भी मिटटी में लथपथ थे. अरुण और अक्षय ने उस लड़के के सारे कपडे निकाले और उसे उठा कर स्नान करवाने के लिए सतोपंथ ताल में ले आये लड़का चिल्लाने लगा मुझे ठंड लग जायेगी, मै मर जाऊँगा. पर अरुण और अक्षय ने एक नहीं सुनी और उसे सतोपंथ में स्नान करवाने लगे. जल में जाते ही वो लड़का एकदम इनके हाथ से फिसल कर जल में तैरता हुआ चला गया. उस लड़के का तैरना बहुत ही अजीब सा था. वो हाथ पाँव चला कर नहीं तैर रहा था बल्कि किसी मछली के तरह पानी में फिसलता सा जा रहा था. मैल समाप्त कर निर्मल बनाना तो जल का काम है. पर सतोपंथ का जल तो मन को भी निर्मल बना देता है. उस लड़के के शरीर और बालों में भरी हुई मिटटी घावों पर सूखा खून सब साफ़ हो गया. और एक नवजात शिशु जैसी सफेद साफ़ कोमल देह के साथ वो लड़का बाहर निकला तो थर थर कांप रहा था. अरुण ने उसके छाती पर दाहन का स्पर्श किया तो उसके शरीर पर लगा सारा पानी सूख चुका था और उसके शरीर में गर्मी भी आ गयी थी. अक्षय ने आवरनी विद्या से उसे नए वस्त्र पहना दिए. पर उसने तुरंत सब वस्त्र निकाल फेंके और अरुण अक्षय की तरह दिगंबर हो गया, बोला अब मै आप लोगों के साथ ही रहूँगा और आप ही की तरह रहूँगा.
अरुण अक्षय कुछ कह नहीं पाए. अब वे तीनो वापस गुफा की ओर चले तो अरुण ने देखा कि उस लड़के आलोक के घाव काफी हद तक ठीक हो गए थे. अरुण समझ गया कि यह सब उस चमत्कारी बूटी का कमाल है जो रविनाथ ने उसे बताई थी और अरुण ने कल रात इसको चूसने के लिए दी थी. अरुण और अक्षय जब वापस गुफा में पहुंचे तो अरुण ने कहा आलोक पुत्र  तुम हमारे साथ यहाँ नहीं रह पाओगे. यहाँ बहुत ज्यादा बर्फ पड़ती है और हम लोग चार महीने उपवास करते हैं. यहाँ खाने के लिए कुछ उपलब्ध नहीं होता. बेहद ठंड होती है ऐसे तुम यहाँ कैसे रह पाओगे. आलोक बोला, आप लोग चाहें तो मेरे लिए खाने का सामान यहीं प्रकट कर सकते हैं और रही बात ठंड की तो जैसे आज आप लोगों ने मेरी ठंड दूर की थी वैसे ही आगे भी कर सकते हैं. मुझे यहाँ से भगाने की कोशिश नहीं करो, मै यहीं रहना चाहता हूँ, अरुण ने कहा तुम्हारे माता पिता तुम्हे ढूँढ रहे होंगे, इसपर लड़का बोला कि उसका कोई नहीं है और वो तो एक अनाथाश्रम में पला बढ़ा है. उसकी प्रतीक्षा किसी को नहीं है.अरुण और अक्षय कुछ कह नहीं पाए.और कुछ कहने को था भी नहीं.

दोनों मित्रों ने खाने का सामान प्रकट किया और साधना में डूब गए. उनकी सेवा में आलोक समय बिताने लगा. फिर छः दिसंबर को वैकुण्ठ एकादशी के दिन तीनो सतोपंथ फिर चले गए, और वहाँ स्नान किया, बाहर आकर उन्हें वही तीनो श्वेताम्बर, पीताम्बर और बाघम्बर साधक फिर मिले. तीनो ने उन तीनो दिव्य साधकों की आराधना वंदना की. इस बार तीनो साधकों ने मुस्करा कर वंदना स्वीकार की.


 जब ये तीनो वापस गुफा में पहुंचे तो ना जाने क्यूँ अरुण और अक्षय बहुत प्रसन्न थे. उन दिव्य साधकों के दर्शन का असर था शायद. अब अरुण और अक्षय धयान में गए तो उनका ध्यान फरवरी में खुला. ध्यान खुलते ही उन्होंने आलोक को ध्यान में बैठे पाया. आलोक का शरीर भी उनकी तरह ही सूख गया था. खाने का ज्यादातर सामान ऐसे ही पड़ा हुआ था. साफ़ दिखाई दे रहा था कि आलोक ने ज्यादातर सामान छुआ ही नहीं था. उनके ध्याम खुलने के थोड़ी देर बाद ही आलोक का भी ध्यान खुल गया. अरुण ने पूछा कि आलोक को ध्यान लगाना कैसे आ गया और वो कितने दिन से ध्यान में डूबा हुआ है. आलोक ने कहा कि उसे कुछ नहीं पता कि उसे क्या हुआ था. अरुण और अक्षय ने समय चक्र देखा तो पता चला कि कल सत्रह फ़रवरी है और विजया एकादशी का पावन दिन है.

सतोपंथ में स्नान करने से ज्यादा तो उन तीनो साधकों के दर्शन की उत्कंठा मन में लिए अरुण और अक्षय, आलोक के साथ सतोपंथ में पहुंचे. चरों तरफ बर्फ का साम्राज्य था. जैसे ही स्नान तर्पण आदि से निवृत हो कर उन्होंने देखा तो तीनो साधक वहीँ बैठे थे. अरुण और अक्षय उनके पास पहुंचे और वंदना की. तीनो साधकों ने इस बार हाथ उठा कर इन्हें आशीर्वाद दिया. तभी आलोक बोल पड़ा, ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तसे नमो नमः. बस यही पल था जब अरुण अक्षय समझ गए कि सामने त्रिदेव हैं. और त्रिदेव अन्तर्ध्यान हो गए. अब अरुण ने आलोक से पुछा, सच बताओ तुम कौन हो






आलोक का रहस्य (17 फरवरी 2012)

आलोक कहने लगा, आप लोग मेरा रहस्य कभी नहीं जान पाते अगर आज मैंने आप लोगों को त्रिदेव साक्षात्कार के समय नहीं चेताया होता. मै भी क्या करता इतनी बार देव दर्शन करने के बाद भी आप दोनों पहचान नहीं पाए थे. अब मुझे लगा कि इनकी सहायता कर ही दी जाए. मेरा नाम दंषक है, मै एक सर्प हूँ. मानव रूप धरने की विद्या जानता हूँ. जिस रात मै अरुण को मिला था उस रात मै मानव रूप में घूम रहा था और तभी तेंदुए ने मुझ पर हमला बोल दिया. अचानक हुए इस हमले में मेरी मणि कहीं गिर गयी. और मणि के बिना मै अब ना तो रूप बदल सकता था और ना ही अपने घावों को ठीक कर सकता था.

जब अरुण मुझे उठा कर लाये तो उन्हें मेरा शरीर बहुत ठंडा लगा था. हम सर्प जाति के प्राणियों का शरीर का तापमान जब कम हो जाता है तो हम चल फिर नहीं पाते, जब शरीर का तापमान बढ़ता है तब हम क्रियाशील हो जाते हैं. यहाँ के ठन्डे वातावरण में मै बहुत कमज़ोर हो गया था. जब आप दोनों ने अपने शरीर से मुझे ताप दिया तो मै ठीक हो गया था. जब मै सतोपंथ के पानी में पहुंचा तो सर्प की तरह ही पानी में तैरने लगा. अचानक मुझे ध्यान आया कि आप लोग मुझे देख रहें हैं तो मै पानी से बाहर आ गया. मेरी मणि जब मुझे मिल जायेगी तो मै वापस अपने लोक में जा सकूंगा. अब बर्फ पिघलने लगेगी और मै अपनी मणि ढूँढ लूँगा.

आलोक अरुण और अक्षय के साथ उस जगह पहुंचा जहाँ उसकी तेंदुए से मुठभेड़ हुई थी. बहुत तलाश किया पर मणि नहीं मिली. अचानक ही आलोक को याद आया और वो बोला कि उन्हें सूर्यास्त की प्रतीक्षा करनी चाहिए. सूर्यास्त के समय आलोक ने एक अजीब सी फुफकार के साथ एक मन्त्र जप किया तो बर्फ और पत्थरों के बीच एक जगह से प्रकाश फूटने लगा. वहाँ पर बर्फ और पत्थर हटाये तो एक बेहद चमकती हुई मणि पड़ी थी. आलोक ने उसे उठाया और तुरंत ही दंषक नाग के रूप में आ गया. अब वो वापस मानव रूप में आया और अरुण और अक्षय की सहायता के लिए उनका धन्यवाद किया. अलोक बोला  अक्षय ने जब पारिची से मेरा परिचय माँगा तो वो बेचारी क्या बोलती, मै यक्षराज कुबेर का मित्र हूँ. और मेरे कहने पर ही यक्षराज ने यक्षिणी को यह आदेश दिया था कि वो आप लोगो को कुछ ना बताये. अब आप लोग वापस वाता चले जाओगे.मै अपने स्मृति चिन्ह के रूप में आप दोनों को यह मणि देता हूँ, मेरी मणि के समान यह मणि दिव्य है. आप इस मणि से जो भी चाहेंगे वो यह मणि आपको दे देगी. यह कहते हुए आलोक ने एक मणि अरुण को दे दी. अरुण बोला, हे दंषक आलोक  हम लोगों के लिए यह मणि निरर्थक है. आपकी स्मृति तो हमारे ह्रदय में सदा रहेगी. यह कह कर अरुण ने मणि लौटा दी. अरुण के मणि लौटाते ही एक तीव्र प्रकाश वहाँ हो गया और सामने सर्वोत्तम खड़े थे. सर्वोत्तम ने अरुण और अक्षय से कहा, आज तुम दोनों अपनी परीक्षा में सफल हो गए हो. अब तुम दोनों का स्तर बढ़ कर दो हो गया है. अक्षय और अरुण सर्वोत्तम के चरणों में झुक गए. सर्वोत्तम उन्हें आशीष दे कर अन्तर्ध्यान हो गए. अब दंषक आलोक ने अरुण और अक्षय से उनके साथ रहने की आज्ञा मांगी, अरुण ने जब आलोक से इसकी वजह पूछी तो आलोक ने बताया कि वो अरुण और अक्षय के गण रूप में उनकी सेवा करना चाहता है, इसपर अक्षय ने हाथ जोड़ कर कहा, हे नाग हम योगी हैं हमे सेवकों गणों की आवशयकता नहीं है. हम राही हैं, स्वर्ग के राही, कृपया हमे आशीर्वाद दीजिए कि हम अपने इस राह की मंजिल पा सकें. आपके कष्ट काल में हम आपके काम आये, यह हमारा सौभाग्य है. आप इसे अहसान या बोझ ना समझे. आप ही की कृपा से हम त्रिदेव के दर्शन करने में सफल हुए.

दंषक आलोक ने  कहा मै तुम्हारे त्याग से बेहद प्रसन्न हूँ, देव दर्शन कभी खाली नहीं जाता, तुम मुझसे मिले इसका कोई ना कोई फल तो मै तुम्हे दे कर ही जाऊँगा, मै  तुम्हे बेहद गुप्त ज्ञान  देवताओं की श्रेणियाँ बता देता हूँ. यह देवताओं के अलावा बहुत ही कम मानव जानते हैं. देवताओं की कुल नौ श्रेणी है.
 सबसे बड़ी श्रेणी में महामाया हैं
 उनके बाद त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु,महेश हैं,
 तीसरी श्रेणी में गणेश, इंद्र,पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती आदि आते हैं
चौथी श्रेणी में वायु अग्नि वरुण पृथ्वी आदि प्राकृतिक देवता आते हैं
पाँचवी श्रेणी में गरुड़, कुबेर, नंदी, सप्तऋषि, नारद, यम, वासुकी, शेषनाग आदि देवता आते हैं
छठी श्रेणी में देवताओं के सेवक यक्ष गन्धर्व किन्नर आतें हैं यहाँ तक के देव देवलोकों में निवास करते हैं
सातवीं श्रेणी मे हम जैसे देवलोक और पृथ्वीलोक पर विचरने वाले देव आते हैं जो विभिन्न त्रिदेवों के लोक में सेवक का काम करते हैं.
आठवीं श्रेणी में भूत, प्रेत, स्थानदेव, गृहदेव आदि निम्न कोटि के देव आते हैं जो केवल पृथ्वी पर ही रह सकते हैं जो देवलोक केवल मुक्ति के पश्चात ही जा पाते हैं.
नौंवी श्रेणी में वो योगी ऋषि महात्मा आते हैं जिनका देवलोक गमन निश्चित होता है.
अरुण और अक्षय  तुम दोनों भी अब नौवें स्तर के देव बन चुके हो और तुम्हारा साधना मार्ग तुम्हे सीधे महामाया में विलीन कर देगा इसलिए तुम्हारी साधना से तुम नौवीं कोटि से सीधे पहली कोटि में कूद जाओगे.
यह है देवलोक का रहस्य.
अरुण में बेहद विनीत भाव से पूछा, हे देव यह तो बताइए कि पृथ्वी पर विचरते देवों को कैसे पहचाना जा सकता है. इसपर दंषक आलोक बोले  अरुण और अक्षय  आप दोनों को इसकी क्या आवश्यकता है. आप तो स्वयं देव कोटि में पहुँच गएँ हैं, इसपर अक्षय बोले, कृपया करके आप हमे बता दीजिए.

अब आलोक दंषक बोले, हे योगी जोड़ी  मै वह सबसे आसान तरीका बता देता हूँ जिससे आप देवों को पहचान सकते हैं, देवो के सिर के ऊपर एक दम बालों के साथ के एक अंगुल की मोटाई में हवा आपको विरल दिखाई देगी. ऐसा महसूस होगा जैसे सर से गर्मी निकल रही है.

Friday, April 6, 2012

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दोस्तों यही है वो स्वर्ग का रास्ता जिस पर  हम भी बहुत  जल्दी जाने वाले हैं



Wednesday, April 4, 2012

part 2


अरुण- मै विष्णुलोक से वापस क्यूँ आया.
रविनाथ- तुम अपनी साधना के फल के अनुसार ही वहाँ रुक पाए. अगर तुम्हारी साधना सम्पूर्ण हो जाती तो तुम विष्णु लोक के स्थायी निवासी बन जाते.

अरुण- मोक्ष क्या है
रविनाथ- जब आप जन्म लेते हो तो आपको आपके शरीर के साथ कष्ट भी मिलते हैं, चाहें आपने किसी भी रूप में जन्म लिया हो. चाहें भोजन की हो या वासना की या नाम की या अधिकार की, भूख हर प्राणी को भगाती रहती है. दो जन्मो के बीच का प्रतीक्षा काल आप अंतरिक्ष में बिताते हैं. आपको शांति कभी नहीं मिलती. आप किसी भी योनी में हो, भूख के चक्कर से आप निकल नहीं पाते. जब आप इस चक्कर से निकल कर प्रभु के भीतर समा जाते हैं, तब आपकी आत्मा को शान्ति और परम आनंद मिल जाता है. इसी को मोक्ष कहते हैं.


अरुण- मोक्ष पाने का सरलतम तरीका क्या है.
रविनाथ- मोक्ष पाने का सरलतम तरीका है, अपने आप को अपने हर काम को प्रभु के निमित कर दो. सुनने में सबसे आसान तरीका यही है. पर यह करना इतना आसान नहीं है. आपको खुद ईश्वर के समान बनना पडेगा. दूसरा रास्ता है तंत्र,मंत्र,यंत्र का. पर इसमें बहुत दुरूह और लंबी साधना करनी पड़ती है. तीसरा रास्ता है भक्ति का. तुमने खुद तीनो रास्ते देख लियें हैं.


अरुण- क्या हरेक की मंजिल मोक्ष होनी चाहिए.
रविनाथ- हाँ.

अरुण- जो हमारे पंथ में हम सशरीर स्वर्ग जाते हैं और जो लोग सिर्फ आत्मा से स्वर्ग जाते हैं, दोनों में क्या फर्क है.
रविनाथ- सशरीर स्वर्ग जाना  सम्पूर्ण विजय है. हमारा पंथ यह मानता है.

अरुण- क्या कभी कोई सर्वोत्तम बने बिना भी स्वर्ग गया है.
रविनाथ- हाँ सैकड़ों योगी बिना पदों और पंथ के प्रबंधन को संभाले स्वर्ग गए हैं. सर्वोत्तम का काम सारे पंथ का प्रबंधन भी है.



अरुण- हम वस्त्र क्यूँ नहीं पहनते.
रविनाथ- हमें ईश्वर ने जिस रूप में भेजा, हम उसी रूप में रहते हैं. वस्त्र, घर सब इंसान ने बनाये हैं. इसलिए हम विशुद्ध ईश्वरीय सत्ता के अनुरूप रहते हैं.

अरुण- क्या कभी कोई स्त्री भी सर्वोत्तम बनी है.
रविनाथ- नहीं, आज तक कभी कोई स्त्री सर्वोत्तम नहीं बनी.

अरुण- क्या किसी स्त्री ने सशरीर स्वर्ग पाया है.
रविनाथ- हाँ बहुतों ने.

अरुण- क्या सर्वोत्तम अपनी मर्ज़ी से किसी को भी स्वर्ग भेज सकते हैं.
रविनाथ- नहीं जब आप स्वर्ग जाने के लायक हो जाते हैं तब सर्वोत्तम आपको देवताओ के हवाले कर देते हैं. देवता आपकी सम्पूर्ण परख करके अगर आपको स्वर्ग जाने लायक पाते हैं तो ही आपको स्वर्ग ले जातें हैं.

अरुण- स्वर्ग कैसा होता है.
रविनाथ- गूंगे का गुड़ है.

अरुण- कुछ तो बताइए
रविनाथ- कहा ना  जिसने पा लिया वो वापस आएगा नहीं, कोई वापस आ कर बताएगा नहीं तो हम पृथ्वीवासी कैसे जान पायेंगे.

अरुण- पर देवता तो दोनों लोक में आते जाते हैं, उन्होंने नहीं बताया.
रविनाथ- देवदर्शन होने पर कोई भी अपने काम पहले पूरे करवाएगा. इन बातों के ज्ञान से किसी का कोई फायदा तो होगा नहीं. जो स्वर्ग जाने के लायक हैं वे पहुँच ही जायेंगे. जो लायक नहीं हैं उन्हें बता कर क्या फायदा
अरुण- रोहिताश्व क्या इनका असली नाम है.
रविनाथ- नहीं  यह पंथ का दिया नाम है.

अरुण- तो इनका असली नाम क्या है
रविनाथ- तुम्हे इस जानकारी से क्या फायदा होगा अच्छा होगा ऐसे प्रश्न तुम पूछो ही नहीं.

अरुण- मुझे अगले स्तर के लिए साधना करने की अनुमति दीजिए.
रविनाथ- आज तुम विलयन विद्या देखो, कल से अनुमति तुम्हे तुलसीनाथ  देंगे.
 
अरुण सवाल पूछता रहा और अक्षय ध्यान से सुनता रहा. रविनाथ ने जब सब सवालों का जवाब दे दिया तब रविनाथ और रोहिताश्व ने अरुण और अक्षय को गुफा के भीतर वाले कक्ष में चलने को कहा. चारों जब भीतरी कक्ष में पहुंचे तो वहाँ एक बहुत बड़ा द्वार खुला हुआ था.
उस द्वार से निकल कर जब ये लोग बाहर गए तो एक बड़ी खुली सी जगह में एक अग्निकुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित थी. अग्नि के चारों तरफ एक घेरा बनाये बहुत से लोग बैठे ही थे. एक तरफ एक चोकोर पत्थर पर सर्वोत्तम बैठे थे. यही दृश्य तो अरुण ने ऋषिकेश में अपने सपने में देखा था.
रविनाथ और रोहिताश्व  सर्वोत्तम के दोनों तरफ ज़मीन में बैठ गए. अरुण और अक्षय घेरे में बची हुई जगह पर बैठ गए. अब अरुण ने घेरे में बैठे हुए लोगो को देखा. सबके के चेहरे एकदम भाव विहीन थे. सब लोग ह्रीं मन्त्र का जाप कर रहे थे. ह्रीं शब्द एक कंपन सी पैदा करता हुआ गूँज रहा था. सब कुछ एकदम दिव्य सा था. ना दिन था ना रात थी. बस एक अलसाया सा उजाला फैला हुआ था.

अचानक ही सर्वोत्तम ने आवाज़ लगायी   अश्वनाथ, देवनाथ . अरुण अक्षय  तुरंत उठ कर सर्वोत्तम के पास पहुंचे. सर्वोत्तम ने अरुण और अक्षय के सर पर हाथ रखा और घोषणा की. अब ये दोनों तीसरे स्तर पर पहुँच गए हैं. आज के बाद इनके प्रत्येक सांस के साथ मन्त्र ध्वनि  निकलेगी. दोनों ने हाथ जोड़ कर सर झुकाया और अपने स्थान पर जा कर बैठ गए. अब सर्वोत्तम ने रोहिताश्व और रविनाथ को बुलाया.

दोनों योगी एक दूसरे के सामने खड़े हो गए. अचानक ही रवि नाथ का शरीर अहिस्ता आहिस्ता धुंए में पिघलने लगा और धुआं एक लकीर बन कर रोहिताश्व के चारों तरफ घूमने लगा. और धीरे धीरे रविनाथ का सारा शरीर धुंए में बदल गया और जहाँ रविनाथ थे वहाँ सिर्फ एक बेहंद तेज चमकने वाला बिंदु रह गया और वो बिंदु रोहिताश्व के सीने में समा गया. रोहिताश्व के चारों तरफ मंडरा रहा धुआं भी रोहिताश्व के शरीर में समा गया. और रोहिताश्व अब एक बीस वर्षीय युवक जैसे बन गए. दो योगी एक दूसरे में इस तरह मिल कर एक हो गए थे कि सब देखने के बाद भी कोई इस बात का विशवास नहीं कर सकता था कि ऐसा कुछ हुआ है.

अब रोहिताश्व/तुलसीनाथ  ने सर्वोत्तम की वंदना की. सर्वोत्तम ने घोषणा करते हुए कहा की आज से तुलसीनाथ पहले स्तर पर पहुँच गए हैं. और परसों  एकादशी को स्वर्ग में सशरीर प्रवेश पाने का द्वार खुलेगा. हमारे पंथ के लोग सब स्वर्ग के द्वार पर चलेंगे. जो उन्नीस लोग यहाँ पर बैठे हैं उनमे से पांच परसों स्वर्ग में वास पा जायेंगे. अगले तीन वर्षों फिर किसी और को प्रवेश नहीं मिलेगा.

मुझे मिला कर बीस के बीस साधक परसों वहाँ जायेंगे. जिन जिन को आज्ञा मिलेगी वो सब प्रवेश पा जायेंगे. बाकी वापस आ कर फिर से साधना शुरू कर देंगे
23 नवंबर 2008
स्वर्ग का द्वार
सुबह सुबह बीस साधकों की टोली स्वर्गारोहिणी के लिए सहस्त्रधारा में स्थित गुफा से निकल कर चल पड़ी, चक्रतीर्थ का मैदान पार करके भीमबार होते हुए सतोपंथ ताल पर पहुँची, सतोपंथ ताल सतोपंथ पर्वत के नीचे सतोपंथ ग्लेशियर के पिघलने से बना हुआ एक तिकोनी झील है. यहाँ का पानी इतना साफ़ है की आप तली भी देख सकते हैं. कोई पत्ता तिनका अगर इस झील में गिर जाता है तो नीले सलेटी रंग के छोटे छोटे पक्षी उसे तुरंत निकाल देते हैं. मायता है कि ये रूप बदल कर आये हुए गन्धर्व हैं. हर एकादशी को ब्रह्मा विष्णु और शिव इस ताल में स्नान करके किनारे पर बैठ कर तपस्या करतें हैं जो भी यात्री इसमें एकादशी को स्नान करके बाहर निकलता है उसे किनारे पर तपस्या रत त्रिदेव के दर्शन अक्सर हो जाते है. बीस के बीस साधकों ने इस ताल में स्नान किया और दाहन से खुद को सुखाया और आगे चल पड़े.
बहुत दुरूह रास्ता पार करके ये लोग आगे चल पड़े. अरुण मन में सोच रहा था कि आज स्वर्ग का द्वार जब खुलेगा तो मै भीतर झाँक तो ज़रूर लूँगा. अक्षय अरुण के मन की बात जान गया और मुस्करा दिया. उसके अपने भी यही विचार थे. अक्षय जो बात जानता था वो अरुण भी नहीं जानता था. आखिर अक्षय ने अरुण से ज्यादा तपस्या जो की थी. अक्षय ने अरुण के प्यार में कई बार ऊँचा स्तर पाने के मौके खो दिए थे पर उसकी साधना और समर्पण अरुण से हमेशा ज्यादा रहे थे, कई शक्तियां जो अरुण के पास नहीं थी वो अक्षय के लिए दासी रूप में काम करती थी. अक्षय को पता था कि आज सर्वोत्तम तो प्रवेश पा जायेंगे और तुलसीनाथ नए सर्वोत्तम बनेंगे. बाकी चार लोग कौन होंगे यही देखने की बात थी.
ऊँचे नीचे पहाडो पत्थरों को पार करके ये लोग आगे चल पड़े. चन्द्रकुंड, सूर्यकुंड को पार करते हुए साधक बढे चले जा रहे थे, छः किलोमीटर के दुरूह रास्ते के बाद सामने था विशाल, रहस्यमय, स्वर्गारोहिणी  सीढ़ियों वाला पर्वत पैंसठ सौ मीटर की ऊँचाई के साथ इस एक दम खड़ी ढाल वाले पर्वत पर चार  सीढियां दिखाई दे रही थी. कहा जाते है इस पर्वत पर सात सीढियां रावण द्वारा बनायीं गयी थी. पर हर किसी को सभी सीढियां दिखाई नहीं देती.
पर्वत अभी बहुत दूर था. सभी साधक तेज चल रहे थे. अब पत्थर गायब हो कर उनका स्थान बर्फ ने ले लिया था. नंगे पाँव नंगे बदन  बेहद ठंडा वातावरण, नीचे दायें बाएं आगे पीछे सब तरफ बर्फ. यही तो है साधना की पराकाष्ठा. अरुण और अक्षय दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया. पाँव सुन्न हो चुके थे. बदन भी अब जमते जा रहे थे. दाहन विद्या द्वारा शरीर का तापमान बढ़ाया तो कुछ जान सी आई. अचानक ही सभी की गति आश्चर्यजनक रूप से तेज हो गयी, आसपास के सभी                

सभी दृश्य तेजी से गायब होते जा रहे थे. ऐसा लग रहा था वे लोग चल नहीं उड़ रहे हो अरुण ने अक्षय से पूछा कि यह हो क्या रहा है.  अक्षय बोला, शायद वो घड़ी जिसमे स्वर्ग के द्वार खुलने थे नज़दीक आ रही है इस  लिए सर्वोत्तम सबको तेजी से वहाँ ले जा रहे थे. 
Swargarohini, the descent to heaven by the Pandava brothers trek in the Garhwal Himalayas in Uttarakhand beyond Badrinath

अरुण की उत्कंठा बढती जा रही थी. जिसके लिए उसने पांच जन्म और पांच सौ सोलह साल लगा दिए थे उस मंजिल के अवलोकन की घड़ी नज़दीक आ गयी थी. अब वे लोग स्वर्गारोहिणी की सीढीयों तक पहुँच गए. यहाँ पर आ कर पूरा टोला रुक गया और सर्वोत्तम के कहने पर सब लोग हाथ जोड़ कर खड़े हो गए. सर्वोत्तम ने मन्त्र जप शुरू कर दिया सब लोग एक स्वर में उनका साथ देने लगे. मन्त्र जप की कंपन सारे वातावरण में गूंजने लगी. अब कंपन पहाड़ों में भी होने लगी. मन्त्र गूंजने लगे. लग रहा था कि अब वातावरण ने भी मन्त्र जप शुरू कर दिया था.


सामने की धुंध छंटने लगी और स्वर्ग की सीढियां नज़र आने लगी. एक चमत्कारी सा दृश्य था. चातक पक्षी जैसे स्वाति नक्षत्र में बरसे पानी को सोख जाता है ठीक वैसा ही कुछ अरुण और अन्य सभी साधक कर रहे थे. एक एक दृश्य को आँखों में बसा लेना चाहते थे.

सर्वोत्तम के आदेश पर सभी साधक आगे बढ़ने लगे. बर्फ के ऊपर गिरते फिसलते लुढकते पर उठ कर फिर दौड पड़ते.





 पहली सीढ़ी पार करने के बाद अचानक ही सर्वोत्तम हवा में उठने लगे, पीछे पीछे पंथ के सबसे बूढ़े गन्धर्वनाथ भी उठने लगे, इनके पीछे पीछे रामनाथ और वेदनाथ भी हवा में उठ गए. चारों साधक हवा में ठहर गए. बाकी साधक दम साढे इन्तेज़ार कर रहे थे कि एक बचे हुए साधक कौन होंगे जिनकी यात्रा आज सम्पूर्ण हो जायेगी.
सर्वोत्तम का मंत्रजाप लगातार चल रहा था. अचानक ही कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद कभी कोई कर ही नहीं सकता था. स्वर्ग के उस रास्ते पर जहाँ से कहा जाता है कि विमान युधिष्ठर को लेने आया था, दो पहाड़ों के बीच से झाँक रहे आसमान में एक गोल बिंदु जैसा उभरा जो बड़ा होते होते एक रास्ते एक खिड़की जैसा बन गया. उस खिड़की से तेज प्रकाश निकल रहा था. सभी साधकों की आंखें स्वतः बंद होने लगी.
जैसे बवंडर सब चीज़ें अपने भीतर खींच लेता है वैसे ही चारों साधक उस खिड़की के भीतर खींचते चले गए और उस असीम प्रकाश में समा गए. आकाश में एक मानवाकृति का एक प्रकाश पुंज उभरा


इस दैविक आकृति ने कहा, साधको आज से सत्यपंथ के नए सर्वोत्तम तुलसीनाथ होंगे और आज प्रवेश पाए चार साधकों के अलावा एक और साधक को भीतर ले जाने के लिए मै स्वयं आया हूँ. मै स्वर्ग के इस द्वार का रक्षक हूँ. आज जिस पांचवें साधक को मै लेने आया हूँ उनका नाम है रुद्रनाथ तीन सौ साल की तपस्या कर चुके इस साधक के लिए स्वयं इंद्र महाराज ने मुझे भेजा है.
रुद्रनाथ नामक साधक हवा में उठा और उस दिव्य पुरुष के साथ स्वर्ग के रास्ते में चल पड़ा. पीछे रह गए पन्द्रह साधकों ने स्वर्ग को प्रणाम किया और वापस मुड चले. मंजिल देख ली थी. स्वर्ग की सीढ़ियों से वापस सहस्त्रधारा तक का रास्ता कब पार हो गया किसी को पता भी नहीं चला. कौन सी शक्ति रात में उजाला करके उन्हें वापस लायी थी तुलसीनाथ के अलावा कोई नहीं जानता था.





















वापस साधना गुफा में.
24 नवंबर2008
तुलसीनाथ ने सभी साधकों को बुलाया और पंथ संचालन के लिए कुछ नियम सबको बताये. सभी साधक गुफा के भीतर इकट्ठे हुए. तुलसीनाथ बोले, आजसे शुभनाथ और शमिनाथ दूसरे स्तर पर और अश्वनाथ और देवनाथ तीसरे स्तर पर. राघव्नाथ और केशवनाथ तथा सुनन्दा चौथे स्तर पर, केवलनाथ राजनाथ रक्षानाथ रामनाथ और देवी सुभद्रा देवी नेह्वती और शीशनाथ सब पांचवें स्तर पर हैं.
आज से शमिनाथ पंथ के छठे स्तर से नीचे के सभी साधकों के और शुभनाथ यहाँ पर उपस्थित तेरह साधकों के पथप्रदर्शक बन कर कार्य करेंगे
अब मेरा समय आ गया है की मै आलोप रह कर सबका ध्यान रखूं. इस गुफा में आज से शमिनाथ का वास होगा. और वाता मे शुभनाथ अपने दल के साथ साधनारत रहेंगे. आप सब की मंजिल अब बहुत पास आ गयी है. आप सब को मेरा शुभाशीष. कह कर तुलसीनाथ आलोप हो गए.

शुभनाथ ने तेरह साधक जो पांचवें या इससे ऊपर के स्तर को पा चुके थे उन्हें लेकर गुफा से बाहर आ गए. अरुण ने शुभनाथ से पूछा, हे उत्तम यह तो बताइए यह वाता क्या है. शुभनाथ ने अरुण को बताया कि जहाँ परसों हम लोग सर्वोत्तम से मिले थे उस स्थान को वाता कहतें है. इस गुप्त स्थान का निर्माण वायुदेव ने अपनी साधना के लिए किया था, वात का अर्थ है वायु. यहाँ पर वायुदेव पवन ने अपने निरंतरता पायी थी. इस सिद्ध साधना स्थल पर हमारे पंथ के सैकड़ों साधकों ने तपस्या की है. जितने भी साधक स्वर्ग पहुंचें है उनमे से नब्बे प्रतिशत लोगों ने यहीं पर साधना की है.

अब सभी तेरह साधक शुभनाथ के साथ वाता  नामक जगह पर पहुंचे. अरुण ने पुछा, उत्तम यह बताइए कि वाता में ना दिन दीखता है ना रात बस एक दिव्य सा उजाला फैला रहता है. ऐसा कैसे होता है. शुभनाथ ने बताया कि इस उजाले का रहस्य किसी को नहीं पता, यहाँ कौन सी शक्ति वास करती है शायद सर्वोत्तम जानते हों.

अब शुभनाथ ने सभी साधकों के साधना स्थल निश्चित कर दिए. सुनंदा नेहावती और सुभद्रा को अग्नि के पूर्व में व् स्वयं अग्निकुंड के उत्तर में और बाकी सभी साधकों को अग्नि कुंड के दक्षिण में स्थान दे दिए गए. अग्निकुंड के पश्चिम का स्थान खाली रखा गया. पता नहीं क्यूँ.

साधना का काल फिर से शुरू हो गया. सभी साधक उस मार्ग पर चल पड़े जिसकी मंजिल मोक्ष है. अब अरुण को त्राटक की विद्या सिखाई गयी. त्राटक के लिए तुलसीनाथ ने एक स्फटिक का गोला अरुण के सामने रखा. यह गोला एक दम आँखों की सीध में था. एक प्रकाश स्त्रोत इस गोले को रोशन किये हुए था. अरुण को एकटक गोले में देखना था. अरुण ने शरीर को ढीला छोड़ दिया और गोले को देखना शुरू कर दिया. मन के सभी विचार धीरे धीरे समाप्त होने लगे. अरुण उस चमकते गोले में डूबता चला गया. दिन हफ्ते बने हफ्ते महीने बन गए, महीने साल में बदल गए. अरुण का मन एकाग्र हो कर उस गोले में ही बसता चला गया. अब अरुण का अपने मन के घोड़ों पर पूरा नियंत्रण हो गया.
 उधर अक्षय ने आसनी नामक साधना में विजय पा ली थी. इस विद्या से अपने आसन पर बैठे बैठे जिस व्यक्ति या वस्तु को चाहो अपने सामने बुलाया जा सकता था. दोबारा एक वर्ष की साधना से अक्षय ने आसनी को दोबारा पा लिया और एक विद्या चुपके से अरुण को अर्पित कर दी. उधर अरुण ने त्राटक विद्या दोबारा पा कर अक्षय को दे दी. सर्वोत्तम और शमिनाथ सब देख रहे थे. अरुण और अक्षय का ऐसा स्नेह देख कर उन्हें अच्छा भी लगता और बुरा भी. अच्छा इस लिए कि दो साधक एक दूसरे की सहायता कर रहे हैं बुरा इसलिए कि यह लगाव बहुत बार मोक्ष के आड़े आ जाता है. अरुण और अक्षय को अलग अलग स्थानों पर भेज दिया गया. अब अक्षय हरियाणा के जींद में जयंती देवी मंदिर में साधनारत हो गया और अरुण सतोपंथ के पास एक गुफा में साधना रत हो गया.





























अक्षय का असीमनाथ से मिलना
फरवरी2010 से अप्रैल2011  
हरियाणा के जींद नगर में स्थित वैदिक काल के सिद्ध शक्तिस्थल जयंती देवी पर अक्षय साधनारत था. सायंकाल में जब अक्षय देविप्रतिमा पर त्राटक लगाता तो अक्सर एक अन्य साधक उसी समय वहीँ आता था. दोनों साधक एक दूसरे के शरीर से निकलने वाली उर्जा से एक दूसरे को जान गए थे. पर एक दूसरे से बात नहीं करते थे. दोनों की मंजिल एक ही थी मार्ग भी लगभग एक ही था. एक दिन शाम को शुक्रवार बारह फरवरी को शुक्र की होरा में देवीप्रतिमा से शक्तिपुंज निकलने लगे. ठीक उसी क्षण दोनों साधक एक साथ वहाँ पहुँच गए और शक्तिपुंज को ऐसे सोखने लगे जैसे कि जन्म जन्म के प्यासे हों. उसी क्षण दोनों एक प्रगाढ़ मित्रता के बंधन में बांध गए. दूसरे साधक का नाम असीमनाथ था. वह तंत्र और मन्त्र द्वारा साधना कर रहा था. दोनों लगभग एक समान ही स्तर के साधक थे. दोनों साधकों का साथ तीन महीने का रहा. फिर अक्षय को वापस सहस्त्रधारा आने का आदेश मिल गया.

जून के महीने में असीमनाथ और अक्षय एक साथ हरिद्वार चले गए और दोनों ने गंगा तट पर एक साथ साधना की.. और वहाँ से अक्षय सहस्त्रधारा चले गए और असीमनाथ अपने साधना स्थल पर वापस आ गए. अब अक्षय और तिलकनाथ मानसिक तरंगों से एक दूसरे के संपर्क में रहते.  
अक्षय कई बार अरुण के पास जाना चाहते थे पर आज्ञा ना होने के कारण मन मसोस कर रह जाते. अपने मन की बातें करने के लिए उनके पास असीमनाथ थे. एक दिन सितम्बर के महीने में असीमनाथ गणपति साधना में व्यस्त थे और अक्षय उनसे मिलने के लिए रूपिणी विद्या से रूप बदल कर आ गया. दोनों की आयु में लगभग अठारह वर्षों का अंतर था और असीमनाथ अक्षय से पुत्रवत स्नेह रखते थे. उस रात गणपति साधना के दौरान अचानक गणपति विग्रह से शक्ति निकलने लगी.उस समय हुए इस शक्तिपात से दोनों साधकों को बहुत ऊर्जा मिल गयी. अक्षय ने उस वक्त एक कामना की कि उसे उसका भाई अरुण मिल जाए. और दैविक योग से उसे उसके भाई के पास जाने का मौका मिल गया.

अक्षय को सतोपंथ जाने की आज्ञा मिलते ही अक्षय तुरंत सतोपंथ पहुंचा और वहाँ अरुण के साथ मिल कर साधना प्रारंभ कर दी. सर्दी का मौसम शुरू होने को था. वहाँ एक गुफा में दोनों साधक तपस्या करने लगे. दिसंबर के महीने में बर्फ गिरनी शुरू हो गयी. अरुण और अक्षय बहुत गहरी समाधी में लीन हो गए. अब अक्सर बर्फ गिरती और सब रास्ते अवरुद्ध हो गए थे. बिना भोजन बिना निद्रा दोनों निरंतर ध्यान में रहने लगे. उनके ध्यान के तेज से गुफा के भीतर गर्मी बनी रही. दोनों का ध्यान फरवरी के माह में खुला. ध्यान से बाहर आते ही दोनों मित्र भूख से बिलबिलाने लगे. पारगामी विद्या से वे तुरंत सहस्त्रधारा पहुंचे और वहाँ उत्तम शमिनाथ की आज्ञा से जोशीमठ चले गए. वहाँ चार माह के बाद दोनों ने भोजन प्रारंभ किया. सबसे पहले उन्होंने गरम पानी में लौंग दालचीनी इलायची आदि ली और धीरे धीरे ठोस भोजन शुरू कर दिया.

मार्च माह में दोनों के शरीर फिर से स्वस्थ और बलिष्ठ हो गए थे. एक दिन उन्हें वापस सहस्त्रधारा आने का आदेश मिला और वे लोग वाता जा पहुंचे. वाता में उन्हें एक माह तक रुकने का आदेश मिल गया. अब दोनों मित्र वाता में बाकी साधकों की सेवा में लग गए. अक्षय कई बार असीमनाथ को याद करते पर असीमनाथ से मानसिक संपर्क नहीं हो पा रहा था. अक्षय असीमनाथ के पास जाना चाहते थे. उन्होंने अरुण को कहा कि अगर उसे आज्ञा मिल जाए तो वो असीमनाथ से मिलना चाहते है. अरुण बोला असीमनाथ के बारे में इतना सुनने के बाद उसे भी असीमनाथ से मिलने की बहुत इच्छा है. दोनों बात कर ही रहे थे कि उत्तम शमिनाथ उनके सामने प्रकट हुए और बोले कि असीमनाथ से उनका मिलना अभी उचित नहीं है और इसके लिए अभी आठ महीने का समय बाकी है. दोनों मित्रों ने पूछा कि अब उन्हें क्या करना है. उत्तम शमिनाथ ने कहा कि चार दिन बाद जीतेंद्र अरुण के शरीर में विलय हो जायेंगे. उनका पृथ्वीवास अब समाप्त हो जाएगा.

सोलह मार्च को जीतेंद्र बाबू अरुण के शरीर में समा गए. और अरुण का शरीर जीतेंद्र बाबू का विलय मिलते ही वृद्ध होने लगा और तीस वर्ष के अरुण की आयु अब बढ़ कर अस्सी वर्ष की हो गयी. अरुण को लगा कि अब उसका भी पृथ्वीवास समाप्त होने को है. अरुण अगला जन्म नहीं चाहता था. वो अक्षय के साथ कर्णप्रयाग पहुंचा और माँ अलकनंदा के भीतर छिपी हुई अपनी आयु में से पचास साल निकाल लाया. पचास साल की आयु पाते ही अरुण अब वापस तीस वर्ष के हो गए.  

अक्षय कुछ बातें जानना चाहता था उसने सर्वोत्तम तुलसीनाथ से संपर्क साधा, तुलसीनाथ के प्रकट होने पर अक्षय ने तुलसीनाथ से पूछा.

अक्षय- जब रविनाथ रोहिताश्व के शरीर में समाये थे तब उनकी आयु घाट गयी थी पर जब अरुण भैया के शरीर में जीतेंद्र बाबू समाये तो उनकी आयु बढ़ गयी थी, यह क्या रहस्य है.

तुलसीनाथ- जब रोहिताश्व के शरीर में रविनाथ समाये तब दोनों जन्म से ही साधना पथ पर थे, पर जीतेंद्र बाबू ने पचास वर्ष सांसारिक बिताए थे इसलिए वो पचास साल की आयु अरुण की आयु में मिल कर अरुण को पचास साल वृद्ध बना गयी.

अक्षय- क्या इसी आयु में अरुण भैया मोक्ष पा जायेंगे.

तुलसीनाथ- हाँ

अक्षय- कितने साल बाकी हैं

तुलसीनाथ- थोड़ी ही साल बाकी है.

अक्षय- असीमनाथ के साथ मेरा नाता कितने सालों का या कहिये जन्मो का है.

तुलसीनाथ- असीमनाथ से पूछ लेना वो बता देंगे.

अक्षय- क्या असीमनाथ भी इसी जन्म में मोक्ष पायेंगे.

तुलसीनाथ- इसका उत्तर अभी प्रभु इच्छा से मै नहीं जानता.

तुलसीनाथ अक्षय अरुण की वंदना ले कर अंतरध्यान हो गए. और अरुण अक्षय को अब पंथ संचालन के लिए उत्तरकाशी भेज दिया गया.














तीन साधकों का देह त्याग
12 अप्रैल 2011
वाता में एक दिन बड़ी गहमा गहमी थी. आज मंगलवार बारह अप्रैल का दिन था. आज भगवान राम की जयंती रामनवमी का पावन दिवस था. शमिनाथ ने सभी साधकों को इकठ्ठा किया और बताया कि सर्वोत्तम आज सबसे बात करेंगे. सब साधक एक दूसरे की तरफ देखने लगे कि अचानक क्या बात हो गयी है.
सर्वोत्तम प्रकट हुए और सिद्धासन पर बैठ गए. सम्पूर्ण वाता एक दिव्य तेज से जगमगाने लगा. धीर गंभीर वाणी में सर्वोत्तम तुलसीनाथ कहने लगे, देह की दुर्बलता के कारण तीन साधकों ने शरीर त्यागने की आज्ञा मांगी है. और आज उन्हें इस दैविक घड़ी में शरीर त्यागने की आज्ञा देवासन से मिल गयी है. आप तीनो साधक इस जीर्ण शरीर को त्याग कर अंतरिक्ष में अपने नए जन्म की प्रतीक्षा करेंगे. आपके वृद्ध और जीर्ण शरीर बिंदु रूप में स्वर्ग मार्ग पर स्थापित कर दिए जायेंगे. परम सत्ता आपको अगले जन्म में अति शीघ्र पंथ में आने का मार्ग दिखाएंगें इसी कामना के साथ राघवनाथ, केवलनाथ, नेहवती अब ह्रीं के उच्चारण के साथ अपने प्राणों को ब्रहम रंध्र से निकाल दें.
तीनो साधकों ने ह्रीं बीज का दीर्घ उच्चारण किया और तीनो के शरीर निर्जीव हो कर वहीँ जमे रह गए. और उनके शरीर से एक रहस्यमयी ज्योतिपुंज सिर में चोटी के स्थान से निकल कर आकाश में उठती चली गयी. बारह साधक इस अनोखी घटना को देख रहे थे. जब ज्योतिपुंज अंतरिक्ष में गायब हो गए तो सबने पीछे रह गए उन निर्जीव शरीरों को देखा जिनसे इनकी पहचान थी. अब आकाश से एक रोशनी नीचे आई और तीनो साधकों का शरीर सिकुड़ने लगा.

सिकुड़ते सिकुड़ते इनका शरीर एक बाजरे के दाने जितना रह गया और फिर जैसे ऊपर की खाल पिघल गयी हो ऐसा कुछ हुआ और तीन रोशनी के बिंदु उन दानो की जगह रह गए और तीनो  बिंदु सर्वोत्तम के हाथ में चले गए और सर्वोत्तम ने उन्हें संभाल कर पकड़ लिया. सर्वोत्तम उन्हें ले कर चले गए और बाकी साधक समझ गए कि यह तीन शरीर अब स्वर्ग की राह में आने वाले पथिकों की चरण धूल पाएंगे.

अब पंथ में पहले पांच स्तरों में सर्वोत्तम के अलावा ग्यारह साधक रह गए थे. अरुण और अक्षय वापस उत्तरकाशी चले गए. उनका मानसिक जप लगातार चल रहा था. सभी तरह के नियम क़ानून का भी पूरा पालन कर रहे थे. अरुण उत्तरकाशी के आश्रय का प्रमुख बन गया था और एक दिन अक्षय बोला, भैया आज अट्ठारह अप्रैल है. इसी दिन तीन साल पहले मै आपको पंथ में वापस लाने के लिए मिला था. और आज फिर एक साधक वापस पंथ में आ रहा है. आपको उसे दिव्यदर्शन करवाने हैं.

एक नया अक्षय इस नए अरुण को लेकर आ रहा है. आज रात वो इसी आश्रय में रुकेगा. यह सोच कर अरुण मुस्करा उठा. तभी पंथ का बारहवें स्तर का साधक निवृतिनाथ एक युवक और युवती को ले कर आश्रय में आया. अरुण का धीर गंभीर तेजोमय रूप  श्वेत वस्त्र,कन्धों पर लहराते काले रेशमी बाल सतर बलिष्ठ शरीर को देख कर आगंतुक युवक और युवती तुरंत ही प्रभावित हो गए. युवक का नाम आदित्य और युवती का नाम मेखला था. दोनों पति पत्नी थे. अरुण की ही तरह उन दोनों को भी जीवन के सच्चे मूल्यों की तलाश थी. पिछले जन्म में भी दोनों पंथ के साधक रह चुके थे. अरुण और अक्षय ने रात को उन्हें उनका पिछला जन्म दिखा दिया और अगले दिन सुबह उन्हें श्रीनगर माँजी के पास भेज दिया.

अरुण और अक्षय का उत्तरकाशी में वास तीस अप्रैल को समाप्त हो गया और वे दोनों उत्तम के आदेश पर दिल्ली चले गए. दिल्ली में चार महीने रहने के बाद दोनों वापस वाता वापस आ गए. उत्तरकाशी और दिल्ली में अरुण अक्षय की मुलाकात बहुत से साधकों से हुई थी. उनसे बहुत कुछ सीख कर  उन्हें बहुत कुछ सिखा कर अरुण और अक्षय अब दूसरे स्तर पर पहुँचने वाले थे.